– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
गणेश उत्सव और नवरात्रि हमारे सामाजिक और धार्मिक जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व हैं। इन पर्वों में भक्ति है, आस्था है, संस्कृति है और सामूहिकता की वह भावना भी है, जो समाज को जोड़ने का काम करती है। लेकिन समय के साथ इन पर्वों का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। अब अनेक स्थानों पर सवाल यह नहीं रह गया है कि पूजा कितनी श्रद्धा से होगी, बल्कि यह हो गया है कि किसका पंडाल सबसे बड़ा, आकर्षक और महंगा होगा?
बिलासपुर शहर हो या छत्तीसगढ़ के छोटे-बड़े शहर और गांव के गणेशोत्सव तथा दुर्गोत्सव में भव्य पंडाल, महंगी सजावट, विद्युत रोशनी, बड़े-बड़े साउंड सिस्टम और आकर्षक झांकियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ती दिखाई देती है। भव्यता अपने आप में गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब साधन पूजा से बड़े और प्रदर्शन भक्ति से बड़ा हो जाए।
कुछ दशक पहले तक मोहल्लों और गांवों में गणेशजी या दुर्गामाता की छोटी-सी प्रतिमा स्थापित कर लोग सामूहिक रूप से पूजा करते थे। घरों से फूल आते थे, कोई प्रसाद की व्यवस्था करता था, कोई आरती में शामिल होता था और बच्चे-किशोर उत्साह से सजावट करते थे। वहां आर्थिक प्रतिस्पर्धा कम और आत्मीयता अधिक होती थी। पंडाल छोटा होता था, लेकिन उसमें बैठने वाले लोगों का मन बड़ा होता था। आज तस्वीर का एक दूसरा पक्ष भी सामने आया है। पूजा समितियों के नाम पर चंदा जुटाने की प्रवृत्ति कई जगह बढ़ी है। चंदा स्वेच्छा से मिले, उसका हिसाब-किताब सार्वजनिक हो और उसका उपयोग धार्मिक आयोजन, सामाजिक सेवा तथा जनहित में हो, इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन यदि चंदा जुटाना प्रतिष्ठा, दबाव अथवा व्यक्तिगत मौज-मस्ती का माध्यम बनने लगे तो यह गंभीर सामाजिक प्रश्न है। आखिर श्रद्धालुओं और दुकानदारों से जुटाए गए धन का हिसाब कौन देगा?
इसीलिए प्रत्येक सार्वजनिक पूजा समिति को अपनी आय-व्यय का पारदर्शी विवरण रखना चाहिए। कितनी राशि चंदे से आई, कितनी राशि पंडाल, बिजली, प्रतिमा, प्रसाद और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च हुई तथा कितना पैसा बचा, यह जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। इससे ईमानदार समितियों का सम्मान भी बढ़ेगा और संदेह की गुंजाइश भी कम होगी। सबसे बड़ी चिंता युवा पीढ़ी को लेकर है। पूजा आयोजन युवाओं को सकारात्मक नेतृत्व, अनुशासन और सामाजिक सेवा से जोड़ सकते हैं। लेकिन यदि यही आयोजन देर रात तक अनावश्यक शोर, शराब या अन्य नशे, हुड़दंग और शक्ति प्रदर्शन से जुड़ जाएं तो पर्व का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। यह आरोप सभी समितियों पर नहीं लगाया जा सकता, लेकिन जहां ऐसी शिकायतें हैं, वहां समाज और प्रशासन दोनों को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।
धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ दूसरों की शांति भंग करने की स्वतंत्रता नहीं है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केभारत के ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के अनुसार लाउडस्पीकर अथवा पब्लिक एड्रेस सिस्टम के लिए अनुमति आवश्यक है और सामान्यतः रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक इनके उपयोग पर रोक है; राज्य सरकार सीमित धार्मिक/सांस्कृतिक अवसरों पर रात 10 से 12 बजे तक छूट दे सकती है। आवासीय क्षेत्र के लिए निर्धारित ध्वनि सीमा भी दिन और रात में अलग-अलग है। सर्वोच्च न्यायालय भी स्पष्ट कर चुका है कि धर्म के नाम पर ऐसा शोर उचित नहीं माना जा सकता जिससे बुजुर्गों, बच्चों, विद्यार्थियों और आसपास रहने वाले लोगों की शांति प्रभावित हो।
फिर प्रश्न उठता है – क्या भगवान को प्रसन्न करने के लिए लाखों रुपये का पंडाल आवश्यक है? क्या उस राशि से किसी गरीब बच्चे की फीस नहीं भरी जा सकती? किसी जरूरतमंद परिवार को राशन नहीं दिया जा सकता? किसी मरीज की दवा नहीं खरीदी जा सकती? किसी मोहल्ले में पौधे नहीं लगाए जा सकते? किसी जरूरतमंद कन्या की शिक्षा या विवाह में सहयोग नहीं किया जा सकता?
