श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS)
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डिजिटल कृषि, किसान पहचान और भूमि अभिलेखों के बीच वास्तविक किसान की पहचान का प्रश्न
भारत की कृषि व्यवस्था आज ऐसे संक्रमण से गुजर रही है, जहाँ खेत में दो तरह की खेती दिखाई देती है। एक खेती मिट्टी में होती है—गेहूँ, धान, दाल, सरसों, सब्जियाँ और अन्य फसलें उगती हैं। दूसरी खेती डिजिटल संसार में हो रही है—किसान पहचान, भूमि अभिलेख, डिजिटल फसल सर्वेक्षण, मौसम सूचना, कृषि सलाह, बीमा, बाजार और सरकारी योजनाओं के आँकड़े तैयार किए जा रहे हैं। पहली खेती किसान और देश की खाद्य सुरक्षा को सहारा देती है, जबकि दूसरी प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक डेटा-आधारित बनाने का प्रयास है। प्रश्न यह है कि इन दोनों के बीच वास्तविक किसान कहाँ खड़ा है?
भारत सरकार ने सितंबर 2024 में ₹2,817 करोड़ के परिव्यय के साथ डिजिटल कृषि मिशन को मंजूरी दी। इसके अंतर्गत एग्रीस्टैक, किसान रजिस्ट्री, जियो-रेफरेंस्ड ग्राम मानचित्र, डिजिटल फसल सर्वेक्षण, कृषि निर्णय सहायता प्रणाली और अन्य डिजिटल अवसंरचनाएँ विकसित की जा रही हैं। सरकार ने 2026-27 तक 11 करोड़ किसान आईडी बनाने का लक्ष्य रखा था।
अगस्त 2026 तक उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार 10.33 करोड़ से अधिक किसान आईडी बनाई जा चुकी थीं। खरीफ 2025 में डिजिटल फसल सर्वेक्षण 604 जिलों में 28.5 करोड़ से अधिक भूखंडों तक पहुँचा। इन आँकड़ों से डिजिटल कृषि के व्यापक विस्तार का पता चलता है।
लेकिन आँकड़ों की यह व्यापकता अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि प्रत्येक वास्तविक खेती करने वाला व्यक्ति सरकारी डिजिटल व्यवस्था में समान रूप से दिखाई देने लगा है। यही वह बिंदु है जहाँ डिजिटल कृषि की तकनीकी सफलता और किसान के जमीनी अनुभव के बीच अंतर दिखाई देता है।
किसान की पहली समस्या तकनीक नहीं, पहचान है
मान लीजिए किसी किसान के पिता के नाम जमीन दर्ज है। पिता की मृत्यु के बाद तीन बेटे उसी जमीन पर खेती कर रहे हैं। गाँव जानता है कि तीनों खेती करते हैं, खेत की मिट्टी जानती है, फसल जानती है, लेकिन राजस्व अभिलेख में अभी भी पिता का नाम दर्ज है और उत्तराधिकार या बंटवारे की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।
ऐसी स्थिति में डिजिटल प्रणाली के सामने मूल प्रश्न पैदा होता है—किसे किसान माना जाए?
