विजय की ✒ कलम
संपादकीय | देश-विदेश
नेपाल में हाल में आई भयावह प्राकृतिक त्रासदी ने एक बार फिर पूरे समाज और सरकारों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बाढ़, भूस्खलन और तबाही ने घरों, इमारतों और जनजीवन को भारी नुकसान पहुंचाया। बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और हजारों परिवार प्रभावित हुए। यह केवल नेपाल की त्रासदी नहीं है, बल्कि हिमालयी क्षेत्र में हमारे विकास के तरीके और प्रकृति के साथ हमारे व्यवहार पर गंभीर सवाल है।
प्राकृतिक आपदाएं पूरी तरह इंसान के नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि क्या हमने अपने विकास के रास्ते में प्रकृति की सीमाओं को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है? हिमालयी क्षेत्रों में लगातार पेड़ों की कटाई, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, सड़कों और निर्माण परियोजनाओं के लिए प्राकृतिक भू-भाग से छेड़छाड़ तथा पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी के परिणाम क्या आने वाले समय में और भयावह रूप में हमारे सामने नहीं आएंगे?
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी बीते वर्षों में ऐसी विनाशकारी घटनाएं देखने को मिली हैं। इन घटनाओं के पीछे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानवीय गतिविधियों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। ग्लेशियल झीलों के फटने, अत्यधिक वर्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ा सकते हैं। ऐसे में समय रहते चेतावनी और प्रभावी आपदा प्रबंधन व्यवस्था कितनी जरूरी है, यह इन घटनाओं से स्पष्ट हो जाता है।
विकास जरूरी है, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं
विकास किसी भी देश और समाज की आवश्यकता है। सड़कें बननी चाहिए, रोजगार के अवसर बढ़ने चाहिए, आधुनिक सुविधाएं गांवों और पहाड़ों तक पहुंचनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि विकास की कीमत क्या हो?
यदि विकास के नाम पर जंगल काटे जाएंगे, पहाड़ों को बेतरतीब ढंग से काटा जाएगा, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह से छेड़छाड़ होगी और पर्यावरणीय चेतावनियों को नजरअंदाज किया जाएगा, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ने का खामियाजा किसी न किसी दिन समाज को भुगतना पड़ सकता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ऐसी त्रासदियों का सबसे अधिक असर अक्सर गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों पर पड़ता है। जिन लोगों के पास सुरक्षित स्थानों पर रहने के साधन नहीं होते, जिनकी रोजी-रोटी सीधे प्रकृति और स्थानीय संसाधनों पर निर्भर होती है, आपदा आने पर वही सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति बचाने का विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन और सामाजिक न्याय का भी विषय है।
अब चेतने का समय है
नेपाल की घटना हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने समय रहते अपनी विकास नीति पर पुनर्विचार नहीं किया तो भविष्य में ऐसी त्रासदियां और गंभीर हो सकती हैं। हिमालय केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, जल और पर्यावरण का आधार है।
सरकारों को चाहिए कि विकास परियोजनाओं की मंजूरी देते समय पर्यावरणीय प्रभावों का गंभीरता से आकलन किया जाए। संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण और कटाई पर प्रभावी नियंत्रण हो। आपदा की पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया जाए और स्थानीय लोगों को आपदा से बचाव के लिए प्रशिक्षित किया जाए। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानून केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका सख्ती से पालन भी हो।
प्रकृति के साथ संतुलन ही भविष्य की सुरक्षा है
अब समय दूसरों को दोष देने का नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझने का है। सरकारों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी और समाज को भी।
प्रकृति के साथ संघर्ष करके विकास लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता। हमें ऐसा विकास मॉडल अपनाना होगा जिसमें सड़क और पुल भी बनें, रोजगार भी मिले, आधुनिक सुविधाएं भी आएं, लेकिन जंगल, पहाड़, नदियां और पर्यावरण भी सुरक्षित रहें।
नेपाल की त्रासदी से हमें क्या सीख मिलती है, इसका जवाब आने वाला समय देगा। सवाल यह है कि क्या सरकारें और समाज इस चेतावनी को गंभीरता से लेंगे?
अगर हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यही सवाल पूछेंगी कि जब खतरे के संकेत सामने थे, तब हमने प्रकृति की आवाज क्यों नहीं सुनी?
प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं, उसके साथ संतुलन बनाकर चलना ही सच्चा विकास है।
