वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 में भारत को 157वां स्थान मिला है। यह रिपोर्ट ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) संस्था द्वारा जारी की जाती है, जिसमें कुल 180 देश शामिल हैं
बीते 12 वर्षों (2014 से 2026) में भारत में फ्रीडम ऑफ स्पीच (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के उल्लंघन का कोई एक आधिकारिक सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) विशेष रूप से इस श्रेणी के तहत मामले दर्ज नहीं करता है।
हालांकि, इस क्षेत्र की निगरानी करने वाली स्वतंत्र संस्थाओं (जैसे ‘फ्री स्पीच कलेक्टिव’ – FSC और अन्य मीडिया वॉचडॉग) की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में सेंसरशिप, पत्रकारों पर हमलों और कानूनी कार्रवाई के मामलों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
प्रमुख रिपोर्ट और आंकड़ों का विश्लेषण
स्वतंत्र मीडिया ट्रैकर और नागरिक अधिकार संगठनों के अनुसार मामलों का विभाजन इस प्रकार है:
1. डिजिटल सेंसरशिप और इंटरनेट पाबंदी
सोशल मीडिया अकाउंट्स पर कार्रवाई: अकेले वर्ष 2025 में, भारत सरकार की ओर से X (पूर्व में ट्विटर) पर 29,000 से अधिक कंटेंट हटाने या अकाउंट ब्लॉक करने के अनुरोध किए गए।
मास सेंसरशिप: फ्री स्पीच कलेक्टिव (FSC) ने अपने वार्षिक डेटा में हाल के वर्षों में इंटरनेट शटडाउन, वेबसाइट ब्लॉकिंग और डिजिटल सेंसरशिप के 11,385 से अधिक मामले दर्ज किए हैं।
2. पत्रकारों की सुरक्षा और हत्याएं (2014-2026)
जान गंवाने वाले पत्रकार: मीडिया वॉचडॉग ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) और CPJ के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 से 12 वर्षों में भारत में 28 से अधिक पत्रकारों की हत्या उनकी रिपोर्टिंग (विशेषकर पर्यावरण, स्थानीय भ्रष्टाचार और राजनीति) के कारण की गई है।
गंभीर हमले: ठाकुर फाउंडेशन की एक स्वतंत्र रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में पत्रकारों, यूट्यूबर्स और कार्यकर्ताओं पर शारीरिक हमले, धमकी और उत्पीड़न के 200 से अधिक गंभीर मामले दर्ज किए जा चुके हैं।
3. कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारियां (Lawfare)
UAPA और देशद्रोह के मामले: मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, बीते दशक में कम से कम 15 प्रमुख पत्रकारों और दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ताओं पर आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मामले दर्ज कर उन्हें हिरासत में लिया गया।
नागरिकों की गिरफ्तारियां: सोशल मीडिया पोस्ट या व्यक्तिगत विचारों के कारण ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ के कथित उल्लंघन के तहत सामान्य नागरिकों की गिरफ्तारी और FIR के मामलों में भी सालाना वृद्धि देखी जा रही है (FSC ने एक ही वर्ष में 117 से अधिक गिरफ्तारियां ट्रैक कीं)।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और वैधानिक सीमाएं
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देता है। हालांकि, अनुच्छेद 19(2) के तहत इस पर “तार्किक प्रतिबंध” (जैसे देश की संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखना) लागू होते हैं। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों (जैसे हेट स्पीच और सोशल मीडिया पोस्ट पर FIR) की सुनवाई करते हुए यह साफ किया है कि आलोचना या कविता लिखना अपराध नहीं है, और मजबूत लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण जरूरी है।
यदि आप इस विषय में और स्पष्टता चाहते हैं, तो मुझे बताएं:
क्या आप विशेष रूप से पत्रकारों पर हुए हमलों का डेटा देखना चाहते हैं?
क्या आपको इंटरनेट शटडाउन (इंटरनेट पाबंदी) से जुड़े आंकड़ों की जानकारी चाहिए?
या आप इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के किसी ऐतिहासिक फैसले के बारे में जानना चाहते हैं?
YouTube) पर स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिकों के अकाउंट्स को ब्लॉक करने के मामलों में पिछले सालों में 15,000 से अधिक डिजिटल सेंसरशिप की घटनाएं देखी गई हैं.
मानहानि मामले: कॉर्पोरेट और राजनीतिक आलोचना करने वाले खोजी पत्रकारों (जैसे रवि नायर) को सोशल मीडिया पोस्ट के कारण मानहानि मामलों में सजा मिलने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं
राकेश प्रताप सिंह परिहार
राष्ट्रीय महासचिव
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति
पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए संघर्षरत