यह समस्या केवल काल्पनिक नहीं है। किसान की डिजिटल पहचान भूमि अभिलेखों और राज्य स्तर की किसान रजिस्ट्री से गहराई से जुड़ी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसान रजिस्ट्री में भूमि-धारक किसानों के साथ किरायेदार तथा बटाईदार किसानों को शामिल करने का प्रावधान है, लेकिन ऐसे किसानों को शामिल करने का निर्णय संबंधित राज्य की नीति के अनुसार हो सकता है। उत्तराधिकार और भूमि लेन-देन से जुड़े अभिलेखों का अद्यतन संबंधित राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इसलिए डिजिटल कृषि की सबसे महत्वपूर्ण चुनौती केवल नई तकनीक बनाना नहीं, बल्कि भूमि के कानूनी मालिक, वास्तविक खेती करने वाले, सह-उत्तराधिकारी, किरायेदार और बटाईदार की अलग-अलग भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से दर्ज करना है।
मालिकाना अधिकारों की सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन वास्तविक खेती करने वाला व्यक्ति भी योजनाओं, कृषि सलाह, बीमा, ऋण और अन्य वैध कृषि सेवाओं में अदृश्य नहीं होना चाहिए।
एग्रीस्टैक : एक बड़ी संभावना, लेकिन सावधानी भी जरूरी
एग्रीस्टैक का उद्देश्य कृषि क्षेत्र के लिए एक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तैयार करना है। इसमें किसान रजिस्ट्री, जियो-रेफरेंस्ड ग्राम मानचित्र और क्रॉप-सोन्ड रजिस्ट्री जैसे प्रमुख घटक हैं। सरकार के अनुसार किसान आईडी का उपयोग डीबीटी योजनाओं, फसल बीमा, एमएसपी आधारित खरीद, ऋण, इनपुट वितरण और आपदा राहत जैसी सेवाओं के साथ एकीकरण में किया जा सकता है।
मार्च 2026 तक 9.20 करोड़ से अधिक किसान आईडी बनाए जाने की जानकारी सरकार ने दी थी। बाद की सरकारी जानकारी में अगस्त 2026 तक यह संख्या 10.33 करोड़ से अधिक बताई गई। इसी व्यवस्था में किरायेदार और बटाईदार किसानों को शामिल करने की संभावना भी बताई गई है, लेकिन इसका क्रियान्वयन राज्य नीति से जुड़ा है।
यहाँ नीति की दिशा स्पष्ट होनी चाहिए—डिजिटल पहचान किसान की सुविधा का माध्यम बने, पात्रता की अनावश्यक बाधा नहीं।
यदि किसी व्यक्ति की जमीन पर खेती वास्तविक रूप से कोई दूसरा व्यक्ति कर रहा है, तो डिजिटल रिकॉर्ड में इन दोनों संबंधों को अलग-अलग दर्ज करने की क्षमता होनी चाहिए। इससे मालिकाना अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे और खेती करने वाले व्यक्ति की प्रशासनिक दृश्यता भी बढ़ेगी।
डिजिटल फसल सर्वेक्षण : खेत का डेटा और किसान का जीवन
डिजिटल फसल सर्वेक्षण का उद्देश्य खेत में बोई गई फसल की जानकारी मोबाइल आधारित प्रणाली के माध्यम से दर्ज करना है। इससे भूखंड स्तर पर फसल क्षेत्र की जानकारी प्राप्त करने, उत्पादन अनुमान, खरीद, इनपुट आपूर्ति और लॉजिस्टिक्स जैसी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने की संभावना है।
लेकिन यहाँ भी एक मूल प्रश्न है—क्या खेत का डिजिटल रिकॉर्ड केवल प्रशासन के लिए उपयोगी है या किसान के लिए भी?
यदि किसी खेत में कौन-सी फसल बोई गई है, इसकी डिजिटल जानकारी सरकार के पास उपलब्ध है, तो उसी जानकारी का उपयोग किसान को मौसम सलाह, बीमा, फसल सुरक्षा, कृषि ऋण और बाजार सूचना देने में भी होना चाहिए।
अर्थात डिजिटल फसल सर्वेक्षण केवल सरकार का डेटा संग्रह अभियान न होकर किसान सेवा का आधार बने।
किसान को ऐप नहीं, समाधान चाहिए
आज किसान के सामने मौसम, बाजार, बीमा, योजनाओं, ऋण, भूमि रिकॉर्ड और कृषि सलाह के लिए अनेक डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं। तकनीकी दृष्टि से यह विस्तार उपयोगी है, लेकिन किसान के लिए सवाल सरल है—
“मुझे खेती करनी है या इंटरनेट चलाना है?”
