खबर अनिल शुक्ला की बिलासपुर से,
बिलासपुर। बिलासपुर कलेक्ट्रेट की नकल शाखा में कामकाज की व्यवस्था और राजस्व अभिलेखों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतों और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस महत्वपूर्ण शाखा में पदस्थ लिपिक संतोष श्रीवास लगभग 20 वर्षों से इसी शाखा में जमे हुए हैं। इतने लंबे समय से एक ही शाखा में पदस्थ रहने के कारण राजस्व रिकॉर्ड और अभिलेखों की जानकारी पर उनकी मजबूत पकड़ बताई जाती है।
सूत्रों का दावा है कि लंबे समय से एक ही जगह पदस्थ रहने का प्रभाव अब शाखा के कामकाज पर इस कदर दिखाई देने लगा है कि शाखा की पूरी व्यवस्था उनके इर्द-गिर्द संचालित होने की चर्चा है। अधिकारियों के आदेश-निर्देशों के पालन और शाखा में पारदर्शी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
शाम 6 बजे बाद कलेक्ट्रेट खाली, फिर भी खुलती है नकल शाखा?
सबसे गंभीर आरोप नकल शाखा के कार्यालयीन समय के बाद संचालन को लेकर सामने आ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, शाम लगभग 6 बजे के बाद जब कलेक्ट्रेट परिसर में अधिकांश कर्मचारी और अधिकारी अपने कार्यालय से निकल जाते हैं, तब भी कथित तौर पर नकल शाखा खोली जाती है।
आरोप है कि इस दौरान आम लोगों के लिए नहीं बल्कि कुछ ‘विशेष’ लोगों को रिकॉर्ड का अवलोकन और जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाती है।
यदि यह आरोप सही है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि कार्यालयीन समय समाप्त होने के बाद नकल शाखा किसके आदेश से खोली जाती है? उस समय रिकॉर्ड तक पहुंच किसे और किस अनुमति से दी जाती है? तथा कार्यालय बंद होने के बाद शाखा में मौजूद रहने और रिकॉर्ड देखने की जिम्मेदारी किस अधिकारी की होती है?
मूल रिकॉर्ड की फोटोकॉपी शाखा के बाहर कराने का आरोप
सूत्रों का यह भी दावा है कि कुछ विशेष लोगों को कथित तौर पर मूल राजस्व अभिलेख शाखा से बाहर ले जाकर उनकी फोटोकॉपी कराने की सुविधा तक उपलब्ध कराई जाती है और इसके एवज में विशेष शुल्क लिए जाने की चर्चा है।
यह आरोप यदि जांच में सही पाया जाता है तो मामला केवल नियमों की अनदेखी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
क्योंकि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज छोटी-सी जानकारी भी जमीन के स्वामित्व, कब्जे, विवाद और क्रय-विक्रय को प्रभावित कर सकती है।
‘खास’ लोगों को तत्काल जानकारी, आम आदमी आवेदन के बाद भी इंतजार में?
नकल शाखा को लेकर एक और गंभीर शिकायत यह है कि आम नागरिकों को रिकॉर्ड प्राप्त करने के लिए आवेदन और निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जबकि प्रभावशाली लोगों को कथित तौर पर फोन के माध्यम से ही रिकॉर्ड की जानकारी उपलब्ध हो जाती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकारी राजस्व अभिलेखों तक पहुंच के लिए दो अलग-अलग व्यवस्थाएं चल रही हैं?
यदि नहीं, तो प्रशासन यह स्पष्ट करे कि कार्यालयीन समय के बाद शाखा खुलने, रिकॉर्ड दिखाए जाने और रिकॉर्ड की प्रतिलिपि तैयार कराने की अनुमति किस प्रक्रिया के तहत दी जाती है।
रिकॉर्ड गायब होने की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
सबसे बड़ा सवाल राजस्व रिकॉर्ड की सुरक्षा को लेकर है। सूत्रों का दावा है कि नकल शाखा से रिकॉर्ड गायब होने की सबसे अधिक घटनाएं संतोष श्रीवास के कार्यकाल के दौरान ही हुई हैं।
यह दावा अपने आप में जांच का विषय है। प्रशासन यदि पिछले 20 वर्षों के रिकॉर्ड की स्थिति, गुम हुए अभिलेखों की शिकायतें, रिकॉर्ड मूवमेंट रजिस्टर, नकल आवेदनों और रिकॉर्ड जारी किए जाने की प्रक्रिया की जांच करे तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।
20 साल एक ही शाखा में पदस्थापना भी बनी चर्चा का विषय
राजस्व रिकॉर्ड जैसी संवेदनशील शाखा में किसी कर्मचारी की लगभग दो दशक तक लगातार पदस्थापना को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इतने लंबे समय तक एक ही शाखा में रहने से किसी कर्मचारी को रिकॉर्ड, प्रक्रियाओं और शाखा की आंतरिक व्यवस्था की असाधारण जानकारी होना स्वाभाविक है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इसी वजह से शाखा की व्यवस्था एक व्यक्ति पर निर्भर होती जा रही है?
अब जांच से ही सामने आएगा सच
नकल शाखा से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए प्रशासन को पिछले कई वर्षों के—
– रिकॉर्ड मूवमेंट रजिस्टर,
– नकल आवेदन एवं वितरण रजिस्टर,
– कार्यालयीन समय के बाद शाखा खोलने की अनुमति,
– रिकॉर्ड के अवलोकन से संबंधित प्रविष्टियां,
– गायब या क्षतिग्रस्त अभिलेखों की जानकारी,
– सीसीटीवी फुटेज तथा
– रिकॉर्ड की फोटोकॉपी/प्रतिलिपि से संबंधित प्रक्रिया
की जांच करनी चाहिए।
मामला बेहद गंभीर है, क्योंकि सवाल किसी एक कर्मचारी की मनमानी का नहीं बल्कि सरकारी राजस्व अभिलेखों की सुरक्षा और आम नागरिक के अधिकारों का है।
अब देखना यह है कि कलेक्ट्रेट प्रशासन इन गंभीर आरोपों की जांच कराता है या फिर नकल शाखा में वर्षों से चली आ रही ‘व्यवस्था’ यूं ही जारी रहती है।
