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*(आलेख : कृष्ण प्रताप सिंह)*
दिसंबर, 1990 से दिसंबर, 1996 तक अपने पद पर रहे देश के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन निर्वाचन आयोग की शुचिता, स्वायत्तता, स्वतंत्रता व निष्पक्षता के सिलसिले में प्रायः, कुछ ज्यादा ही दर्प से, कहा करते थे कि वह भारत का चुनाव आयोग है, न कि भारत सरकार का।
उनके छह साल के कार्यकाल में उनका कई बार कई मुद्दों पर तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार से उनका टकराव हुआ और फर्जी मतदान, आदर्श आचार संहिता व चुनावी खर्च सीमा के उल्लंघन पर लगाम लगाने के कई कुछ ज्यादा ही सख्त कदमों को लेकर वे प्रायः सारे राजनीतिक दलों के निशाने पर आ गए। इसके बावजूद वे अपने रुख पर अड़े रहे और जानकार बताते हैं कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता जताने के लिए उन्होंने उसके दस्तावेजों व लिफाफों से ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ शब्द तक हटवा दिए।
इसलिए उनके ‘भारत के चुनाव आयोग’ वाले कथन को आम तौर पर यह रेखांकित करने वाला माना जाता है कि चुनाव आयोग या उसकी जैसी किसी भी संवैधानिक संस्था को सरकार के नहीं, देश के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
लेकिन अब लगता है कि उनका वह बयान बीते जमाने की बात हो गया है, क्योंकि अब चुनाव आयोग न सिर्फ भारत सरकार का, बल्कि उसको चलाने वाली पार्टी का भी हो गया है। वह जितना नरेंद्र मोदी सरकार का, उससे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का हो गया है और चुनाव प्रक्रिया में सबका विश्वास बनाए रखने की अपनी संवैधानिक जवाबदेही को ठेंगे पर रख दिया है।
क्या आश्चर्य कि इसका उसकी खुद की साख पर बहुत विपरीत असर हो रहा है। अभी इसी साल जनवरी में जारी इंडिया टुडे के एक सर्वे में 37 प्रतिशत देशवासियों ने उसके द्वारा संचालित चुनाव प्रक्रिया में अविश्वास जताया था। इतना ही नहीं, सीएसडीएस-लोकनीति के अध्ययनों के अनुसार उस पर ‘कतई भरोसा न करने वालों’ का प्रतिशत पहले की तुलना में खासा बढ़ गया है। अगस्त, 2025 में सामने आए उनके राज्यवार विश्लेषण के अनुसार पिछले छह वर्षों के दौरान, चुनाव आयोग पर अविश्वास रखने वाले लोगों का प्रतिशत मध्य प्रदेश में 6% से बढ़कर 22% , दिल्ली में 11% से बढ़कर 30% और उत्तर प्रदेश में 31% हो गया है।
इसी तरह सितंबर, 2025 की फ्रंटलाइन में एक रिपोर्ट में सीएसडीएस के हवाले से बताया गया था कि 11.6 प्रतिशत लोग मानते हैं कि चुनाव आयोग पर कोई सरकारी दबाव नहीं रहता, जबकि अन्य ने मुताबिक यह पूरी तरह या कुछ हद तक दबाव में काम करता है। छह राज्यों में किए गए एक अन्य सर्वे में तिरेपन प्रतिशत से अधिक लोगों ने माना कि चुनाव आयोग किसी न किसी रूप में सरकारी दबाव में काम कर रहा है। इनमें 21.7 प्रतिशत पूरी तरह और 31.7 प्रतिशत कुछ हद तक दबाव स्वीकार करते हैं।
*शेषन से ज्ञानेश तक*
हां, एक मामले में शेषन और ज्ञानेश अभी भी लगभग एक जैसे दिखते हैं और लगता है कि दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त से छब्बीसवें मुख्य चुनाव आयुक्त तक आयोग में कुछ नहीं बदला। बात को इस तरह समझ सकते हैं कि अक्टूबर, 1993 में नरसिम्हा राव सरकार ने आयोग को तीन सदस्यीय बनाते हुए एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया, तो इसे अपने अधिकारों को कम और दरकिनार करने की साजिश मानकर शेषन सर्वोच्च न्यायालय जा पहुंचे। लेकिन न्यायालय ने उनकी श्रेष्ठता ग्रंथि को प्रश्रय नहीं दिया और 1995 में सुनाए गए फैसले में कह दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की शक्तियां समान हैं।
लेकिन अब उसके इतने सालों बाद ज्ञानेश कुमार के साथी चुनाव आयुक्तों को उनके रवैए से वैसी ही शिकायत है, जैसी शेषन के साथी चुनाव आयुक्तों को उनके रवैए से थी। वे कुछ दूसरे मामलों में नेकनीयत से शेषन की राह पर चलते, तो बहुत संभव है कि आयोग की विश्वसनीयता का इतना क्षरण नहीं होता।