यदि गणेश उत्सव है तो बुद्धि और विवेक का संदेश भी होना चाहिए। यदि दुर्गा पूजा है तो शक्ति का अर्थ समाज की रक्षा और सेवा भी होना चाहिए। पूजा की भव्यता से अधिक महत्वपूर्ण पूजा की पवित्रता है। भगवान के सामने हजारों वाट की रोशनी से अधिक मूल्यवान एक जरूरतमंद के घर का बुझा हुआ चूल्हा जलाना है। विशाल पंडाल से अधिक बड़ा वह काम है, जिससे किसी गरीब के चेहरे पर मुस्कान आ जाए।
पर्यावरण की दृष्टि से भी उत्सवों को नए ढंग से देखने की आवश्यकता है। हमारे संस्कारधानी शहर बिलासपुर में ही प्रशासन ने सितंबर 2026 में नगर निगम और पर्यावरण विभाग ने प्रतिबंधित पीओपी की 24 गणेश प्रतिमाएं जब्त कीं हैं ,और आगामी विश्वकर्मा तथा दुर्गा पूजा के लिए भी नियमों के पालन की चेतावनी दी।इसलिए अब समय आ गया है कि हम पूछें…क्या हमारा धार्मिक उत्सव प्रकृति, समाज और आने वाली पीढ़ी के प्रति भी जिम्मेदार है?
क्यों न प्रत्येक पूजा समिति यह संकल्प ले कि पंडाल जरूरत के अनुसार ही बनेगा, चंदे का पूरा हिसाब सार्वजनिक होगा, ध्वनि प्रदूषण नहीं किया जाएगा, नशे को आयोजन से दूर रखा जाएगा और कुल बजट का एक हिस्सा समाजसेवा में लगाया जाएगा? एक समिति यदि पांच लाख रुपये खर्च करती है तो उसमें से कुछ राशि किसी जरूरतमंद विद्यार्थी की पढ़ाई, चिकित्सा, पौधरोपण, स्वच्छता या गरीब परिवार की सहायता में लगाई जा सकती है। तब वही पूजा वास्तव में लोकमंगल की पूजा बन जाएगी।
हमें पर्वों उत्सवों की भव्यता का विरोध नहीं करना है। विरोध होना चाहिए दिखावे की प्रतिस्पर्धा, अपारदर्शिता, अनावश्यक खर्च और आस्था के नाम पर अनुशासनहीनता का। क्योंकि भगवान को ऊंचे पंडाल की जरूरत नहीं होती।
उन्हें चाहिए- साफ मन, सच्ची श्रद्धा और ऐसा आचरण, जिससे किसी दूसरे मनुष्य को कष्ट न पहुंचे। शायद यही वह बिंदु है जहां से हमें फिर से अपने उत्सवों को देखने की जरूरत है ….
पंडाल छोटा हो सकता है,
प्रतिमा छोटी हो सकती है,
सजावट साधारण हो सकती है;
लेकिन भक्ति बड़ी होनी चाहिए।
और जब भक्ति बड़ी होगी, तो उसका प्रकाश केवल पंडाल तक सीमित नहीं रहेगा और अंततः वही पूरे समाज तक पहुंचेगा।
– सुरेश सिंह बैस शाश्वत
– पत्रकार /अधिवक्ता / समाजसेवी