किसान को अनेक वेबसाइटों, ऐप, पासवर्ड, ओटीपी और अलग-अलग पंजीकरणों के बीच भटकना न पड़े। एक किसान सेवा प्रणाली ऐसी हो जिसमें किसान मोबाइल, सामान्य सेवा केंद्र, पंचायत, हेल्पलाइन या स्थानीय डिजिटल कृषि सहायक के माध्यम से अपनी समस्या दर्ज कर सके और पीछे संबंधित विभाग आपस में काम करें।
सरकारी तंत्र की जटिलता किसान की जटिलता नहीं बननी चाहिए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अर्थ किसान की भाषा में उत्तर
कृषि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। सरकार के अनुसार भारतविस्तार जैसे एआई आधारित कृषि डिजिटल ढाँचे किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि सलाह और सरकारी सेवाओं तक पहुँच उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहे हैं।
लेकिन एआई की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसने कितने प्रश्नों का उत्तर दिया।
वास्तविक प्रश्न यह है—
क्या किसान को सही समय पर सही उत्तर मिला?
यदि गेहूँ पीला पड़ रहा है तो किसान को यह समझना है कि संभावित कारण क्या है, अभी क्या उपाय करना है, कौन-सी कृषि पद्धति उचित हो सकती है और आवश्यकता पड़ने पर प्रमाणित कृषि विशेषज्ञ तक कैसे पहुँचना है।
एआई की सलाह में अनिश्चितता हो तो उसे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए। गंभीर कृषि समस्या में किसान को मानव कृषि विशेषज्ञ से जोड़ने की व्यवस्था भी डिजिटल प्रणाली का हिस्सा होनी चाहिए।
पीएम-किसान और भूमि अभिलेख की चुनौती
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अंतर्गत पात्र भूमि-धारक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता दी जाती है और लाभार्थियों की पहचान राज्य सरकारों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार होती है। वर्तमान व्यवस्था में ई-केवाईसी अनिवार्य है।
यह व्यवस्था डिजिटल प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की क्षमता को दिखाती है, लेकिन साथ ही यह भी बताती है कि डिजिटल लाभ पहुँचाने के लिए भूमि रिकॉर्ड, पहचान और पात्रता का सही होना कितना महत्वपूर्ण है।
उत्तराधिकार लंबित होने, नामांतरण न होने, संयुक्त परिवार में हिस्सेदारी स्पष्ट न होने अथवा रिकॉर्ड में त्रुटि होने जैसी परिस्थितियाँ किसान के लिए व्यावहारिक कठिनाई पैदा कर सकती हैं।
इसलिए डिजिटल कृषि के साथ तेज, पारदर्शी और सरल भूमि अभिलेख अद्यतन प्रणाली भी आवश्यक है।
किसान क्रेडिट कार्ड : वास्तविक खेती करने वाले तक ऋण
कृषि ऋण की समस्या भी भूमि और खेती के संबंध से जुड़ी है। भारतीय रिजर्व बैंक की किसान क्रेडिट कार्ड संबंधी व्यवस्था में मालिक-कृषक के साथ किरायेदार किसान, मौखिक पट्टेदार और बटाईदार तथा कुछ किसान समूहों को भी पात्र श्रेणियों में शामिल किया गया है।
फिर भी व्यवहार में बैंकिंग व्यवस्था और स्थानीय भूमि दस्तावेजों की आवश्यकताओं के बीच अंतर वास्तविक खेती करने वाले छोटे किसान के लिए बाधा बन सकता है।
इसका समाधान केवल नया ऐप बनाना नहीं है। आवश्यकता ऐसी सत्यापित किसान रजिस्ट्री की है जिसे, कानूनी पात्रता और संबंधित राज्य के नियमों के अनुरूप, बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा जा सके।
किसान को हर सरकारी या बैंकिंग कार्यालय में वही दस्तावेज बार-बार जमा न करने पड़ें।
फसल बीमा की असली परीक्षा दावा निपटाने में
फसल बीमा में तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की डिजिटल व्यवस्था में किसान पॉलिसी की स्थिति देख सकता है, आवेदन की स्थिति जाँच सकता है और फसल नुकसान तथा शिकायत से संबंधित सहायता प्राप्त कर सकता है।
लेकिन किसान के लिए अंतिम प्रश्न यह है—
“फसल नष्ट होने के बाद मुझे भुगतान कब मिलेगा?”
