- सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी कही जाने वाली बिलासपुर के हृदय में बहने वाली जीवनदायिनी अरपा नदी आज स्वयं अपने अस्तित्व के लिए करुण पुकार कर रही है। कभी इस नदी की धारा केवल जल की धारा नहीं थी, बल्कि यह बिलासपुर की संस्कृति, सभ्यता, आस्था और लोकजीवन की आत्मा हुआ करती थी। किन्तु विडंबना देखिए कि आज वही अरपा उपेक्षा, प्रदूषण, अतिक्रमण और राजनीतिक घोषणाओं के बोझ तले दम तोड़ती प्रतीत हो रही है। अरपा की इस दुर्दशा के लिए केवल शासन-प्रशासन को दोष देकर हम अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकते। सच तो यह है कि नदी का अपमान, प्रकृति का अपमान नहीं बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का अपमान है। वर्षों से हर चुनाव में अरपा के संरक्षण और संवर्धन के नाम पर वादों की मालाएँ गूंथी गईं, योजनाओं के सपने दिखाए गए, किन्तु चुनाव समाप्त होते ही वे संकल्प भी राजनीतिक धूल में दबते चले गए। परिणामस्वरूप आज भी अरपा अपने उद्धार की बाट जोह रही है। यदि संकल्प सच्चा हो तो असंभव भी संभव हो सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण साबरमती नदी है। कभी प्रदूषण और उपेक्षा की शिकार रही साबरमती आज भारत के सफल नदी पुनर्जीवन का प्रतीक बन चुकी है। वहां केवल सरकार ने नहीं, बल्कि समाज ने भी नदी को अपनी अस्मिता का विषय माना। यही चेतना यदि बिलासपुर में जाग जाए, तो अरपा का कायाकल्प भी असंभव नहीं। अरपा का उद्गम पेंड्रा क्षेत्र की मैकल पर्वत श्रेणियों से होता है, जो पावन अमरकंटक के अत्यंत समीप स्थित है। अमरकंटक केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र है, जहां से पतित पावनी नर्मदा नदी का उद्गम होता है। भारतीय संस्कृति में नर्मदा का स्थान अद्वितीय है। मान्यता है कि गंगा स्नान से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह नर्मदा के मात्र दर्शन से प्राप्त हो जाता है। ऐसी दिव्य और श्रद्धामयी नर्मदा की एक धारा यदि अरपा से जोड़ी जाए, तो यह केवल जल का मिलन नहीं होगा, बल्कि आस्था और संस्कृति का महासंगम होगा। आज परिस्थितियाँ भी अनुकूल दिखाई देती हैं। केंद्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ - तीनों स्तरों पर एक ही राजनीतिक दल की सरकार होने से यदि इच्छाशक्ति प्रबल हो, तो इस प्रकार की दूरदर्शी योजना पर गंभीरता से कार्य किया जा सकता है। यदि नर्मदा की एक नियंत्रित धारा अरपा के उद्गम क्षेत्र तक लाई जाए और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसका प्रवाह सुनिश्चित किया जाए, तो बिलासपुर की तस्वीर बदल सकती है। कल्पना कीजिए - निर्मल जल से प्रवाहित अरपा के तट पर सांध्यकालीन भव्य आरती हो रही हो; तोरवा छठ घाट दीपों से जगमगा रहा हो; घाटों पर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और लोककलात्मक आयोजन हो रहे हों; छोटी नावों में पर्यटक नदी की शीतल लहरों का आनंद ले रहे हों; और बिलासपुर केवल व्यापारिक अथवा प्रशासनिक नगर नहीं, बल्कि एक पावन तीर्थनगरी के रूप में पूरे देश में प्रतिष्ठित हो रहा हो। यह केवल कल्पना नहीं, बल्कि सामूहिक इच्छा, जनसहभागिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति से साकार होने वाला भविष्य भी हो सकता है। नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं होतीं, वे सभ्यताओं की शिराएँ होती हैं। जिस दिन समाज अपनी नदी को केवल संसाधन नहीं बल्कि माँ के रूप में पुनः स्वीकार कर लेगा, उसी दिन पुनर्जागरण का प्रारंभ होगा। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम आलोचना से आगे बढ़कर सहभागिता की ओर कदम बढ़ाएँ। अरपा का उद्धार केवल सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि जनआस्था और जनसंकल्प का महायज्ञ बनना चाहिए।
अरपा रोई वर्षों से,
अब उसकी पुकार सुनो,
माँ नर्मदा के पावन
जल से उसका श्रृंगार बुनो।
जब संगम होगा आस्था का,
तब भाग्य नगर का जागेगा,
संस्कारधानी बिलासपुर
फिर बन जाएगी तीर्थधनी ।।

