02 सितंबर नारियल दिवस –
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
हर वर्ष 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल नारियल के महत्व को रेखांकित करने का अवसर नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका को समझने का दिन भी है, जिनके लिए नारियल खेती, रोजगार और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। नारियल को यूं ही ‘कल्पवृक्ष’ नहीं कहा जाता। इसका लगभग हर हिस्सा मानव जीवन में किसी न किसी रूप में उपयोगी है।
नारियल का वैज्ञानिक नाम Cocos nucifera है। उष्णकटिबंधीय जलवायु में पनपने वाला यह वृक्ष समुद्र तटीय क्षेत्रों की पहचान माना जाता है। इसके फल का पानी प्राकृतिक पेय के रूप में लोकप्रिय है। नारियल की गिरी भोजन में उपयोग होती है, जबकि इससे निकला तेल खाद्य पदार्थों के साथ-साथ सौंदर्य प्रसाधन और विभिन्न घरेलू उपयोगों में काम आता है। नारियल की जटा से रस्सियां, चटाइयां और अन्य वस्तुएं बनाई जाती हैं तथा खोल का उपयोग ईंधन और हस्तशिल्प में किया जाता है। पत्तियों और तने का भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उपयोग होता है। नारियल केवल आर्थिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि पोषण और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इसका विशेष स्थान है। नारियल पानी शरीर को जल और कुछ आवश्यक खनिज उपलब्ध कराता है। नारियल की गिरी में ऊर्जा, वसा और आहार संबंधी पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका सेवन व्यक्ति की आवश्यकता और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में नारियल का स्थान और भी विशिष्ट है। पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों, विवाह और शुभ कार्यों में नारियल को शुभता, समृद्धि और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। किसी नए कार्य के शुभारंभ पर नारियल फोड़ने की परंपरा आज भी व्यापक रूप से प्रचलित है। इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि नारियल की उपयोगिता और प्रकृति से उसके गहरे संबंध की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी दिखाई देती है। विश्व नारियल दिवस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य नारियल उत्पादन और उससे जुड़े किसानों की भूमिका को सामने लाना भी है। जलवायु परिवर्तन, समुद्री तटों पर बढ़ता दबाव, प्राकृतिक आपदाएं और बदलती कृषि परिस्थितियां नारियल उत्पादकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। ऐसे में टिकाऊ खेती, बेहतर पौध प्रबंधन, जल संरक्षण और किसानों को आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराना आवश्यक है।
आज जब दुनिया पर्यावरण-अनुकूल और जैविक विकल्पों की तलाश कर रही है, नारियल आधारित उत्पादों की उपयोगिता और बढ़ गई है। प्लास्टिक के विकल्प के रूप में नारियल की जटा और खोल से बने उत्पाद पर्यावरण संरक्षण तथा ग्रामीण रोजगार दोनों को बढ़ावा दे सकते हैं। नारियल दिवस हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति ने हमें केवल संसाधन नहीं दिए, बल्कि ऐसे वृक्ष भी दिए हैं जिनके माध्यम से भोजन, स्वास्थ्य, रोजगार, संस्कृति और पर्यावरण सभी का संतुलन संभव है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम प्रकृति से प्राप्त इस अमूल्य उपहार का विवेकपूर्ण उपयोग करें और नारियल जैसे बहुउपयोगी वृक्षों के संरक्षण को अपनी जीवनशैली और कृषि नीति का हिस्सा बनाएं। नारियल सचमुच प्रकृति का ऐसा वरदान है, जिसमें उपयोगिता के साथ आत्मनिर्भरता और पर्यावरण-संतुलन की संभावनाएं भी छिपी हैं।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
– बिलासपुर, छत्तीसगढ़
