कथित वायरल ऑडियो के बाद अधिवक्ता संजय अंबष्ट का कच्चा चिट्ठा खुला, नाबालिग बेटे के हाथ में भी दिखे घातक हथियार—मुख्यमंत्री के गृह संभाग में कानून का मज़ाक!

अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)। विशेष रिपोर्ट
क्या छत्तीसगढ़ में कानून का राज रसूखदारों की चौखट पर दम तोड़ देता है? क्या सरगुजा पुलिस सिर्फ आम नागरिकों को डराने के लिए है? ये वो तीखे सवाल हैं जो एक कथित वायरल ऑडियो के बाद अधिवक्ता संजय अंबष्ट की Facebook Wall से लीक हुई पुरानी तस्वीरों ने खड़े कर दिए हैं। तस्वीरें चीख-चीख कर कह रही हैं कि कानून की धज्जियाँ कैसे उड़ाई जाती हैं, लेकिन पुलिस प्रशासन पिछले 11 साल से आँखें मूंदे बैठा है।
तस्वीर नं. 1: AK-47 pattern राइफल और ग्रेनेड लॉन्चर?
Sanjay Ambastha नाम के Facebook अकाउंट पर 5 जनवरी 2015 की एक तस्वीर उपलब्ध है। इसमें अधिवक्ता महोदय एक AK-47 pattern असॉल्ट राइफल जैसे दिखने वाले घातक हथियार के साथ पोज़ दे रहे हैं। चौकाने वाली बात यह है कि हथियार के नीचे एक ‘अटैचमेंट’ भी दिख रहा है, जो प्रथम दृष्टया UBGL (Under Barrel Grenade Launcher) जैसा प्रतीत होता है।
सवाल सीधा है:
एक आम अधिवक्ता के पास यह प्रतिबंधित हथियार कहाँ से आया? क्या यह किसी पुलिस अधिकारी की सरकारी गन थी? अगर यह असली हथियार है, तो यह Arms Act की धारा 7 (Prohibited Arms) का खुला उल्लंघन है, जिसमें केंद्र सरकार की विशेष अनुमति के बिना इसे रखना संगीन अपराध है।
सिलसिलेवार नुमाइश: पिस्तौल और स्कोप लगी राइफल
बात एक तस्वीर तक सीमित नहीं है। यह हथियारों के प्रति गहरे ‘मोह’ का मामला लगता है:
21 फरवरी 2015: संजय अंबष्ट के हाथ में एक हैंडगन/पिस्तौल जैसा हथियार दिखता है।
25 जून 2017: वे स्कोप (Scope) लगी लॉन्ग फायरआर्म/राइफल के साथ नज़र आते हैं।
क्या संजय अंबष्ट इन सभी अलग-अलग हथियारों के वैध लाइसेंसी थे? यदि नहीं, तो Arms Act की धारा 3 के तहत बिना लाइसेंस हथियार रखना अपराध है। पुलिस ने 11 साल में एक बार भी इन तस्वीरों का संज्ञान क्यों नहीं लिया?
हद पार: नाबालिग बेटे के हाथ में घातक हथियार!
अधिवक्ता महोदय ने न केवल खुद कानून को ठेंगा दिखाया, बल्कि 7 अक्टूबर 2015 की एक तस्वीर में उनका नाबालिग पुत्र लॉन्ग-बैरल फायरआर्म/शॉटगन जैसे हथियार को थामे खड़ा है। एक अन्य तस्वीर में बच्चा हथियार के ‘स्लिंग/स्ट्रैप’ के साथ दिख रहा है, और 28 जुलाई 2018 को वह तलवार जैसे धारदार हथियार के साथ पोज़ दे रहा है।
Arms Act की धारा 9 साफ कहती है कि 21 साल से कम उम्र का व्यक्ति हथियार नहीं रख सकता। तो फिर एक बच्चे को यह हथियार किसने और क्यों दिया? क्या वह हथियार लोडेड था? अगर कोई अनहोनी हो जाती तो ज़िम्मेदार कौन होता?
सरगुजा पुलिस पर सबसे बड़ा सवाल: 2015 से 2026 तक मौन क्यों?
सबसे शर्मनाक और गंभीर सवाल पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर है। यह तस्वीर जनवरी 2015 से सार्वजनिक Facebook Wall पर उपलब्ध है। आज 2026 है। पूरे 11 साल बीत गए!
क्या 11 वर्षों में सरगुजा पुलिस का ‘इंटेलिजेंस’ और साइबर सेल घास चर रहा था?
क्या रसूखदार लोगों के लिए कानून अलग है और आम जनता के लिए अलग?
अगर किसी आम नागरिक की ऐसी तस्वीर आती, तो क्या पुलिस 11 साल इंतज़ार करती?
अंबिकापुर छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण शहर है। इतने संवेदनशील इलाके में एक नागरिक द्वारा वर्षों तक ऐसे हथियारों का प्रदर्शन करना और पुलिस का अनजान बने रहना, दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली होने का संकेत देता है।
वायरल ऑडियो ने खोला ‘पंडोरा बॉक्स’
यह सारा मामला तब प्रकाश में आया जब संजय अंबष्ट का एक कथित ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। ऑडियो की सत्यता की जाँच अभी बाकी है, लेकिन उसके बाद जब लोगों ने उनकी Facebook प्रोफाइल खंगाली, तो हथियारों का यह ‘खज़ाना’ सामने आ गया।
यहाँ सवाल किसी को अपराधी घोषित करने का नहीं है, बल्कि निष्पक्ष जाँच का है। प्रथम दृष्टया उपलब्ध तस्वीरें Arms Act की धारा 3, 7, 9 और 25 के गंभीर उल्लंघन का इशारा कर रही हैं।
लोगों का पुलिस प्रशासन से मांग :
इन तस्वीरों में दिख रहे हथियारों का सोर्स (Source), लाइसेंस और ओनरशिप तत्काल जाँची जाए। क्या ये हथियार सरकारी आर्मरी (Armoury) के थे? सरगुजा पुलिस को जवाब देना होगा कि 11 साल तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। क्या अब पुलिस अपनी ‘कुंभकर्णी नींद’ से जागेगी?
