(आलेख : बादल सरोज)
लगता है कि एक संकट से उससे बड़े दूसरे संकट में धकेलते-धकेलते अब भारत के लोकतंत्र को उसके सबसे कठिन दौर में पहुंचाया जा चुका है। छल, कपट सहित उसके क्षरण और पतन के लगभग सारे उपाय अपनाने के बाद, उसके अपहरण की हर संभव-असंभव बारम्बारता के बाद, अब उसकी पूरी तरह कपाल क्रिया करने की नई-नई तजबीजें ढूंढी और अमल में लाई जा रही हैं। हौंसला इतना जबर है कि यह सब पूरी निर्लज्जता और ढीठ दीदादिलेरी के साथ किया जा रहा है।
नब्बे के दशक की बात है, जब तब के बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विले पार्ले सीट से चुने गए विधायक का चुनाव रद्द कर दिया था। हुआ यह था कि उसकी चुनाव सभा में तब के शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भाषण दिया था। इस भाषण में ठाकरे ने कहा कि ‘हम हिंदुओं की रक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। हमें मुस्लिम वोटों की चिंता नहीं है। ये देश हिंदुओं का था और हिंदुओं का ही रहेगा।‘ उनके इन भाषणों के आधार पर अदालत ने इन दोनों – चुनाव लड़ने वाले और उसके लिए प्रचार करने वाले — को चुनाव के दौरान भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया। नतीजा यह निकला था कि विधायक के साथ-साथ बाल ठाकरे को भी 6 वर्ष तक के लिए मताधिकार के अयोग्य घोषित कर दिया गया था। सनद रहे कि सारी वैधानिक प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद जब चुनाव आयोग की सिफारिश पर 28 जुलाई 1999 को छह साल के लिए बाल ठाकरे के मताधिकार पर रोक लगाने के फैसले पर राष्ट्रपति की मोहर लगी थी, उस समय देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। भारत के चुनाव आयोग की ओर से लागू की जाने वाली आदर्श आचार संहिता में साफ़ प्रावधान है कि चुनाव प्रचार के दौरान न तो धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही धर्म, संप्रदाय और जाति के आधार पर वोट देने की अपील की जा सकती है। इसके अलावा किसी भी धार्मिक अथवा जातीय समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने या नारे लगाने पर भी रोक है। चुनाव प्रचार और अभियान के लिए आचार संहिताएँ बदली नहीं हैं, आज भी वही हैं। मगर सत्ता पार्टी के सर्वोच्च नेताओं से लेकर नीचे तक की जुंडली के भाषण और उनका प्रचार अभियान बाल ठाकरे के भाषण से हजार जूते आगे बढ़ चुका है। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक जिस तरह के नफरती, भड़काऊ और जहरीले भाषण दे रहे हैं, उन्हें पढ़-सुनकर 1987 का बाल ठाकरे का भाषण शाकाहारी और नर्म लगता है। कायदे की बात यह थी कि भारत का चुनाव आयोग इन भाषणों और अभियान का स्वयं संज्ञान लेकर इस आपराधिकता को रोकता : आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले हर प्रचारक और उम्मीदवार को बाल ठाकरे की पंक्ति में खड़ा करता, मगर स्थिति यह है कि वह इस बारे में आने वाली सैकड़ों शिकायतों का नोटिस तक नहीं ले रहा।

कहाँ है भारत का चुनाव आयोग, जिसका काम था कि वह चुनावों के दौरान पैसे के इस्तेमाल को रोके, वोट पाने के लिए प्रलोभन देने और खैरात बांटने का काम न होने दे? अभी हाल तक – मोदी राज के पहले तक लोकसभा और विधान सभा चुनावों के दौरान सैकड़ों करोड़ रुपयों की जब्ती, बांटे जाने वाली घूस के लिए जुटाई गयी सामग्री की बरामदगी की खबरें खूब छपा करती थीं। आचार संहिता लागू होने की तारीख के एलान के बाद सरकार की ओर से भी की जाने वाली लोकलुभावन घोषणाओं को चुनाव आयोग रोक दिया करता था । ऐसा करने के लिए सरकारों की सार्वजनिक निंदा की जाती थी, उन्हें चेतावनी दी जाती थी। चेतावनियों के बाद भी ऐसा