
24 बिंदुओं की शिकायत पर पांच माह से आंदोलन, जनपद सदस्य ने उठाई CBI जांच की मांगअनिल शुक्ला की रिपोर्टबिलासपुर। एन टी पी सी सीपत में राखड़ परिवहन और राखड़ बांध निर्माण को लेकर कथित अनियमितताओं का मामला गंभीर होता जा रहा है। फर्जी बिल्टी, वास्तविक दूरी से अधिक परिवहन दर्शाने, एक ही वाहन को अलग-अलग नंबरों से दर्ज करने, GPS ट्रैकिंग में कथित हेरफेर और भुगतान में गड़बड़ी जैसे आरोपों के बीच AGM अनंत वासने के बिहार स्थानांतरण की चर्चा ने जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी का तबादला कर देने मात्र से करोड़ों रुपये की कथित अनियमितताओं की जांच का सवाल खत्म हो सकता है? जनपद सदस्य क्षेत्र क्रमांक-8 रेवा शंकर साहू द्वारा जिला प्रशासन को सौंपी गई 24 बिंदुओं की शिकायत पर पांच माह से आंदोलन कर रहे जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय किए बिना विवाद का समाधान संभव नहीं है।500 से 1,000 किलोमीटर की बिल्टी, एक वाहन के कई नंबरों का आरोपशिकायतकर्ताओं का आरोप है कि आसपास के क्षेत्रों में राखड़ की आपूर्ति के बावजूद रिकॉर्ड में 500 से 1,000 किलोमीटर तक की परिवहन दूरी दर्शाए जाने की आशंका है। खैरा, गतौरा, पंधी, मोपका और अकलतरा सहित संबंधित स्थानों के वास्तविक मार्ग, डिलीवरी रिकॉर्ड और परिवहन बिल्टियों का मिलान कराने की मांग की गई है।आंदोलनकारियों ने एक ही वाहन को कथित तौर पर 15 से 25 अलग-अलग नंबरों से ट्रिप रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने की आशंका जताई है। उन्होंने वाहन पंजीयन, चेसिस नंबर, ट्रिप शीट, लोडिंग रजिस्टर और भुगतान अभिलेखों की तकनीकी जांच की मांग की है। GPS ट्रैकिंग में कथित हेरफेर के आरोपों के बीच टोल प्लाजा रिकॉर्ड, FASTag लेन-देन और वास्तविक वाहन आवाजाही का मिलान भी जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है।यदि रिकॉर्ड में दर्ज दूरियों, वाहनों और वास्तविक परिवहन में अंतर मिलता है, तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि बिलों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ और भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किए गए।2006 से राखड़ बांध निर्माण, खनिज रॉयल्टी पर भी सवालशिकायत में वर्ष 2006 से शुरू हुए राखड़ बांध निर्माण कार्य का उल्लेख करते हुए लाल गिट्टी, बोल्डर और चिप्स जैसी निर्माण सामग्री के स्रोत पर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि बिलासपुर खनिज क्षेत्र में संबंधित सामग्री के लिए वैध खदान पट्टों और लाइसेंस की स्थिति की जांच होनी चाहिए।आंदोलनकारियों ने सवाल उठाया है कि यदि निर्माण सामग्री वैध खदानों से लाई गई थी, तो उसके खनिज पट्टे, रॉयल्टी पर्चियां, परिवहन दस्तावेज और खरीद बिल क्या कहते हैं? उन्होंने आशंका जताई है कि निर्माण कार्यों में इस्तेमाल सामग्री के संबंध में बिल और रॉयल्टी पर्चियों की सत्यता की जांच आवश्यक है।NTPC के स्टेज-3 की खुदाई से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ के राखड़ बांध निर्माण में कथित इस्तेमाल का मुद्दा भी शिकायत में शामिल है। आंदोलनकारियों ने मांग की है कि निविदा की शर्तों, सामग्री के स्रोत, रॉयल्टी और भुगतान का परीक्षण किया जाए। यदि सामग्री और भुगतान की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी, तो संबंधित दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए; और यदि अनियमितता हुई है, तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।भुगतान और कथित 50 प्रतिशत हिस्सेदारी की जांच की मांगराखड़ परिवहन के भुगतान में कथित अनियमितताओं को लेकर भी शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। शिकायत में कुछ परिवहनकर्ताओं को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाने और कथित 50 प्रतिशत हिस्सेदारी दिए जाने का आरोप लगाया गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।