– सुरेश सिंह बैस
बिलासपुर। शहर की सार्वजनिक परिवहन और रेलवे व्यवस्था की चमक-दमक के बीच दो तस्वीरें ऐसी सामने आई हैं, जो सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फर्क साफ दिखाती हैं। एक तस्वीर पुराने बस स्टैंड के यात्री प्रतीक्षालय की है, तो दूसरी बिलासपुर के जोनल एवं आदर्श रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-1 की।
पुराने बस स्टैंड में यात्रियों की सीटों पर पसरे लोग और कुत्ता, रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर खुले में शौच ; तस्वीरें व्यवस्था को दिखा रही आईना
नगर के पुराने बस स्टैंड के प्रतीक्षालय में जहां यात्रियों को बैठने के लिए कुर्सियां तलाशनी पड़ती हैं, वहीं कुछ लोगों ने इन्हीं कुर्सियों को मानो अपना निजी शयनकक्ष समझ लिया है। तस्वीर में दो व्यक्ति आराम से पांव पसारकर सोते नजर आ रहे हैं। बगल में एक कुत्ता भी बेफिक्र होकर कुर्सी पर आराम फरमाता दिखाई दे रहा है। यानी यात्री बैठें तो कहां बैठें ? यह सवाल शायद प्रतीक्षालय की कुर्सियों से ही पूछा जाना चाहिए! हालात पर विचार करें तो लगता है कि यहां ‘पहले आओ, पहले सोओ’ की व्यवस्था लागू है। फर्क सिर्फ इतना है कि यात्रियों के लिए प्रतीक्षालय बनाया गया था, लेकिन कुछ लोगों ने इसे ‘आरामालय’ में बदल दिया है।
आदर्श स्टेशन पर ‘आदर्श’ स्वच्छता का दूसरा चेहरा
दूसरी तस्वीर बिलासपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-1 की है। स्टेशन को आदर्श स्टेशन का दर्जा प्राप्त है और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिए जाने का दावा किया जाता है। इसके बावजूद तस्वीर में एक महिला बच्चे को प्लेटफार्म परिसर में ही खुले में शौच कराते दिखाई दे रही है। यह दृश्य केवल स्वच्छता व्यवस्था पर ही सवाल नहीं उठाता, बल्कि यह भी सोचने को मजबूर करता है कि इतने बड़े स्टेशन पर यात्रियों के लिए शौचालय और उसकी उपलब्धता की जानकारी कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रही है? यदि शौचालय मौजूद है, तो फिर लोग प्लेटफार्म पर खुले में शौच के लिए क्यों मजबूर या बेपरवाह हैं, इसकी पड़ताल भी जरूरी है।
एक तरफ ‘स्वच्छता’, दूसरी तरफ तस्वीरों में हकीकत
सरकारी अभियानों में स्वच्छता के संदेश बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे जाते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर जब ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं तो संदेश और व्यवहार के बीच की दूरी साफ दिखाई देती है। बस स्टैंड में कुर्सियां हैं, पर यात्री नहीं बैठ सकते। रेलवे स्टेशन में स्वच्छता के इंतजाम हैं, लेकिन प्लेटफार्म पर खुले में शौच का दृश्य सामने आ जाता है। और ऊपर से दोनों जगह व्यवस्था अपने-अपने ढंग से ‘आराम’ करती नजर आती है। सवाल यह है कि सार्वजनिक स्थान आखिर जनता के लिए हैं या फिर जिसे जहां जगह मिली, वही उसका मालिक? इन तस्वीरों को महज दो लोगों की लापरवाही मानकर छोड़ देना आसान है, लेकिन ये सार्वजनिक स्थलों की निगरानी, स्वच्छता व्यवस्था, यात्री सुविधाओं और नागरिक अनुशासन ,चारों पर एक साथ सवाल खड़े करती हैं। जरूरत सिर्फ व्यवस्था को दोष देने की नहीं, बल्कि व्यवस्था और नागरिक दोनों को अपनी जिम्मेदारी समझने की है।
