इंदौर :+ दशहरा अर्थात विजयादशमी का पर्व आसुरी शक्तियों पर देवी शक्ति की विजय का पर्व है तथा दशानन रावण पर भगवान श्रीराम की जीत का स्मरण कराता है। महाभारत में विजयादशमी पांडवों की कौरवों पर जीत का प्रतीक भी माना जाता है। अलग अलग राज्य और शहर में दशहरा मनाने का रिवाज भी पृथक पृथक है। मैसूर शहर पारम्परिक रूप से दशहरा समारोह का प्रमुख केंद्र रहा है, शहर में सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रतियोगिता का आयोजन होता है। मैसूर राजपरिवार हाथी की सवारी करता है और शहर के जुलूस में भाग लेता है। दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में इस दिन ज्ञान, विद्या, संगीत, कला की देवी सरस्वती को पूजा जाता है।
यह पर्व महाराष्ट्र में ऐतिहासिक रूप में महत्वपूर्ण रहा है। सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज और पेशवा सहित मराठा सेनाए नए सैन्य अभियान की शुरुआत करती है। महाराष्ट्र मप्र, कोंकणा के आदिवासी समाज सहित कई अन्य समुदाय सोने के प्रतीक रूप में आप्टा पेड़ की पत्तियां का आदान प्रदान करते हैं। भारत और नेपाल में इस पर्व पर युवा अपने परिवार से मिलने और आशीर्वाद लेने घर घर जाते हैं।
विजयादशमी की सार्थकता अच्छाई पर बुराई की जीत, सत्य की स्थापना, और धर्म की पुनर्स्थापना से है जिसके प्रतीक स्वरूप भगवान श्री राम द्वारा रावण वध और देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध बताया जाता है। यह आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन, और अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, और नकारात्मक प्रवृतियों पर विजय पाने की प्रेरणा देता है। यह पर्व प्रेरणा देता है कि जीत हमेशा सत्य न्याय धर्म, नैतिक मूल्यों का पालन का संदेश देती हैं।
विजयादशमी समाज में एकता, सौहार्द को बढ़ावा देता है। यह पर्व शुभ माना जाता है ओर लोग अक्सर इस दिन नए कार्य और नई परियोजनाओं की शुरुआत करते है। यह पर्व हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का अवसर प्रदान करता है।
विजयदशमी पर शस्त्र पूजन का बहुत महत्व है। योद्धा अपने शस्त्र की पूजा करते है तथा लेखक अपनी पुस्तके और लेखनी को देवी मां के चरणों में रखकर उन्हें वापस प्राप्त करते हैं।
धर्मों विजयते नित्यं अधर्मो नश्यते सदा।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्मों जयति नान्यथा।।
अर्थात धर्म हमेशा जीतता हैं, अधर्म का नाश होता है केवल सत्य और धर्म की विजय होती हैं।
डॉ विजय पाटिल
सेंधवा जिला बड़वानी