करने पर बाकायदा जिम्मेदारियां तय कर संबंधितों को दण्डित किया जाता था। बहुत जरूरी राहत कदम उठाने हों, तो सरकारें चुनाव आयोग से विशेष अनुमति मांगती थी और उसके मिलने के बाद ही घोषणा की जाती थी। कार्यपालिका की लक्ष्मण रेखा तय थी, प्रशासन और उसमे बैठे लघुतम से वरिष्ठतम अधिकारी की किसी भी प्रत्याशी या दल के साथ निकटता या संलग्नता प्रतिबंधित थी। इसमें ज़रा सा भी विचलन स्वीकार नहीं किया जा सकता था : इसके उल्लंघन के मामलों में हर चुनाव में दर्जनों अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाहियां हुईं, उनके तबादले हुए, कई को निलंबित भी किया गया । एक सरकारी कर्मचारी के चुनाव प्रचार से जुड़ा पाए जाने पर तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का तो चुनाव ही अवैध घोषित कर दिया गया था। कुल मिलाकर, इस सबका आशय सिर्फ एक था और वह यह कि चुनाव के दौरान सबको बराबरी का अवसर मिलना चाहिए । खेल का मैदान सबके लिए बराबर होना चाहिए। इन दिनों इनमें से कुछ भी नजर नहीं आता। खुलेआम पैसे बांटे जा रहे हैं, हजारों करोड़ों के लेन-देन से दल के दल और नेता दर नेता खरीदे जा रहे हैं। स्वयं प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की सरकारें खुलेआम कैश फॉर वोट दे रही हैं, मतदान के ठीक पहले हजारों रुपये मतदाताओं के बैंक खातों में जमा किये जा रहे हैं और वोट खरीदे जा रहे हैं। चुनाव आयोग कहाँ है?

चुनाव आयोग है – हर अपराध में ढाल की तरह बचाव के लिए खड़ा हुआ है। हर तिकडम में मददगार बना हुआ है। शिकायतकर्ताओं को हड़काता, अपराधियों की पीठ थपथपाता – एक जीवंत लोकतंत्र को बनाना रिपब्लिक बनाने के धतकरम में खुलकर हाथ बंटाता । ज्ञानेश कुमार गुप्ता के इस पद पर बैठने के बाद से तो जैसे सारी लाज शर्म ही बेच खाई है। नौबत निर्वाचन आयोग के आदेशों पर अपनी सील लगाने की बजाय भारतीय जनता पार्टी की मोहर लगा देने तक की आ गयी है। जिस पर निष्पक्ष चुनाव करवाने की संवैधानिक जिम्मेदारी है, वह खुद धांधली करवाने में जुटा हुआ है। अभी हाल में आंध्रप्रदेश के विधानसभा चुनावों के मामले में हुआ खुलासा इसकी ताज़ी मिसाल है । इसे सामने लाने वालों में स्वयं एक पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी शामिल हैं। उन्होंने और अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर तथा वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने जो विवरण दिया है, वह चौंकाने वाला है। इन तीनों ने 2024 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव के दो साल बाद उस दौर में हुए भारी मतदान पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की तरफ से संशोधित किए वोटिंग प्रतिशत पर भी हैरानी जताई है। परकला प्रभाकर ने दावा किया है कि आंध्र चुनाव में लगभग 4.16 प्रतिशत वोट रात 11: 45 बजे से सुबह 2 बजे के बीच डाले गए। ये वोट टीडीपी-बीजेपी और जनसेना को मिले। दिल्ली के प्रेस कॉन्फ्रेंस में आंकड़ों का हिसाब देते हुए उन्होंने कहा कि आधी रात के बाद लगभग 17 लाख वोट डाले गए। 3500 बूथों पर वोटिंग सुबह 2 बजे तक जारी रही। इस चुनाव में 81.86 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस मतदान प्रतिशत में भी रहस्य था : 13 मई 2024 को शाम 5 बजे वोटिंग खत्म होने के बाद आंध्र के मुख्य चुनाव अधिकारी ने 68.04 प्रतिशत वोटिंग होने की जानकारी दी थी। खुद निर्वाचन आयोग ने रात 8 बजे जारी प्रेस रिलीज़ में 68.12 प्रतिशत मतदान होने की बात कही। इसे भी रात 11.45 बजे बदल दिया गया और निर्वाचन आयोग ने 76.50 फीसदी वोटिंग का संशोधित आंकड़ा जारी किया। मगर चार दिन