देश क़ी राज्य सरकारों को पंजाब दिल्ली और क़ा सरकार तुहाडे द्वार व डोरस्टेप डिलीवरी ऑफ पब्लिक सर्विसेज यह मॉडल अपनाने की खास जरूरत है
सरकारी दफ्तरों के चक्कर, अनसुनी शिकायतें,बिना पहचान आईकार्ड के कर्मचारी, ड्रेस कोड का उल्लंघन, फाइलों का महीनों लंबित रहना और जवाबदेही का अभाव दुर्भाग्यपूर्ण -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।पीएम से लेकर केंद्र और राज्य स्तर केप्रत्येक मंत्री के भाषणों में विकसित भारत एक केंद्रीय संकल्प के रूप में उभरकर सामने आता है। इस संकल्प के चार प्रमुख स्तंभ, तकनीकी नवाचार,आर्थिक विकास, सामाजिक समावेशन और सुशासन भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाले तत्व माने जा रहे हैं।इनमें से सुशासन वह आधार है, जिसपर बाकी सभी स्तंभ टिके होते हैं।किंतु जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी और न्यायालयीन कार्यालयों में व्याप्त अनुशासनहीनता, कमजोर दंड व्यवस्था और कार्य-संस्कृति की गिरावट इस सपने को खोखला करने का कार्य कर रही है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत के आम नागरिक के लिए सुशासन कोई सैद्धांतिक शब्द नहीं,बल्कि रोज़मर्रा का अनुभव है। सरकारी दफ्तरों के चक्कर, अनसुनी शिकायतें,बिना पहचान आईकार्ड के कर्मचारी, ड्रेस कोड का उल्लंघन, फाइलों का महीनों लंबित रहना और जवाबदेही का अभाव। यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास के क्षरण का संकेत है।दूसरी तरफ दिल्ली और पंजाब की सरकार प्रमुखता से सरकार तुहाडे द्वार व सरकार आपके द्वार के माध्यम से घर -घर सेवाएं प्रदान कर रही है।इस पहल के तहत, मुख्यमंत्री के नेतृत्व में पंजाब में 10 दिसंबर 2023 से 43 सरकारी सेवाएं नागरिकों के घर तक पहुंचाई जा रही हैं, जिसमें दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं है। इस तर्ज पर पूरे देश क़ी राज्य सरकारों को यह मॉडल अपनाने की खास जरूरत है।

साथियों बात अगर हम सुशासन की अवधारणा: अंतरराष्ट्रीय मानकों में भारत कहां खड़ा है इसको समझने की करें तो विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र और ओसीईडी जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अनुसार सुशासन के प्रमुख तत्व हैं,पारदर्शिता,जवाबदेही,कानून का शासन,दक्षता और नागरिक- केन्द्रित सेवाएं। विकसित देशों में सरकारी कर्मचारी केवल सेवा प्रदाता नहीं,बल्कि सार्वजनिक विश्वास के संरक्षक माने जाते हैं।वहां ड्रेस कोड,पहचान पत्र, समयबद्ध सेवा और व्यवहारिक शिष्टाचार अनिवार्य प्रशासनिक अनुशासन का हिस्सा हैं।इसके विपरीत भारत में अनेक सरकारी और न्यायालयीन कार्यालयों में कर्मचारी न तो निर्धारित ड्रेस कोड का पालन करते हैं, न ही पहचान पत्र प्रदर्शित करते हैं।यह केवल एक औपचारिक कमी नहीं,बल्कि सत्ता और नागरिक के बीच असमानता की मानसिकता को दर्शाता है, जहां कर्मचारी स्वयं को जवाबदेह नहीं मानता।
साथियों बात अगर हम अनुशासन हीनता: विकसित भारत की सबसे बड़ी आंतरिक बाधा इसको समझने की करें तो,अनुशासन किसी भी संगठन की रीढ़ होता है,विशेषकर शासन व्यवस्था में। किंतु भारत के शासकीय कार्यालयों में अनुशासन की भारी कमी एक सामान्य दृश्य बन चुकी है। कार्यालय समय का पालन न करना,नागरिकों से असम्मानजनक व्यवहार, नियमों की खुली अवहेलना और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा आंख मूंद लेना ये सभी प्रशासनिक विफलता के स्पष्ट संकेत हैं।न्यायालयीन परिसरों में भी स्थिति भिन्न नहीं है। न्याय के मंदिरों में यदि अनुशासन और पारदर्शिता ही कमजोर हो, तो आम नागरिक का न्याय प्रणाली पर विश्वासडगमगाना स्वाभाविक है। विकसित राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।
साथियों बात अगर हम कमजोर दंड व्यवस्था और दण्डहीनता की संस्कृति इसको समझने की करें तो प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन तभी रुकता है जब उसके परिणाम स्पष्ट और कठोर हों। भारत में समस्या यह नहीं है कि नियम नहीं हैं, बल्कि यह है कि नियमों के उल्लंघन पर दंड की प्रक्रिया कमजोर,धीमी और अक्सर राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से प्रभावित रहती है। जब कर्मचारी जानते हैं कि ड्रेस कोड न मानने, पहचान पत्र न लगाने या नागरिकों को परेशान करने पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होगी,तो अनुशासन स्वतः समाप्त हो जाता है। दण्डहीनता की यह संस्कृति सुशासन के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