इसलिए प्रत्येक दावे को एक विशिष्ट अनुश्रवण संख्या मिलनी चाहिए। किसान को स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए—
– दावा कब दर्ज हुआ;
– सर्वेक्षण कब हुआ;
– नुकसान का आकलन क्या रहा;
– निर्णय किस स्तर पर लंबित है;
– भुगतान कब स्वीकृत हुआ;
– भुगतान क्यों रोका या अस्वीकार किया गया;
– अपील कहाँ और कैसे करनी है।
डिजिटल प्रणाली का अर्थ केवल ऑनलाइन आवेदन नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता होना चाहिए।
ई-नाम : भाव से आगे वास्तविक बाजार
ई-नाम का उद्देश्य देश की कृषि मंडियों को एक डिजिटल मंच से जोड़कर कृषि उत्पादों के लिए पारदर्शी बोली, बेहतर मूल्य खोज, अधिक खरीदारों तक पहुँच और ऑनलाइन भुगतान जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराना है।
लेकिन डिजिटल बाजार की सफलता केवल पंजीकृत किसानों या मंडियों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए।
किसान को जानना है—
कहाँ खरीदार है?
मेरी फसल की गुणवत्ता के अनुसार संभावित मूल्य क्या है?
परिवहन का खर्च कितना होगा?
मंडी तक पहुँचने के बाद कुल शुद्ध प्राप्ति कितनी होगी?
भुगतान कब होगा?
अर्थात डिजिटल बाजार को केवल “भाव बताने वाली प्रणाली” से आगे बढ़कर “निर्णय लेने में मदद करने वाली प्रणाली” बनना होगा।
किसान के लिए एक सरल डिजिटल सेवा द्वार
भविष्य की डिजिटल कृषि नीति का केंद्र “अधिक ऐप” नहीं, बल्कि कम जटिलता होना चाहिए।
एक आदर्श किसान सेवा व्यवस्था में किसान को केवल एक प्रवेश-द्वार दिखाई दे। वह मोबाइल, हेल्पलाइन, पंचायत, सामान्य सेवा केंद्र या डिजिटल कृषि सहायक के माध्यम से पहुँच सके।
पीछे चाहे कृषि विभाग, राजस्व विभाग, बैंक, बीमा कंपनी, मंडी, मौसम विभाग और अन्य संस्थाएँ काम करें, किसान को हर विभाग के लिए अलग-अलग प्रक्रिया से न गुजरना पड़े।
यह व्यवस्था निम्न सेवाओं को एकीकृत कर सकती है—
1. किसान पहचान और किसान रजिस्ट्री;
2. भूमि रिकॉर्ड और उत्तराधिकार की स्थिति;
3. वास्तविक खेती और फसल रिकॉर्ड;
4. सरकारी योजनाओं की पात्रता;
5. पीएम-किसान की स्थिति;
6. कृषि ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड;
7. फसल बीमा और दावा;
8. मौसम एवं कीट सलाह;
9. बाजार मूल्य और खरीदार;
10. शिकायत और अपील;
11. आवेदन की समय-सीमा;
12. भुगतान की स्थिति।
हर गाँव में डिजिटल कृषि सहायक की आवश्यकता
भारत जैसे विशाल और विविध कृषि देश में केवल मोबाइल ऐप पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता।
हर गाँव या ग्राम पंचायत स्तर पर प्रशिक्षित डिजिटल कृषि सहायक की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। उसकी भूमिका केवल किसान का ऑनलाइन फॉर्म भरना नहीं, बल्कि समस्या का समाधान कराने तक साथ देना हो।
उसे यह देखने की क्षमता होनी चाहिए कि—
किसान की पहचान कहाँ अटकी है?
