सकरी डिवीजन में बिना LT लाइन के ट्रांसफार्मर स्थापना पर उठे गंभीर सवाल, अधिकारियों को लोकेशन तक की जानकारी नहीं!
खबर अनील शुक्ला बिलासपुर से,
बिलासपुर। सकरी डिवीजन क्षेत्र में लगभग एक वर्ष पूर्व नगर निगम परिक्षेत्र में करीब 11 खंभों पर 11 केवी विद्युत लाइन बिछाकर 63 किलोवाट क्षमता का ट्रांसफार्मर स्थापित किए जाने का मामला अब सवालों के घेरे में है। बताया जा रहा है कि इस पूरे कार्य का अनुमानित खर्च करीब 10 लाख रुपये के भीतर रहा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह ट्रांसफार्मर किस प्रयोजन से लगाया गया और इसका वास्तविक उपयोग कौन कर रहा है?
सूत्रों के अनुसार, उक्त स्थान पर किसी प्लांट के संचालन के लिए विद्युत व्यवस्था तैयार की जानी थी, लेकिन कथित रूप से प्लांट अस्तित्व में ही नहीं आया। इसके बावजूद विद्युत विभाग द्वारा लाइन और ट्रांसफार्मर की स्थापना कर दी गई। यदि यह जानकारी सही है तो यह जांच का गंभीर विषय है कि बिना वास्तविक विद्युत भार अथवा प्रस्तावित प्लांट के ट्रांसफार्मर स्थापित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
अधिकारियों को अपने ही क्षेत्र में लगे ट्रांसफार्मर की जानकारी नहीं!
मामले की पड़ताल के लिए जब हमारी टीम CSPDCL के सकरी डिवीजन कार्यालय पहुंची और संबंधित सहायक अभियंता एवं कनिष्ठ अभियंता से उक्त ट्रांसफार्मर के संबंध में जानकारी लेने का प्रयास किया गया, तो कार्यालय में मौजूद अधिकारियों ने कथित तौर पर इसकी स्थापना के प्रयोजन के संबंध में अनभिज्ञता जताई।
टीम द्वारा ट्रांसफार्मर का स्थान और लोकेशन स्पष्ट रूप से बताए जाने के बाद भी संबंधित अधिकारियों द्वारा इसके संबंध में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।
यदि किसी डिवीजन क्षेत्र में करीब 10 लाख रुपये की लागत से विद्युत अधोसंरचना तैयार की गई है, तो उसी डिवीजन के अधिकारियों को यह पता क्यों नहीं है कि वह कार्य किसके लिए और किस वर्क ऑर्डर के तहत कराया गया?
सिर्फ 11 केवी लाइन और ट्रांसफार्मर, LT लाइन का अता-पता नहीं
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह बताया जा रहा है कि मौके पर लगभग 11 खंभों के माध्यम से 11 केवी लाइन बिछाकर 63 KW का ट्रांसफार्मर स्थापित किया गया, लेकिन इसके बाद उपभोक्ता अथवा प्रस्तावित प्लांट तक विद्युत आपूर्ति पहुंचाने के लिए आवश्यक LT लाइन के खंभे नजर नहीं आते।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह पूरा विद्युत ढांचा किस उद्देश्य से तैयार किया गया?
क्या यह किसी विशेष व्यक्ति या संस्था के लिए बनाई गई विद्युत व्यवस्था थी?
यदि ऐसा था तो—
– किसने इसकी मांग की?
– किस अधिकारी ने तकनीकी स्वीकृति दी?
– किसके नाम पर कनेक्शन स्वीकृत हुआ?
– किस आधार पर 63 KW ट्रांसफार्मर की आवश्यकता निर्धारित की गई?
– सर्वे किस JE/AE ने किया?
– एस्टीमेट किस अधिकारी ने तैयार और स्वीकृत किया?
– वर्क ऑर्डर किस अधिकारी ने जारी किया?
– कार्य किस ठेकेदार/एजेंसी को दिया गया?
– करीब 10 लाख रुपये का भुगतान किसे किया गया?
– वर्तमान में ट्रांसफार्मर का उपयोग कौन कर रहा है?
– यदि प्रस्तावित प्लांट लगा ही नहीं, तो ट्रांसफार्मर और लाइन का उपयोग किस उद्देश्य से हो रहा है?
CSPDCL के राजस्व को नुकसान हुआ तो जिम्मेदार कौन?
यदि जांच में यह सामने आता है कि बिना वास्तविक आवश्यकता के सार्वजनिक धन से ट्रांसफार्मर और विद्युत लाइन स्थापित की गई तथा उसका उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए नहीं हुआ, तो यह CSPDCL के राजस्व और संसाधनों के संभावित दुरुपयोग का गंभीर मामला हो सकता है।
कंपनी के संसाधनों का उपयोग किसी निजी व्यक्ति या संस्था को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए तो नहीं किया गया—इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
क्या डिवीजन में कुछ छिपाया जा रहा है?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक साल पहले किया गया लाखों रुपये का विद्युत कार्य अगर वास्तव में हुआ है, तो सकरी डिवीजन के संबंधित अधिकारी इसकी फाइल, एस्टीमेट, वर्क ऑर्डर और भुगतान संबंधी जानकारी क्यों नहीं बता पा रहे हैं?
क्या संबंधित अधिकारियों को वास्तव में इसकी जानकारी नहीं है, या फिर जानकारी होने के बावजूद मामले को टालने का प्रयास किया जा रहा है?
दोनों परिस्थितियां गंभीर हैं।
यदि अधिकारियों को जानकारी नहीं है तो यह विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल है और यदि जानकारी होने के बावजूद जानकारी नहीं दी जा रही है तो यह उससे भी गंभीर विषय है।
अब दस्तावेजों से खुलेगा पूरा राज
मामले की वास्तविकता सामने लाने के लिए CSPDCL के उच्च अधिकारियों को संबंधित कार्य की पूरी फाइल की जांच करनी चाहिए। विशेष रूप से—
सर्वे रिपोर्ट, डिमांड नोट, तकनीकी स्वीकृति, एस्टीमेट, प्रशासकीय स्वीकृति, वर्क ऑर्डर, ठेकेदार का नाम, माप पुस्तिका (MB), बिल/भुगतान विवरण, कनेक्शन आवेदन, स्वीकृत लोड, ट्रांसफार्मर स्थापना रिपोर्ट तथा वर्तमान उपयोग की स्थिति।
इन दस्तावेजों से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि 11 खंभों की 11 केवी लाइन और 63 KW ट्रांसफार्मर आखिर किसके लिए और किस नियम के तहत लगाया गया था।
फिलहाल सकरी डिवीजन के अधिकारियों की कथित अनभिज्ञता ने इस पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है। अब देखना यह है कि CSPDCL के उच्च अधिकारी इस मामले की जांच कराते हैं या फिर लाखों रुपये की लागत से खड़ी की गई इस विद्युत व्यवस्था की फाइल भी सरकारी दफ्तरों की फाइलों के बीच दबकर रह जाएगी।
