जब पानी, बिजली और सफाई की मांग ने जन्म दिया एक जनआंदोलन और 24 सितंबर बन गया नगर के इतिहास का काला दिवस
कुछ घटनाएं समय के साथ इतिहास बन जाती हैं, लेकिन कुछ घटनाएं इतिहास के पन्नों में दर्ज होने के साथ-साथ लोगों की स्मृतियों में भी हमेशा जीवित रहती हैं। चांपा का 24 सितंबर 1983 का गोलीकांड ऐसी ही एक घटना है। आज 43 वर्ष बाद भी उस दिन की याद आते ही उन लोगों की आंखों के सामने वही दृश्य तैरने लगता है – आंदोलनकारी नागरिक, आक्रोशित छात्र-युवा, पुलिस की घेराबंदी, आंसू गैस का धुआं, लाठियों की बरसात और फिर गोलियों की आवाज।
यह केवल एक गोलीकांड नहीं था। यह उस दौर के चांपा की उस बेचैनी की कहानी थी, जब नागरिक पानी, बिजली और सफाई जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए लगातार शासन-प्रशासन के दरवाजे खटखटा रहे थे। आवेदन दिए गए, निवेदन किए गए, अधिकारियों से गुहार लगाई गई, लेकिन जब जनसमस्याओं की आवाज लगातार अनसुनी रह गई तो अंततः वह आवाज आंदोलन में बदल गई।
जब सब्र का बांध टूट गया…23 सितंबर 1983 को चांपा में नागरिकों और युवाओं का आक्रोश खुलकर सामने आया। स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली से नाराज छात्रों और युवाओं ने तत्कालीन मुख्य नगरपालिका अधिकारी राजीव लोचन पाण्डेय, पीवी पार्थन और प्रशासक एस.ए. अली के विरुद्ध अपना विरोध जताया। आक्रोश इस कदर बढ़ा कि अधिकारियों को उनके घरों से बाहर निकालकर जूते-चप्पलों की माला पहनाई गई और उनके चेहरे पर कालिख पोती गई।
यह घटना निश्चित रूप से प्रशासन के लिए गंभीर अपमान के रूप में सामने आई। इसके बाद आंदोलन से जुड़े अनेक लोगों के खिलाफ थाने में नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गई। इनमें रामचरण सोनी, रमाकांत सोनी, सुनील सेठी, इब्राहिम मेमन, अनुपम श्रीवास्तव, मुकेश कुमार, शशि शुक्ला, गणेश यादव, शशिकांत पाण्डेय, रामेश्वर गुप्ता, कन्हैया विरानी और विष्णु मोदी सहित अन्य लोगों के नाम बताए जाते हैं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।गिरफ्तारी ने पूरे नगर को सड़कों पर ला दिया।अगले दिन कुछ युवाओं और छात्रों की गिरफ्तारी की खबर पूरे चांपा में आग की तरह फैल गई। देखते ही देखते स्कूल-कॉलेज बंद होने लगे। नागरिक सड़कों पर उतर आए और थाने का घेराव कर गिरफ्तार युवाओं की रिहाई की मांग करने लगे।आंदोलनकारियों के हाथों में कोई हथियार नहीं था। उनके पास अपनी मांगों और गिरफ्तार साथियों की रिहाई की आवाज थी। परिस्थितियां तनावपूर्ण थीं। इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। अचानक मची भगदड़ के बीच लाठीचार्ज हुआ और फिर गोली चली। उस गोली की आवाज ने चांपा के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। छात्र राजकरण दुग्गड़ की मौके पर ही मौत हो गई। एक मां का बेटा, एक परिवार का चिराग और नगर के भविष्य का एक युवा – अचानक गोलियों का शिकार होकर हमेशा के लिए खामोश हो गया। उस दिन केवल एक व्यक्ति नहीं मरा था। उस गोली की आवाज ने पूरे नगर के मन में एक ऐसा घाव छोड़ दिया, जिसकी टीस आज भी महसूस की जाती है।
गोली के निशान आज भी यादों में हैं- उस गोलीकांड में दर्जनों लोगों के घायल होने की बात सामने आती है। गौरीशंकर सोनी, डॉ. मनोहर गुलाबानी और उस समय महज 14 वर्ष के रहे अनिल मनवानी को भी गोली लगी।आज चांपा में मंजू इलेक्ट्रॉनिक्स के संचालक के रूप में पहचाने जाने वाले अनिल मनवानी जब 24 सितंबर 1983 को याद करते हैं तो वह अतीत उनके लिए महज इतिहास नहीं रह जाता। वह फिर उसी उम्र में पहुंच जाते हैं—एक 14 वर्षीय किशोर, जिसके सामने अचानक लाठी, आंसू गैस और गोलियों का भयावह दृश्य था।
