बिलासपुर। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज और व्यवस्था से जुड़े सवालों को सामने लाना तथा जिम्मेदार लोगों से जवाब मांगना है। ऐसे में यदि कोई पत्रकार किसी मुद्दे को तथ्यों और जनहित के आधार पर उठाता है, तो उसे प्रतिबंधित करना या उसकी आवाज रोकने का प्रयास सवालों का समाधान नहीं हो सकता।
मुद्दा यह नहीं होना चाहिए कि पत्रकार सवाल क्यों पूछ रहा है, बल्कि यह होना चाहिए कि उसके सवालों का जवाब क्या है। यदि किसी पत्रकार द्वारा लगाए गए आरोप या उठाए गए सवाल गलत हैं, तो उनका तथ्यों और प्रमाणों के साथ खंडन किया जाना चाहिए। वहीं, यदि सवालों में सच्चाई है, तो उन्हें स्वीकार करते हुए आवश्यक सुधार की दिशा में कदम उठाना ही जिम्मेदारी का परिचायक है।
कई बार व्यक्ति अपने पद, प्रतिष्ठा, सम्मान और प्रभाव से इतना जुड़ जाता है कि आलोचना भी उसे अपमान जैसी लगने लगती है। ऐसी स्थिति में सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले को ही रोकने की कोशिश शुरू हो जाती है। लेकिन किसी पत्रकार को बैन करने से सवाल खत्म नहीं होते और सच्चाई को दबाने से वह बदल नहीं जाती।
संतत्व हो, समाजसेवा हो या कोई धार्मिक पद—पद की रक्षा से पहले सत्य की रक्षा जरूरी है। किसी भी सम्मानित पद की वास्तविक गरिमा तभी बनी रहती है, जब उस पद पर बैठा व्यक्ति आलोचना को सुनने, सवालों का सामना करने और आवश्यकता पड़ने पर अपनी गलती स्वीकार करने का साहस रखता हो।
लोकतांत्रिक और स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था में असहमति तथा सवालों के लिए जगह होना जरूरी है। आलोचक को चुप कराने के बजाय उसके सवालों का जवाब देना ही बेहतर रास्ता है।
आखिर सवाल यही है—पद बचाना बड़ा है या सत्य?
जिसे अपने पद से अधिक सत्य प्रिय है, वह सवालों से डरता नहीं, बल्कि उनका सामना करता है। और जहां सवाल कठिन हों, वहां जवाबदेही और आत्ममंथन की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
