विजय की ✒ कलम

संपादकीय | देश-विदेशकहते हैं कि सत्ता का नशा जब सिर चढ़कर बोलने लगता है, तब इंसान को अपने अलावा कोई दिखाई नहीं देता। उसे लगता है कि पूरी दुनिया उसकी मर्जी से चलेगी, उसके फैसले ही अंतिम होंगे और उसकी ताकत के सामने कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करेगा। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां जनता से बड़ा कोई नहीं होता। जनता जब अपना फैसला सुनाती है तो बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं का घमंड भी चकनाचूर हो जाता है।अमेरिका के हालिया मध्यावधि चुनाव ने कुछ ऐसा ही संदेश पूरी दुनिया को दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। यह केवल अमेरिका की राजनीति का परिणाम नहीं है, बल्कि दुनिया की राजनीति के लिए भी एक बड़ा संदेश है। जनता ने साफ कर दिया है कि सत्ता में बैठे लोग चाहे कितने ही ताकतवर क्यों न हों, यदि उनके फैसले आम जनता की जिंदगी मुश्किल बनाते हैं तो लोकतंत्र में उन्हें इसका जवाब देना ही पड़ता है।आखिर ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका की जनता ने अपनी ही सरकार के खिलाफ इस तरह नाराजगी जाहिर की? इसका सबसे बड़ा कारण महंगाई, आर्थिक दबाव, व्यापारिक नीतियां और युद्ध से पैदा हुई अनिश्चितता मानी जा रही है। ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय बाजार, ऊर्जा आपूर्ति और आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ाया है। पेट्रोल-डीजल से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक, हर चीज की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर दुनिया के अनेक देशों पर पड़ा है।इसका सबसे ज्यादा असर उन विकासशील और गरीब देशों पर पड़ता है, जिनकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक पेट्रोलियम पदार्थों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर निर्भर है। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो परिवहन महंगा होता है, माल ढुलाई का खर्च बढ़ता है और धीरे-धीरे इसका बोझ आम आदमी की रसोई तक पहुंच जाता है। किसान की लागत बढ़ती है, व्यापारी परेशान होता है और मध्यमवर्गीय परिवार का घरेलू बजट बिगड़ जाता है।सवाल यह है कि आखिर दुनिया को युद्ध और तनाव की आग में झोंककर कोई देश लंबे समय तक खुशहाल कैसे रह सकता है? किसी दूसरे देश का घर जलाकर अपने घर में शांति से रोटी नहीं खाई जा सकती। युद्ध में केवल सैनिकों की जान नहीं जाती, बल्कि लाखों परिवारों का भविष्य, रोजगार, व्यापार और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीदें भी प्रभावित होती हैं।अमेरिका की जनता ने अपने चुनावी फैसले से यही संदेश दिया है कि उसे टकराव नहीं, स्थिरता चाहिए; उसे महंगाई नहीं, राहत चाहिए; उसे युद्ध की राजनीति नहीं, रोजगार और विकास चाहिए।इस चुनाव का एक बड़ा संदेश उन सभी नेताओं के लिए भी है जो सत्ता को अपनी निजी ताकत समझ बैठते हैं। लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक है। जनता जिसे सत्ता की कुर्सी पर बैठाती है, उसे नीचे उतारने का अधिकार भी उसी के पास है। न कोई पद स्थायी है, न कोई सत्ता हमेशा के लिए होती है और न ही किसी नेता का अहंकार लोकतंत्र से बड़ा हो सकता है।हालांकि इस चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार का यह अर्थ नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप की राष्ट्रपति पद की कुर्सी चली गई है या दुनिया में महंगाई और युद्ध की समस्याएं तत्काल समाप्त हो जाएंगी। लेकिन इतना जरूर है कि अब उनकी सरकार के सामने राजनीतिक चुनौतियां बढ़ेंगी। संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के मजबूत होने से उनके फैसलों पर सवाल उठेंगे और नीतियों को लागू करना पहले जितना आसान नहीं होगा।अब सवाल यह है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप इस जनादेश से सबक लेंगे? क्या वे अपनी नीतियों की समीक्षा करेंगे? क्या वे दूसरे देशों के साथ टकराव के बजाय बातचीत और मित्रता का रास्ता अपनाएंगे?भारत जैसे देश के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापार, निर्यात, आयात और ऊर्जा जरूरतों पर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का सीधा असर पड़ता है। यदि दुनिया में युद्ध का तनाव कम होता है, व्यापारिक संबंध बेहतर होते हैं और तेल की कीमतों में स्थिरता आती है तो भारत सहित अनेक देशों को राहत मिल सकती है। लेकिन यह राहत अपने आप नहीं आएगी, इसके लिए कूटनीतिक प्रयास और आर्थिक नीतियों में संतुलन जरूरी होगा।डोनाल्ड ट्रंप को चाहिए कि वे अब अहंकार और टकराव की राजनीति से बाहर निकलें। अमेरिका के हितों की रक्षा करना उनका अधिकार है, लेकिन दूसरे देशों के हितों और संप्रभुता का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है। भारत के साथ मित्रता, व्यापारिक समझौते और आपसी विश्वास को मजबूत करना दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा। रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या पश्चिम एशिया का तनाव, अमेरिका को अपनी ताकत का इस्तेमाल शांति स्थापित करने के लिए करना चाहिए, न कि तनाव बढ़ाने के लिए।यह चुनाव केवल डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के लिए चेतावनी नहीं है, बल्कि दुनिया के हर उस शासक के लिए सबक है जो जनता की परेशानियों को नजरअंदाज करके अपनी नीतियों को ही सर्वोपरि समझता है।भारत में भी इस चुनाव से एक संदेश लिया जाना चाहिए। महंगाई, रोजगार, किसानों की समस्याएं और व्यापारियों की परेशानियां किसी भी सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे होने चाहिए। राजनीतिक दलों को एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय जनता को राहत देने के लिए काम करना चाहिए।साथ ही भारतीय नागरिकों और व्यापारियों को भी लोकल फॉर वोकल और स्वदेशी को बढ़ावा देना चाहिए। अपने देश में बने सामान को प्राथमिकता दें, स्थानीय व्यापारियों से खरीदारी करें और देश का पैसा देश में ही रखने का प्रयास करें। जब स्थानीय व्यापार मजबूत होगा, तभी रोजगार बढ़ेगा और देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।आखिर में डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक ही संदेश है—अभी भी समय है, अपनी नीतियों पर पुनर्विचार कीजिए, दुनिया के देशों से मित्रता बढ़ाइए, युद्ध के बजाय शांति का रास्ता चुनिए और जनता का विश्वास दोबारा जीतने का प्रयास कीजिए।क्योंकि इतिहास गवाह है कि ताकत के बल पर कुछ समय तक दुनिया को डराया जा सकता है, लेकिन जनता का दिल केवल अच्छे कामों से जीता जा सकता है।लोकतंत्र में जनता का फैसला ही सबसे बड़ा फैसला होता है। कुर्सी पर बैठने वाला बदल सकता है, लेकिन जनता की ताकत कभी नहीं बदलती।इस बार अमेरिका की जनता ने दुनिया को बता दिया है कि अहंकार की उम्र लंबी नहीं होती और लोकतंत्र में जनता से बड़ा कोई नहीं होता
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