उनका इलाज चांपा के मिशन अस्पताल में हुआ था। उस उपचार की पर्ची उन्होंने आज भी संभालकर रखी है। कागज का वह छोटा-सा टुकड़ा केवल अस्पताल की पर्ची नहीं है। वह उस दौर का एक मौन दस्तावेज है। वह गवाही देता है कि 24 सितंबर 1983 को चांपा की सड़कों पर क्या हुआ था।एक सूची, जिसमें दर्ज है उस दौर का चांपा – अनिल मनवानी के पास पुलिस द्वारा नागरिकों को अपराधी के रूप में सूचीबद्ध किए जाने से संबंधित एक प्रति भी सुरक्षित है। इस सूची में स्वतंत्रता सेनानियों, पत्रकारों, अधिवक्ताओं, व्यवसायियों, समाजसेवियों और छात्रों सहित नगर के अनेक लोगों के नाम दर्ज बताए जाते हैं।
समय बीत गया। मुकदमे चले। लोगों को वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़े। अंततः लंबे समय बाद यह प्रकरण शासन द्वारा वापस लिए जाने की जानकारी सामने आई।लेकिन अदालत की फाइलें बंद हो जाने से इतिहास के सवाल बंद नहीं होते। कानूनी प्रक्रिया समाप्त हो सकती है, लेकिन किसी नगर की सामूहिक स्मृति को समाप्त नहीं किया जा सकता। 24 सितंबर ,एक तारीख नहीं, एक स्मृति -चांपा के लोगों ने इस घटना को भुलाया नहीं। जब तक प्रकरण न्यायालय में चलता रहा, तब तक हर वर्ष 24 सितंबर को काला दिवस मनाया जाता रहा। समय के साथ यह दिन नगर की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गया।
जनआंदोलन के दौरान प्राण गंवाने वाले छात्र राजकरण दुग्गड़ को नगर के लोग भावनात्मक रूप से शहीद मानते हैं। उनकी स्मृति में प्रतिमा स्थापित की गई और आज भी 24 सितंबर को श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है। यह श्रद्धांजलि केवल राजकरण दुग्गड़ के प्रति नहीं है। यह उस दौर के उन सभी लोगों की स्मृति को नमन है, जिन्होंने अपने नगर की मूलभूत सुविधाओं के लिए आवाज उठाई और उस संघर्ष में पीड़ा झेली।
इतिहास केवल तारीखों से नहीं बनता…इतिहास की किताबों में घटनाएं अक्सर कुछ पंक्तियों में सिमट जाती हैं – 23 सितंबर 1983, आंदोलन; 24 सितंबर, गोलीकांड; एक छात्र की मौत; अनेक घायल; मुकदमे और फिर प्रकरण की वापसी।
लेकिन इतिहास की असली पीड़ा इन तारीखों के बीच छिपी होती है। उस मां से पूछिए जिसने अपने बेटे को उस दिन घर से जाते देखा था। उस पिता से पूछिए जिसने घायल बेटे को अस्पताल पहुंचाया था। उस 14 वर्षीय किशोर से पूछिए जिसके शरीर में गोली लगी और जिसकी आंखों में उस दिन का दृश्य आज भी कहीं सुरक्षित है। उस नगर से पूछिए जिसने गोलियों की आवाज सुनी थी। तब समझ में आएगा कि 24 सितंबर 1983 केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है।यह चांपा की सामूहिक चेतना पर अंकित एक गहरा निशान है।
स्मृति इसलिए जरूरी है…किसी भी लोकतांत्रिक समाज में जनआंदोलन, प्रशासन और नागरिकों के बीच संवाद का अपना महत्व है। जनता की समस्याएं समय रहते सुनी जाएं, शिकायतों का समाधान संवाद और संवैधानिक तरीकों से हो और किसी भी स्थिति में मानव जीवन की कीमत न चुकानी पड़े – यही किसी सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना होनी चाहिए। चांपा की वह घटना आज की पीढ़ी को यही सवाल सौंपती है कि क्या हमने इतिहास से पर्याप्त सीखा? राजकरण दुग्गड़ की प्रतिमा पर हर वर्ष चढ़ने वाली पुष्पमाला केवल श्रद्धांजलि नहीं होनी चाहिए। वह हमें यह भी याद दिलाए कि जनसमस्याओं की अनदेखी अंततः असंतोष को जन्म देती है और संवाद का टूटना परिस्थितियों को बेहद गंभीर बना सकता है।
43 वर्ष बीत गए। पीढ़ियां बदल गईं। चांपा बदल गया। शहर की गलियां बदल गईं। मगर 24 सितंबर की वह स्मृति आज भी वहीं है। कहीं किसी पुराने अस्पताल की फाइल में सुरक्षित एक पर्ची के रूप में, कहीं किसी पुराने दस्तावेज में दर्ज नामों के रूप में, कहीं किसी बुजुर्ग की आंखों में ठहरी नमी के रूप में और कहीं राजकरण दुग्गड़ की प्रतिमा पर चढ़ते फूलों में। समय बहुत कुछ भुला देता है, लेकिन कुछ घटनाएं समय से भी बड़ी होती हैं। चांपा का 24 सितंबर भी ऐसी ही एक घटना है – एक जनआंदोलन की कहानी, एक युवा की शहादत की स्मृति, और एक नगर के अंतर्मन पर अंकित वह दर्द,जो 43 वर्ष बाद भी पूरी तरह पुराना नहीं हुआ।