कौन-सा दस्तावेज आवश्यक है?
भूमि रिकॉर्ड में क्या स्थिति है?
फसल बीमा का दावा किस चरण में है?
कौन-सी योजना के लिए पात्रता बनती है?
शिकायत किस अधिकारी के पास लंबित है?
ऐसे सहायक की सफलता इस आधार पर मापी जानी चाहिए कि उसने कितने किसानों के लंबित मामले हल करवाए—न कि उसने कितने फॉर्म भरे।
डिजिटल जवाबदेही : आवेदन से निस्तारण तक
डिजिटल प्रशासन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ट्रैकिंग क्षमता है। इसलिए प्रत्येक किसान आवेदन के साथ एक यूनिक अनुश्रवण संख्या होनी चाहिए।
किसान को स्पष्ट दिखाई दे—
आवेदन प्राप्त → सत्यापन → अधिकारी के पास → निर्णय → भुगतान/सेवा → अपील
हर चरण के लिए समय-सीमा निर्धारित हो। यदि निर्धारित समय में कार्रवाई न हो तो मामला स्वतः अगले अधिकारी के स्तर पर पहुँच जाए।
इससे डिजिटल प्रणाली केवल आवेदन लेने वाली व्यवस्था नहीं रहेगी, बल्कि जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्था बनेगी।
डेटा सुरक्षा भी किसान अधिकार का हिस्सा है
डिजिटल कृषि में किसान का डेटा अत्यंत महत्वपूर्ण है। भूमि, फसल, बैंक, पहचान और कृषि गतिविधि से संबंधित जानकारी संवेदनशील हो सकती है।
एग्रीस्टैक और डिजिटल फसल सर्वेक्षण के संबंध में सरकार ने डेटा सुरक्षा, सहमति और अधिकृत उपयोग से संबंधित व्यवस्थाओं की जानकारी दी है।
भविष्य में किसान को यह समझने योग्य भाषा में बताया जाना चाहिए कि—
मेरा कौन-सा डेटा लिया गया?
क्यों लिया गया?
किस संस्था को दिया गया?
किस उद्देश्य से उपयोग हुआ?
गलत जानकारी को ठीक कराने का तरीका क्या है?
डेटा अधिकार को डिजिटल कृषि का अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए।
डिजिटल कृषि में भाषा की बाधा
भारत में किसान केवल हिंदी या अंग्रेजी में संवाद नहीं करता। देश के अलग-अलग राज्यों में अनेक भाषाएँ और बोलियाँ कृषि जीवन का हिस्सा हैं।
इसलिए डिजिटल कृषि का अगला चरण केवल ऐप की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय भाषा और स्थानीय कृषि ज्ञान को डिजिटल सेवाओं से जोड़ना होना चाहिए।
किसान अपनी भाषा में प्रश्न पूछ सके और उसी भाषा में समझने योग्य उत्तर प्राप्त कर सके। तकनीकी शब्दावली के बजाय स्थानीय और सरल भाषा का प्रयोग किया जाए।
जहाँ आवश्यकता हो, डिजिटल सलाह के साथ कृषि विशेषज्ञ से बात करने की सुविधा भी उपलब्ध हो।
डिजिटल कृषि और महिला किसान
कृषि में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन परिवार और भूमि अभिलेखों की संरचना के कारण कई बार वास्तविक कृषि श्रम और औपचारिक भूमि स्वामित्व के बीच अंतर रहता है।
डिजिटल किसान व्यवस्था में महिलाओं की कृषि भूमिका को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
जहाँ महिला भूमि की सह-मालिक, उत्तराधिकारी या वास्तविक खेती करने वाली है, वहाँ उसके अधिकार और पात्रता डिजिटल प्रणाली में स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाने चाहिए।
डिजिटल कृषि तभी समावेशी होगी जब वह केवल भूमि के नामधारी व्यक्ति को नहीं, बल्कि कृषि कार्य में वास्तविक भागीदारी रखने वाले लोगों को भी ध्यान में रखे।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए अलग दृष्टिकोण
भारत में कृषि जोतों का बड़ा हिस्सा छोटे और सीमांत किसानों के पास है। ऐसे किसान के लिए एक डिजिटल प्रक्रिया में लगने वाला अतिरिक्त समय भी आर्थिक लागत बन सकता है।
इसलिए डिजिटल कृषि सेवाओं को इस प्रश्न से जाँचना चाहिए—
क्या छोटे किसान का समय बचा या बढ़ा?