बाद जारी किए गए अंतिम आंकड़ों में वोटिंग का आंकड़ा एकदम उछाल मारकर 81.79 फीसदी हो गया। इसका मतलब यह हुआ कि रात 8 बजे से सुबह 2 बजे के बीच लगभग 52 लाख वोट डाले गए। इस तरह आधी रात के बाद हर 20 सेकंड में एक वोट डाला जा रहा था, जबकि ईवीएम की मशीन को रीसेट होने में ही 14 सेकेंड लगते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने निर्वाचन आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। आरोप तो ये भी हैं कि फॉर्म 17-सी को सार्वजनिक नहीं किया गया। फॉर्म 17-सी मतदान समाप्ति पर सभी उम्मीदवारों को उनके पोलिंग एजेंटों के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है। इसमें मतदान केंद्र में उपयोग की जाने वाली ई.वी.एम. की पहचान संख्या, कुल निर्वाचक व मतदाताओं की संख्या, रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने के बाद अपना वोट दर्ज न करने का निर्णय लेने वाले मतदाताओं की संख्या , मतदान करने की अनुमति न पाने वाले मतदाताओं की संख्या, परीक्षण वोटों की कुल संख्या, प्रति ई.वी.एम. दर्ज किए गए वोटों की कुल संख्या आदि का सत्यापित रिकॉर्ड होता है । पूर्व निर्वाचन आयुक्त कुरैशी के मुताबिक़ मतदान पूरा होते ही यह फॉर्म सभी पोलिंग एजेंट्स को मुहैया कराना निर्वाचन अधिकारी और इस तरह चुनाव आयोग का दायित्व है । यह काम आंध्र में क्यों नहीं किया गया यह बाद में बढाए गए आधा करोड़ से ज्यादा वोटों से स्पष्ट हो जाता है।
मगर इस सबके बाद भी हुक्मरान डरे हुए हैं !! सारी ताकत झोंक देने, शकुनिं कंस की कलाएं आजमा लेने के बाद भी 2024 के लोकसभा चुनाव में जनता द्वारा भाजपा का बहुमत छीन लेने के बाद उनकी घबराहट अब हडबडाहट में बदल गयी है। जर्मनी के मशहूर कवि और फासीवादी तानाशाही के विरुद्ध मोर्चा लेने वाले साहित्यकार बर्तोल्त ब्रेख्त की लिखी कविता “ अखबार का हाकर सड़क पर चिल्ला रहा था/ कि सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया है/ अब कड़े परिश्रम, अनुशासन और दूरदर्शिता के अलावा/ और कोई रास्ता नहीं बचा है/ एक रास्ता और है कि/ सरकार इस जनता को भंग कर दे/ और अपने लिए नई जनता चुन ले” की तर्ज पर चुनाव आयोग की पीठ पर सवार होकर हुक्काम नयी जनता चुनने के लिए निकल पड़े हैं। नयी जनता चुनने के पहले पुरानी जनता की छंटाई की मुहिम – जिसे एसआईआर का नाम दिया गया है — उसी का एक हिस्सा है।
अभी हड़बड़ी में, इन्हें जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, उन राज्यों में एसआईआर करके एक तरह का नरसंहार-सा ही किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में आनन-फानन में ,यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट की जायज चिंताओं, शंकाओं और आपत्तियों पर कान तक न धरते हुए किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण – एसआईआर – इसकी एक मिसाल है। पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से क़रीब 91 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं। यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12% है। बंगाल में जो हुआ, वह अब तक हुये पुनरीक्षण से भी आगे की बात थी। चुनाव आयोग का काम एक भी मतदाता छूट न जाए, यह सुनिश्चित करना है। यहाँ उसने शुरुआत ही यह मानकर की कि बंगाल में वोटर्स की संख्या बहुत ज़्यादा है , इसलिए इन्हें कम किया जाना चाहिए। देश के संघीय ढाँचे की धज्जियां उड़ाते हुए उसने एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी के लिए भी राज्य के बाहर से अधिकारियों की एक फ़ौज को काम पर रखा। बंगाल के बारे में ख़ास बात पहली सूची में में छांटकर