लेकिन यहां एक और तथ्य का भी ध्यान रखना चाहिए। यह कि आयोग की विश्वसनीयता का जितना क्षरण ज्ञानेश कुमार की उन पक्षपाती कारस्तानियों से (जिनकी भाजपा सबसे बड़ी लाभार्थी रही है) हुआ है, उससे कहीं ज्यादा भाजपा का अपने को उनकी ‘सबसे बड़ी और सबसे मुखर समर्थक व शुभचिंतक’ बना लेने से हुआ है, क्योंकि इससे यह बात पूरी तरह साफ हो गई है कि न आयोग और न ही भाजपा को देश के लोकतंत्र की कीमत पर चुनाव प्रक्रिया को दूषित करके अपनी स्वार्थपूर्ति में कोई बुराई दिखाई देती है।
इस सिलसिले में वे इतना भी समझने को तैयार नहीं हैं कि उनका यह कृत्य ‘जिनके तकिया था, उन्हीं पत्तों के हवा देने’ लग जाने जैसा है और इस लिहाज से उनमें ‘को बड़ छोट कहत अपराधू।’
हाल के बरसों में तो यह बार-बार हुआ है कि जब भी चुनाव आयोग की रीति-नीति पर सवाल उठाया या उसके फैसलों पर अविश्वास जताया गया, आयोग से पहले भाजपा ही ऐसा करने वालों का मुंह नोचने के लिए सामने आ खड़ी हुई।
‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी जिस खबर को लेकर चारों ओर कोहराम मचा हुआ है, उसमें जो कुछ भी है, वह ज्ञानेश द्वारा साथी चुनाव आयुक्तों को दरकिनार कर अवैध रूप से फैसले लेने व उनको लागू करने से जुड़ा हुआ है और भाजपा का उससे कोई वास्ता ही नहीं। फिर भी उसके प्रवक्ता उसे लेकर अजीबोगरीब तर्कों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेस कर और बयान दे रहे हैं! वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था, वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है।
आम लोगों के निकट इसके मोटे तौर पर दो ही अर्थ हैं : पहला यह कि चुनाव आयोग इतने दल-दल में जा फंसा है कि खुद अपने कदमों का बचाव नहीं कर पा रहा और दूसरा यह कि भाजपा उसके ‘चुनाव जिताने में मददगार’ कदमों के औचित्य व अनौचित्य पर विचार किए बिना कृतज्ञ भाव से उसकी रक्षा करना अपना प्राथमिक कर्तव्य मानती है।
कायदे से इन दोनों को पहली चिंता चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता की रक्षा की होनी चाहिए थी, क्योंकि वही देश के लोकतंत्र की रक्षा का मूल आधार है। लेकिन वह कैसे होती?
नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में अपने सत्ता में आते ही देश भर में संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण की जो प्रक्रिया शुरू कर दी थी और जिसे वह समय के साथ तेज करती गई, उससे चुनाव आयोग ही ज्यादा समय तक कैसे बचा रह सकता था? खासकर जब इस सरकार ने उसे लेकर अपनी प्राथमिकताओं का पता मई, 2015 में अचल कुमार ज्योति को चुनाव आयुक्त नियुक्त करके दे दिया था।
अचल कुमार ज्योति नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रीकाल में गुजरात के मुख्य सचिव हुआ करते थे और उनके बहुत चहेते बताए जाते थे। बाद में उनके द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर किए गए कई फैसलों में भाजपा के प्रति पक्षपात के आरोप लगाए गए।
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उसी साल सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका दायर हुई थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि ये नियुक्तियां पूरी तरह सरकार के हाथ में होना असंवैधानिक है, क्योंकि इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होती है। अक्टूबर, 2018 में इस याचिका को 5 जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया गया था, जिसने 2 मार्च, 2023 को फैसला सुनाया कि जब तक संसद इस बाबत कानून नहीं बना देती, तब तक ये नियुक्तियां प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय समिति करे।
*निरुत्तर प्रश्न*
इस पर मोदी सरकार ने दिसंबर, 2023 में नया कानून बनाकर इस चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया। इसकी चौतरफा आलोचना होने लगी, तो उसने यह कहकर खुद के हाथों खुद की पीठ ठोंकनी शुरू कर दी कि कांग्रेस के राज में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उनके काम करने के तरीके को लेकर कुछ कम गुल नहीं खिले हैं। तब राष्ट्रपति महज प्रधानमंत्री की सिफारिश पर इन आयुक्तों की नियुक्ति कर दिया करते थे, हमने तो चयन प्रक्रिया में विपक्ष के नेता को भी शामिल कर लिया है।