साथियों बात अगर हम फाइल संस्कृति,देरी और प्रशासनिक उदासीनता इसको समझने की करें तो फाइल लंबित है भारत की शासन व्यवस्था का सबसे कुख्यात वाक्य बन चुका है। समय पर काम न होना, अनावश्यक प्रक्रियाएं और कर्मचारियों की उदासीनता न केवल आर्थिक विकास को धीमा करती हैं,बल्कि नागरिकों को मानसिक,सामाजिक और आर्थिक पीड़ा भी देती हैं।अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि विकसित देशों में प्रशासनिक दक्षता को मापा जाता है,प्रत्येक सेवा की समय सीमा तय होती है और विलंब के लिए जिम्मेदारी निर्धारित की जाती है। भारत में अभी भी यह संस्कृति व्यापक रूप से विकसित नहीं हो पाई है।
साथियों बात अगर हम नौकरशाही का दबदबा और नागरिक-केन्द्रित शासन का अभाव इसको समझने की करें तो भारत की शासन व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से औपनिवेशिक नौकरशाही से प्रभावित रही है, जहां प्रशासन शासक-केन्द्रित था, नागरिक- केन्द्रित नहीं। आज़ादी के दशकों बाद भी यह मानसिकता पूरी तरह बदली नहीं है। कई सरकारी कार्यालयों में नागरिक को याचक की तरह देखा जाता है, जबकि वास्तव में वह करदाता और अधिकारधारी है।विकसित भारत की परिकल्पना तभी साकार होगी जब प्रशासन स्वयं को सेवा प्रदाता और नागरिक को ग्राहक नहीं, बल्कि साझेदार माने।
साथियों बात अगर हम राजनीतिक हस्तक्षेप और जवाबदेही का संकट इसको समझने की करें तो,सुशासन की राह में राजनीतिक हस्तक्षेप एक और बड़ी बाधा है। जब अनुशासनात्मक कार्रवाई राजनीतिक दबाव में कमजोर पड़ती है, तो संदेश स्पष्ट होता है नियम सभी पर समान रूप से लागू नहीं होते। यह स्थिति प्रशासनिक मनोबल को भी कमजोर करती है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो मजबूत लोकतंत्र वही हैं।जहां प्रशासनिक निर्णय कानून और नियमों के आधार पर होते हैं, न कि राजनीतिक संरक्षण पर।
साथियों बात अगर हम विकसित भारत के लिए आवश्यक संरचनात्मक सुधार को समझने की करें तो विकसित भारत 2047 केवल आर्थिक आंकड़ों का लक्ष्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति के परिवर्तन का मिशन है। इसके लिए सबसे पहले कार्यकुशलता में सुधार आवश्यक है। सरकारी और न्यायालयीन प्रक्रियाओं का व्यापक डिजिटलीकरण, समयबद्ध सेवाएं और प्रदर्शन- आधारित मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए। डिजिटल गवर्नेंस केवल तकनीक नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही का माध्यम है।जब हर प्रक्रिया ट्रैक होती है, तो अनुशासन स्वतः मजबूत होता है।
साथियों बात अगर हम अनुशासन लागू करने के लिए कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई को समझने की करें तो अनुशासन बनाए रखने के लिए नियमों का सख्ती से पालन और उल्लंघन पर त्वरित कार्रवाई आवश्यक है। ड्रेस कोड, पहचान पत्र और नागरिक व्यवहार जैसे बुनियादी नियमों की अनदेखी पर केवल कर्मचारी ही नहीं, बल्कि संबंधित अधीक्षक और वरिष्ठ अधिकारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।नियमों का पालन सुझाव नहीं, बल्कि अनिवार्यता होना चाहिए।यही विकसित शासन व्यवस्था की पहचान है।प्रशिक्षण, नैतिकता और कार्य-संस्कृतिप्रशासनिक सुधार केवल दंड से नहीं, बल्कि प्रशिक्षण से भी आता है। कर्मचारियों के लिए नैतिक, व्यवहारिक और कार्य-आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम अनिवार्य किए जाने चाहिए। उन्हें यह समझाना आवश्यक है कि वे सत्ता के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि सार्वजनिक सेवा के वाहक हैं।विकसित देशों में सरकारी सेवा को पब्लिक ट्रस्ट माना जाता है। भारत को भी इसी दिशा में अपनी प्रशासनिक संस्कृति को पुनर्गठित करना होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि विकसित भारत का रास्ता अनुशासन से होकर जाता है,विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार होगा जब सुशासन केवल भाषणों का विषय न रहकर, कार्यालयों की कार्य-संस्कृति में दिखाई दे। ड्रेस कोड से लेकर जवाबदेही तक, पहचान पत्र से लेकर समयबद्ध सेवा तक ये सभी छोटे दिखने वाले तत्व वास्तव में राष्ट्र निर्माण की नींव हैं।यदि प्रशासनिक अनुशासन, दंड व्यवस्था और नागरिक- केन्द्रित दृष्टिकोण में त्वरित और ठोस सुधार नहीं हुए, तो तकनीकी नवाचार और आर्थिक विकास भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे।विकसित भारत का मार्ग केवल बड़े विज़न से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे प्रशासनिक सुधारों से होकर गुजरता है,और यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

-संकलनकर्ता लेखक-कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318