भोपाल :- जिन्होंने सेवा को अपने जीवन का मिशन बनाया
आज संत हिरदाराम साहिब की 120वीं जयंती है। वे एक सम्मानित हिंदू सिंधी संत, आध्यात्मिक गुरु और मानवतावादी थे, जिन्होंने अपना जीवन निस्वार्थ सेवा, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और वंचितों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया था।
संत हिरदाराम साहिब का जन्म 21 सितंबर 1906 को ब्रिटिश भारत के सिंध प्रांत के नवाबशाह जिले के भिरिया गाँव में श्री रामचंद सहजराम और श्रीमती रोचलबाई के घर हुआ था। कम उम्र से ही उनकी रुचि आध्यात्मिकता और वैराग्य की ओर थी। वे बाबा हरिराम साहिब के शिष्य बने, अपने गुरु के मार्गदर्शन में संन्यास ग्रहण किया और उन्हें ‘हिरदाराम साहिब’ नाम दिया गया। वे बाल-ब्रह्मचारी रहे और अपना पूरा जीवन आध्यात्मिक अनुशासन और मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया।
ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद, संत हिरदाराम 1948 में भारत आ गए। उन्होंने भारत में अपने शुरुआती साल पुष्कर और अजमेर के आसपास बिताए, जहाँ वे गरीब और जरूरतमंद लोगों की सेवा करते रहे।
जब 19 जून 1947 को बाबा हरिराम साहिब का निधन हुआ, तो संत हिरदाराम ने अपने गुरु की आध्यात्मिक गद्दी संभालने की इच्छा नहीं जताई। उन्होंने गद्दी संभालने से इनकार कर दिया और इसके बजाय सेवा और मानवतावादी कार्यों के व्यापक मिशन को आगे बढ़ाने का फैसला किया। इस फैसले से पता चलता है कि उनका जीवन आगे किस दिशा में बढ़ने वाला था।
1962 में, संत हिरदाराम अजमेर से भोपाल के पास बैरागढ़ आ गए, जो उनकी मुख्य कर्मभूमि बन गई। उन्होंने बहुत ही सादा जीवन जिया और खुद को स्थानीय लोगों, खासकर गरीबों और वंचितों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।
उनका मूल मंत्र था “मानव सेवा ही माधव सेवा है” — यानी मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। उनके लिए आध्यात्मिकता केवल प्रार्थना या व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित नहीं
