सम्पादकीय
मो.अमजद रज़ा खान
सरकार साफ करे कि बस्तर के खनिज और वन संसाधनों पर आदिवासियों का अधिकार
बीजापुर। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वर्ष 2026 के अंत तक छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त करने का संकल्प लिया था। सरकार के लगातार अभियानों और सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी के बीच बस्तर में नक्सली प्रभाव कमजोर हुआ है। कई इलाकों में सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ी है और लंबे समय से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की नई उम्मीद भी दिखाई देने लगी है। लेकिन इसी बदलाव के बीच आदिवासी समाज के मन में एक नया सवाल जन्म ले रहा है—नक्सलवाद के बाद बस्तर का भविष्य क्या होगा और उसके जंगल-जमीन पर किसका अधिकार रहेगा?
बस्तर वह धरती है, जिस पर प्रकृति ने भरपूर मेहरबानी की है। यहां लौह अयस्क, सोना, कोरंडम जैसे खनिज संसाधनों के साथ विशाल वन संपदा और जैव विविधता मौजूद है। यही प्राकृतिक संपदा बस्तर की ताकत भी है और सबसे बड़ी चिंता भी। सात दशकों से नक्सलवाद के साये में जी रहे इस क्षेत्र में अब जब हिंसा का प्रभाव कम हो रहा है, तब स्वाभाविक रूप से आदिवासी यह जानना चाहते हैं कि विकास की इस नई यात्रा में उनके जंगल, जमीन और जल का भविष्य क्या होगा?
एक समय ऐसा भी आया जब बस्तर के घने जंगलों में सुरक्षा बलों के कैंप लगातार बढ़ते गए और नक्सलवाद के खिलाफ बड़े अभियान चलाए गए। हजारों की संख्या में डीआरजी और सीआरपीएफ के जवानों ने दुर्गम इलाकों में प्रवेश किया। अनेक मुठभेड़ हुईं और नक्सलियों के ठिकानों को ध्वस्त किया गया। कर्रेगुट्टा पहाड़ पर हुआ अभियान भी नक्सल विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण माना गया।
सरकार की सुरक्षा नीति का उद्देश्य स्पष्ट है—नक्सलवाद का खात्मा और प्रभावित क्षेत्रों में विकास। इसमें कोई दो राय नहीं कि बस्तर के लोगों को हिंसा, भय और बंदूक के साये से मुक्ति मिलनी चाहिए। लेकिन नक्सलवाद खत्म होने के बाद विकास का मॉडल कैसा होगा, यह सवाल उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
आज आदिवासी समाज के बीच यह आशंका सुनाई देती है कि कहीं सुरक्षा और विकास के नाम पर धीरे-धीरे उनकी जमीन और जंगल उनसे दूर न हो जाएं। बड़े उद्योग और बड़ी परियोजनाएं आएंगी तो रोजगार और सड़क-बिजली-पानी की उम्मीद भी बढ़ेगी, लेकिन इसके साथ विस्थापन, भूमि अधिग्रहण और वन अधिकारों का सवाल भी खड़ा होगा।
इसीलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नक्सलवाद को खत्म करने के बाद बस्तर की प्राकृतिक संपदा को बड़े औद्योगिक घरानों के लिए खोलने की तैयारी है? यदि ऐसा कोई आरोप या आशंका है, तो सरकार को इसे दबाने के बजाय स्पष्ट नीति और पारदर्शी संवाद के जरिए दूर करना चाहिए। किसी एक उद्योग समूह का नाम लेकर आरोप लगाने से ज्यादा जरूरी यह है कि सरकार साफ करे कि बस्तर के खनिज और वन संसाधनों पर स्थानीय समुदायों के अधिकार किस तरह सुरक्षित रहेंगे।
बस्तर के आदिवासियों ने दशकों तक हिंसा झेली है। उन्होंने अपने परिजनों को खोया, गांवों को उजड़ते देखा और विकास से दूरी का दर्द सहा। अब अगर शांति लौट रही है तो उस शांति का पहला लाभ भी उन्हीं लोगों को मिलना चाहिए। विकास ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें सड़कें और उद्योग तो दिखाई दें, लेकिन जिनकी जमीन पर यह सब खड़ा हुआ है, वही लोग अपने ही घर में बेगाने हो जाएं।
सरकार के सामने असली चुनौती केवल नक्सलियों की बंदूकें शांत करना नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को बदलना भी है जिन्होंने दशकों तक नक्सलवाद को जमीन दी। यदि आदिवासी को सम्मान, अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अपनी जमीन-जंगल पर भरोसा मिलेगा, तभी नक्सलवाद की विचारधारा को वास्तविक चुनौती मिलेगी।
बंदूक से नक्सलवाद को कमजोर किया जा सकता है, लेकिन केवल बंदूक से किसी विचारधारा को खत्म नहीं किया जा सकता। विचारधारा का जवाब विश्वास से देना होगा। विकास का जवाब भागीदारी से देना होगा और विस्थापन की आशंका का जवाब पारदर्शिता से देना होगा।
बस्तर के जंगल केवल खनिज भंडार नहीं हैं। वे यहां रहने वाले आदिवासियों की संस्कृति, आस्था, जीवन और पहचान का हिस्सा हैं। इसलिए नक्सलवाद के बाद बस्तर की नई कहानी लिखते समय सरकार को यह याद रखना होगा कि जंगल बचेंगे तो बस्तर बचेगा, आदिवासी का अधिकार बचेगा तो विकास टिकेगा और विश्वास बचेगा तो शांति स्थायी होगी।
अब समय है कि सरकार बस्तर के लोगों से यह स्पष्ट कहे—नक्सलवाद के अंत के बाद विकास जरूर आएगा, लेकिन विकास की कीमत आदिवासी की जमीन, जंगल और पहचान नहीं होगी।
क्योंकि बस्तर को सिर्फ नक्सलवाद से मुक्त करना पर्याप्त नहीं है, बस्तर को भय, विस्थापन और अविश्वास से भी मुक्त करना होगा।