यदि किसान को एक योजना के लिए तीन कार्यालयों में जाना पड़े, फिर ऑनलाइन आवेदन करना पड़े और अंत में दस्तावेज लेकर पुनः कार्यालय पहुँचना पड़े, तो तकनीक ने प्रक्रिया को पूरी तरह सरल नहीं बनाया है।
डिजिटल व्यवस्था की सफलता तब होगी जब किसान के लिए प्रक्रिया छोटी हो और विभागों के बीच डिजिटल समन्वय बढ़े।
डिजिटल कृषि और जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता, अत्यधिक वर्षा, सूखा, तापमान वृद्धि, ओलावृष्टि और नई प्रकार की फसल समस्याएँ किसानों के सामने चुनौती हैं।
ऐसे समय में डिजिटल कृषि का उपयोग केवल सरकारी रिकॉर्ड के लिए नहीं, बल्कि जलवायु-स्मार्ट कृषि के लिए किया जाना चाहिए।
किसान को स्थानीय स्तर पर समय पर जानकारी मिल सके—
बारिश की संभावना क्या है?
अत्यधिक तापमान का जोखिम कितना है?
बुवाई का उपयुक्त समय क्या है?
सिंचाई कब करनी है?
फसल को किस मौसमीय खतरे से बचाना है?
यदि डिजिटल कृषि डेटा को स्थानीय मौसम और कृषि सलाह से प्रभावी रूप से जोड़ा जाए, तो यह किसान के निर्णय में वास्तविक सहायता कर सकता है।
डिजिटल कृषि और ग्रामीण रोजगार
डिजिटल कृषि केवल किसानों की सेवा व्यवस्था को नहीं बदल सकती, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में नए प्रकार के रोजगार और कौशल की संभावनाएँ भी पैदा कर सकती है।
डिजिटल कृषि सहायक, ड्रोन संचालन, फसल डेटा संग्रह, कृषि मशीनरी प्रबंधन, डिजिटल बाजार संचालन, कृषि-परामर्श और स्थानीय डेटा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित ग्रामीण युवाओं की भूमिका विकसित की जा सकती है।
इससे डिजिटल कृषि को केवल तकनीकी परियोजना के बजाय ग्रामीण कौशल और रोजगार से जोड़ने की संभावना पैदा होगी।
सफलता के मापदंड भी बदलने होंगे
डिजिटल कृषि की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी किसान आईडी बनीं, कितने भूखंडों का सर्वेक्षण हुआ या कितने किसानों ने ऐप डाउनलोड किया।
नए मापदंड होने चाहिए—
– कितने वास्तविक खेती करने वाले किसानों की पहचान हुई;
– कितने उत्तराधिकार और भूमि रिकॉर्ड संबंधी मामले समय पर सुधरे;
– कितने किसानों के सरकारी कार्यालयों के चक्कर कम हुए;
– कितने फसल बीमा दावे समय-सीमा में निपटे;
– कितने पात्र किसानों को संस्थागत ऋण मिला;
– कितने किसानों को समय पर कृषि सलाह मिली;
– कितने किसानों ने डिजिटल बाजार के माध्यम से वास्तविक बिक्री की;
– कितने मामलों में भुगतान समय पर हुआ;
– कितनी शिकायतें निर्धारित समय में हल हुईं;
– कितने किसानों ने डिजिटल सेवा का दोबारा उपयोग किया।
यही वास्तविक परिणाम-आधारित डिजिटल कृषि होगी।
डिजिटल कृषि में मानव सहायता समाप्त नहीं, मजबूत हो
