बिलासपुर :- नवरात्रि शक्ति का प्रतीक है यह 9 दिन मां के नौ रूपों को समर्पित है उनके यह नौ रूप अलग-अलग देवीय रूपों को समर्पित है हर दिन एक विशेष देवी का उपासना की जाती है प्रथम स्वरूप शैलपुत्री (प्रतीक का स्वरूप) द्वितीय ब्रह्मचारिणी (तप और साधना की देवी) तृतीय चंद्रघटा (शांति और शक्ति का रूप) कूष्मांडा (ब्रहमांड सृजक) स्कंदमाता (मातृत्व का प्रतीक) कात्यायनी (साहन और बल की देवी) कालरात्रि (बुराई का नाश करने वाली) महागौरी (करुणा और पवित्रता की देवी) सिद्धिदात्री (सिद्धियों की प्रदाता ।
नवरात्र केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं है यह आत्मिक शुद्ध का भी समय है, व्रत और पूजा के माध्यम से व्यक्ति संयम, साधना और आत्मनिरीक्षण करता है।
धार्मिक पर्व के अनुसार पूजा, व्रत कन्या पूजन और दुर्गा सप्तशती का पाठ प्रमुख अनुष्ठान है. नौवि दिन कन्या पूजा का विशेष महत्व होता है ।
वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह पर्व साल में दो है। चैत्र नवरात्रि (मार्च – अप्रैल) शारदीय नवरात्री (सिंतबर-अक्टूबर) दोनों ही समय मौसम बदलने के होते है । जिसके कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity) कमजोर होती है।
उपवास में जब सात्विक भोजन करते हैं तो बॉडी डिटोक्स होती है ध्यान करने से मन शांत होता है शरीर हार्मोनल बैलेंस रहता है जिससे ऊर्जा और स्वास्थ्य बेहतर रहता है
नवरात्र संस्कृत रंगों से सजा एक सांस्कृतिक विविधता का पर्व भी है अलग-अलग राज्यों में इसका महत्व भी अलग-अलग है बंगाल में दुर्गा पूजा का उत्सव अपने चरम पर होता है उत्तर भारत में रामलीला का मंचन होता है वही गुजरात में गरबा और डांडिया की धूम होती है इससे लोगों में सामाजिक जुड़ाव एवं मानसिक खुशी का एहसास होता है
मां के नौ स्वरूप हमें साहस धैर्य ज्ञान और करुणा के संदेश देते हैं यह पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक शक्ति विद्यमान है जिसे जागृत कर अपने जीवन में किसी भी कठिनाई का सामना कर सकता है जैसे मां दुर्गा ने असुरों का नाश कर धर्म की स्थापना की थी की थी वही राम ने रावण का वध करने की तैयारी भी नवरात्रि में ही की थी इसलिए इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत भी कहा जाता है
“जय माँता दी”
“माही संतवानी “