अलग किये गए 60 लाख वोटर्स के प्रोफाइल से उजागर हो जाती है। एक विश्लेषण में पाया गया कि मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल ज़िलों में वोटरों के नाम हटाने की संख्या “बहुत ज़्यादा” थी। इसके अलावा जिन्हें अभी जांच के दायरे में लटका कर – “अंडर एडजुडिकेशन” में रखा गया है, उसमें और “अयोग्य” घोषित लोगों की सूची में मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है। उत्तर 24 परगना और मालदा इस सूची में दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। इस प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में हुई एक सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने भी माना कि चुनाव आयोग बिहार से इतर बंगाल में प्रक्रिया अपना रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ नामक नई श्रेणी शुरू की है, जो बिहार जैसे अन्य राज्यों से अलग है। बिहार में आयोग ने कहा था कि 2002 की सूची में मैप किए गए लोगों को दस्तावेज अपलोड करने की जरूरत नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इस बात से ज्ञानेश कुमार हट गए। बागची ने कहा कि अगर जीत का अंतर केवल 2 फीसदी हो और 15 फीसदी वोट न दिए हों तो यह गलत संदेश जायेगा।
यह अकेले बंगाल की कहानी नहीं है। एक अन्य बड़े राज्य तमिलनाडु, जहां चुनाव होना है, वहां भी क़रीब 74 लाख नाम हटाए गए हैं, जो पश्चिम बंगाल के लगभग समान है। अभी चंद रोज पहले ही उत्तरप्रदेश में 166 दिन तक चली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (एसआईआर) के बाद प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई है। इस नई सूची में प्रदेश में दो करोड़ (2.05) करोड़ मतदाता घट गए हैं। 27 अक्तूबर 2025 को फ्रीज मतदाता सूची में 15.44 करोड़ मतदाता थे। एसआईआर के बाद प्रदेश में 13 करोड़ 39 लाख मतदाता रह गए हैं। यही कहानी बाकी उन नौ प्रदेशों की है, जहां एस आई आर की जा चुकी है।
कौन हैं वे लोग, जिनके नाम हटाये जा रहे हैं? पहले दावा किया गया कि अवैध विदेशियों और घुसपैठियों के नाम हटाये गए हैं। यह दावा सिर्फ भाजपा ने ही नहीं किया, खुद ज्ञानेश कुमार गुप्ता भी इसी तरह की बतोलेबाजी करते रहे। मगर जब उनसे ऐसे घुसपैठियों और अवैध विदेशियों की संख्या पूछी गयी, तो वे दर्जन भर नाम भी नहीं गिना पाए। फिर कौन हैं, जिन्हें हटाया जा रहा है ? इनमे विराट बहुमत गरीब, मजदूर, कमाने के लिए इधर से उधर मारे-मारे घूमते खेत मजदूरों और युवा बेरोजगारों की है। उनकी है, जो सिर्फ आर्थिक रूप से ही कमजोर नहीं है, बल्कि सामाजिक रूप से भी श्रेणीक्रम में निचली पायदान पर आते हैं। इनमें बड़ी तादाद धार्मिक अल्पसंख्यकों, उनमे भी मुसलमानों की है । यह उन मतदाता सूची से उनका निष्कासन है, जो भाजपा के स्वाभाविक समर्थक और संभावित मतदाता नहीं है। यह भारतीय अवाम के वंचित हिस्से के बहिष्करण की शुरुआत है, जिसे भाजपा और उसका मात-पिता संगठन आरएसएस अपना ध्येय और लक्ष्य मानता है । संघ के विचारक और गुरु जी माने जाने वाले गोलवलकर ने बार-बार भारत के संविधान को पश्चिमी देशों की नक़ल बताया है। इसमें दिए गए सार्वत्रिक बालिग़ मताधिकार को मुण्ड-गणना कह कर धिक्कारा है। गोलवलकर की किताब ‘वी एंड अवर नेशनहुड डिफाइंड’ में लिखा था कि मुस्लिम समुदाय को वोट का अधिकार या किसी भी तरह का नागरिक अधिकार नहीं होगा। संविधान को बदले बिना ही उसके स्थगन, लोकतंत्र के खात्मे की औपचारिक घोषणा के बिना ही उसके अपहरण की इन कवायदों को इस सबके साथ जोड़कर देखने से स्थिति और साफ़ हो जाती है।
(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)