तकनीक का उद्देश्य मानव सहायता को समाप्त करना नहीं होना चाहिए। भारत में भाषा, शिक्षा, डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट उपलब्धता और भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं।
इसलिए डिजिटल कृषि में ऑनलाइन + ऑफलाइन मॉडल आवश्यक है।
किसान को विकल्प मिलना चाहिए—
मोबाइल ऐप,
टोल-फ्री फोन,
व्हाट्सऐप आधारित सहायता,
सामान्य सेवा केंद्र,
ग्राम पंचायत,
डिजिटल कृषि सहायक,
कृषि विशेषज्ञ और
भौतिक सहायता केंद्र।
जिस किसान के पास स्मार्टफोन नहीं है, वह डिजिटल कृषि से बाहर न हो जाए।
डिजिटल कृषि का अंतिम उद्देश्य
किसान तकनीक का विरोधी नहीं है। किसान ऐसी तकनीक से परेशान हो सकता है जो उसे खेत से उठाकर मोबाइल पर, मोबाइल से वेबसाइट पर और वेबसाइट से दफ्तर तक भेजती रहे।
उसे उल्टा रास्ता चाहिए—
इंटरनेट से खेत तक,
आँकड़ों से निर्णय तक,
योजना से लाभ तक,
बाजार से भुगतान तक,
और सरकार से किसान तक।
किसान के लिए डिजिटल कृषि का अर्थ यह होना चाहिए कि उसकी समस्या का समाधान पहले से अधिक सरल, तेज और पारदर्शी हो।
जिस दिन किसान अपनी आवाज या सरल मोबाइल प्रक्रिया से यह जान सकेगा कि उसकी किसान पहचान कहाँ है, भूमि रिकॉर्ड में क्या स्थिति है, कौन-सी योजना उसके लिए उपलब्ध है, बीमा दावा किस चरण में है, फसल का बाजार कहाँ है और भुगतान कब मिलेगा—उस दिन डिजिटल कृषि वास्तव में खेत में उतर चुकी मानी जाएगी।
निष्कर्ष
भारत में डिजिटल कृषि का विस्तार एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और तकनीकी परिवर्तन है। किसान आईडी, एग्रीस्टैक और डिजिटल फसल सर्वेक्षण जैसी व्यवस्थाएँ कृषि प्रशासन को अधिक डेटा-आधारित बनाने की क्षमता रखती हैं। वर्तमान में करोड़ों किसान आईडी और करोड़ों भूखंडों के डिजिटल सर्वेक्षण का विस्तार इस परिवर्तन के पैमाने को दिखाता है।
लेकिन डिजिटल कृषि की वास्तविक कसौटी सूचना-पटल पर दिखाई देने वाले आँकड़े नहीं हैं। उसकी कसौटी खेत में खड़ा किसान है।
यदि किसान को अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए बार-बार दस्तावेज लेकर कार्यालय जाना पड़े, यदि उत्तराधिकार के कारण वास्तविक खेती करने वाला डिजिटल रिकॉर्ड से बाहर हो जाए, यदि बटाईदार की स्थिति राज्य-स्तरीय व्यवस्था के कारण अस्पष्ट रहे, यदि बीमा दावा दर्ज होने के बाद किसान को उसकी स्थिति पता न चले, अथवा बाजार का डिजिटल भाव वास्तविक बिक्री और उचित भुगतान में न बदले, तो तकनीकी विस्तार के बावजूद डिजिटल कृषि का मानवीय उद्देश्य अधूरा रहेगा।
इसलिए अब नीति का केंद्र “कितना डिजिटल हुआ” से बदलकर “किसान का कितना काम सरल हुआ” होना चाहिए।
आँकड़ों की खेती बहुत हो चुकी। अब डिजिटल भारत को किसान की जमीन पर परिणाम उगाने होंगे।