आंदोलनकारियों ने परिवहन टेंडर, कार्यादेश, बिल्टी, भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित बैंक लेन-देन की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि पर्याप्त आधार मिलने पर सक्षम कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित व्यक्तियों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड की भी जांच की जाए, ताकि कथित संपर्कों और संभावित मिलीभगत की पड़ताल हो सके।14 टन क्षमता की सड़क पर 60 से 70 टन भार का आरोपशिकायत में लगभग 14 टन भार क्षमता वाले सड़क मार्गों पर 60 से 70 टन तक भार वाले वाहनों के परिचालन का आरोप लगाया गया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इससे सड़कों को नुकसान और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने RTO और जिला प्रशासन से वाहनों के वास्तविक भार, परमिट और ओवरलोडिंग की जांच कर कार्रवाई की मांग की है।इसके अलावा राखड़ बांध से पानी के रिसाव के कारण हरदा, नवागांव और आसपास के क्षेत्रों में कृषि भूमि प्रभावित होने, किसानों को मुआवजा मिलने में परेशानी, सिंचाई नहरों में राखड़ जमा होने और सफाई व्यवस्था की कमी जैसे मुद्दे भी शिकायत में उठाए गए हैं।दुर्घटनाएं, मुआवजा और रोजगार के वादों पर भी सवालआंदोलनकारियों ने राखड़ बांध क्षेत्र में दुर्घटनाओं, मवेशियों की मौत, सुरक्षा व्यवस्था की कमी और प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा नहीं मिलने के आरोप लगाए हैं। श्रमिकों की सुरक्षा, ESI नियमों के पालन, परिवहन वाहनों में हेल्पर की व्यवस्था तथा प्रभावित गांवों के बेरोजगारों को प्राथमिकता से रोजगार देने की मांग भी की गई है।शिकायत में स्थानीय स्तर पर बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास तथा लंबे समय से कार्यरत एजेंसियों की निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का मुद्दा भी शामिल है। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से आश्वासन दिए जाने के बावजूद कई समस्याएं अब भी बनी हुई हैं।पांच माह से आंदोलन, फिर भी कार्रवाई पर सवालजनपद सदस्य रेवा शंकर साहू, गतौरा के पूर्व सरपंच एवं वर्तमान सरपंच प्रतिनिधि नरेंद्र वस्त्रकार सहित अन्य ग्रामीणों के अनुसार, वे ग्राम सुखरीपाली स्थित ठाकुरदेवा के पास लगभग पांच माह से शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। उनका दावा है कि NTPC के सतर्कता विभाग और संबंधित अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाने के बावजूद उन्हें अब तक ठोस कार्रवाई की जानकारी नहीं मिली है।आंदोलनकारियों ने NTPC प्रबंधन, सतर्कता विभाग, NHAI और बिलासपुर RTO की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए परिवहन टेंडर, कार्यादेश, बिल्टी, GPS डेटा, टोल भुगतान, बैंक लेन-देन और खनिज रॉयल्टी के रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच की मांग की है।AGM अनंत वासने के बिहार स्थानांतरण की चर्चा के बीच आंदोलनकारियों ने CBI जांच की मांग दोहराई है। उनका कहना है कि यदि संबंधित अधिकारी या अन्य लोगों के कार्यकाल में अनियमितताएं हुई हैं, तो केवल स्थानांतरण से जवाबदेही तय नहीं हो सकती। उन्होंने छत्तीसगढ़ स्थित CBI कार्यालय और नई दिल्ली मुख्यालय तक शिकायत पहुंचाने की तैयारी की बात कही है।NTPC प्रबंधन का पक्ष जानने का प्रयासइस पूरे मामले की शिकायत जनपद सदस्य क्षेत्र क्रमांक-8 रेवा शंकर साहू द्वारा की गई है। NTPC का पक्ष जानने के लिए वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी प्रवीण भारती से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी शामिल किया जाएगा।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 24 बिंदुओं वाली शिकायत पर जांच कब होगी और जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी? बिल्टी, वाहन नंबर, GPS, टोल रिकॉर्ड, खनिज रॉयल्टी और भुगतान का स्वतंत्र मिलान ही आरोपों की वास्तविकता सामने ला सकता है। यदि अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो नियमानुसार जिम्मेदार अधिकारियों, परिवहनकर्ताओं और संबंधित एजेंसियों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। तबादला प्रशासनिक निर्णय हो सकता है, लेकिन वह जांच और जवाबदेही का विकल्प नहीं है।