लेकिन इस सिलसिले में उसके पास कई सवालों के उत्तर नहीं थे। एक सवाल यह कि मतदाताओं ने उसे कांग्रेसकाल की गलतियां दोहराने के लिए चुना है या उनसे निजात दिलाने के लिए? लोकसभा चुनाव में तो भाजपा ने कांग्रेस राज की सारी बीमारियों से छुटकारा दिलाने का ही वादा किया था। और दूसरा यह कि विपक्ष के नेता को चयन प्रक्रिया में शामिल करने का हासिल क्या है, जब फैसला बहुमत से होना है और उन्हें हमेशा दो के मुकाबले एक के अल्पमत में ही रहना है।
बाद में इस कानून को दोबारा सुप्रीम कोर्ट में इसी आधार पर चुनौती दी गई कि तीन सदस्यीय चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री शामिल हैं, जबकि विपक्ष का केवल एक नेता है। ऐसे में सरकार जिसे चाहेगी, उसे 2-1 के बहुमत के आधार पर नियुक्त कर देगी और चयन प्रक्रिया पर सरकार का ‘विशेष नियंत्रण’ कभी खत्म ही नहीं होगा।
लेकिन गत 23 सितंबर को दो जजों की पीठ ने इस कानून की वैधता को लेकर खंडित फैसला सुनाकर उसे मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया। हालांकि एक जज ने यह कहकर सरकार को आईना भी दिखाया कि चयन समिति से निष्पक्ष मुख्य न्यायाधीश को हटाकर सत्ता पक्ष के मंत्री को बिठाना ‘धारणा परीक्षण’ में विफल रहता है, क्योंकि चुनाव आयोग का न केवल स्वतंत्र होना, बल्कि दिखना जरूरी है।
निस्संदेह, आज की तारीख में चुनाव आयोग स्वतंत्र या निष्पक्ष नहीं दिखता, तो इसका एक बड़ा कारण यह है कि मतदाता सूची का जो पुनरीक्षण एक सहज व स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में सम्पन्न होना चाहिए था, उसे सर्वथा अपारदर्शी, निर्मम, डरावनी और दमनकारी परीक्षा में बदलकर वह उनके मताधिकार के रक्षक के बजाय भक्षक बन गया है। कहां तो हर मतदाता तक पहुंचना उसकी जिम्मेदारी हुआ करती थी और कहां जो मतदाता उस तक पहुंच रहे हैं, उन पर भी संदेह करते हुए वह उनसे मतदाता होने के सबूत मांग रहा है। लेकिन इसी को अविश्वास का सबसे बड़ा कारण माना लेना गलत होगा।
यह अविश्वास इसलिए कुछ ज्यादा ही गहराया हुआ है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने भारतीय जनता पार्टी को अजेय बनाए रखने के लिए ‘देश के चुनाव आयोग’ को ‘अपने चुनाव आयोग’ में बदल डालने के लिए कुछ भी उठा नहीं रखा है।
*सहूलियतें बनाम खात्मा*
सोचिए जरा, ज्ञानेश कुमार का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति ने किया होता, तो भी क्या वे सरकार के कठपुतली अधिकारी की तरह ऐसे ‘भाजपा हितकारी’ कदम उठाते और विपक्ष को उनमें इतने अविश्वास की जरूरत महसूस होती?
तब क्या उनकी नियुक्ति को इसी तरह उनके द्वारा संविधान का अनुच्छेद 370 हटाने से जुड़े जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक का गोपनीय मसौदा बनाने, श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन में ‘महत्वपूर्ण’ भूमिका निभाने और अमित शाह के मंत्रित्व में सहकारिता सचिव के तौर पर किए गए उनके ‘मनपसंद’ कामों का पुरस्कार माना जाता? या वे इनके पुरस्कारस्वरूप चुनाव आयुक्त बनने का सपना देख पाते? तब क्या उनको इम्युनिटी के उस कवच की जरूरत होती, सरकार ने उनके बेखौफ रहने के लिए जिससे उन्हें सज्जित कर रखा है?
तब तो भाजपा के प्रवक्ताओं को यह बताने की भी जरूरत नहीं महसूस होती कि जिन दो चुनाव आयुक्तों की असहमतियों को लेकर विपक्ष उड़ा जा रहा है, उसने उनकी नियुक्ति का विरोध किया था, क्योंकि लोकतंत्र में विरोध का मतलब दुश्मनी नहीं होता और इन चुनाव आयुक्तों की असहमति से सिर्फ यह पता चलता है कि अभी भी पूरे कुंए में भांग डालने की कोशिशें पूरी तरह सफल नहीं हुई हैं। पूरे कुंए में भांग डालने की कोशिशें न हो रही होंतीं, तो हमें उनकी असहमतियों की जानकारी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से नहीं, उनके मुखारविंद से मिलती।
बहरहाल, इतना तो साफ है कि इस मामले में जो कुछ भी हुआ या हो रहा है, वह भाजपा द्वारा लोकतंत्र की सहूलियतों का इस्तेमाल करके हासिल की गई सत्ता का लोकतंत्र के खात्मे के लिए ही इस्तेमाल करने लग जाने का नतीजा है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस सिलसिले में ‘वोट चोरी से कानून चोरी और कानून चोरी से संस्थागत चोरी’ (जिसमें और भी कई चोरियां शामिल हैं) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के नाम ऐसे ही थोड़े लिए हैं।
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)*