सूचना-पटल पर हरी पट्टी बढ़ना प्रगति का एक संकेत हो सकता है, लेकिन किसान के खेत में फसल बचना, उसकी आय सुरक्षित होना, उसका समय बचना और उसका अधिकार स्पष्ट होना ही डिजिटल कृषि की वास्तविक सामाजिक कसौटी है।
इंटरनेट किसान के लिए बनेगा, किसान इंटरनेट के लिए नहीं—यही किसान-केंद्रित डिजिटल कृषि की मूल दिशा होनी चाहिए।
लेखक की प्रेरणा एवं क्षेत्रीय अनुभव
हाल के समय में अपने खेतों पर पहुँचने का अवसर मिला। इन खेतों को मैं अपने बचपन से देखता और समझता रहा हूँ। अलग-अलग मौसमों में इन खेतों पर होने वाली फसलों, खेती की बदलती परिस्थितियों और कृषकों की आवश्यकताओं को लंबे समय से निकटता से देखने का अनुभव रहा है।
हाल की इन यात्राओं के दौरान खेतों पर काम कर रहे कृषकों से प्रत्यक्ष बातचीत हुई। फसल, मौसम, खेती की लागत, कृषि संबंधी समस्याओं, सरकारी योजनाओं और बदलती तकनीकी व्यवस्था को लेकर उनके अनुभवों और प्रश्नों को समझने का अवसर मिला।
इन बातचीतों में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि किसान तकनीक का विरोधी नहीं है। वह चाहता है कि तकनीक उसके लिए उपयोगी हो, उसका समय बचाए और उसकी वास्तविक समस्याओं का समाधान करे। किसान के लिए यह अधिक महत्वपूर्ण है कि फसल की समस्या आने पर उसे समय पर सही सलाह मिले, सरकारी योजना का लाभ सरलता से मिले, बीमा का दावा स्पष्ट रूप से दिखाई दे, बाजार में उचित खरीदार की जानकारी मिले और भूमि या किसान पहचान से संबंधित समस्या के समाधान के लिए उसे बार-बार अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।
अपने बचपन से देखे जा रहे खेतों को आज की डिजिटल कृषि व्यवस्था से जोड़कर देखने पर यह अनुभव हुआ कि खेत की वास्तविकता और डिजिटल रिकॉर्ड के बीच अभी भी कई प्रश्न मौजूद हैं। किसान अपने खेत, मिट्टी, मौसम और फसल को प्रत्यक्ष अनुभव से समझता है, जबकि सरकारी डिजिटल व्यवस्था में उसकी पहचान, भूमि और फसल से संबंधित जानकारी अलग-अलग प्रणालियों में दर्ज होती है।
इन्हीं व्यक्तिगत अनुभवों, खेतों पर किए गए प्रत्यक्ष अवलोकन और कृषकों के साथ हुई बातचीत ने मुझे इस विषय पर विस्तार से विचार करने और यह शोध-आलेख लिखने के लिए प्रेरित किया।
इस आलेख का उद्देश्य डिजिटल कृषि का विरोध करना नहीं, बल्कि यह प्रश्न सामने रखना है कि डिजिटल कृषि का विस्तार किसान के खेत, श्रम, समय, अधिकार और वास्तविक जरूरतों तक किस प्रकार पहुँचे।
मेरे लिए डिजिटल कृषि की वास्तविक कसौटी यही है कि जिस खेत को मैंने अपने बचपन से मौसम-दर-मौसम बदलते देखा है, उस खेत में काम करने वाला किसान भी डिजिटल भारत की व्यवस्था में उतना ही स्पष्ट दिखाई दे, जितना वह अपनी जमीन पर दिखाई देता है।
आँकड़ों की खेती से आगे बढ़कर अब किसान के खेत में परिणाम की खेती आवश्यक है।
