(खबर अनिल शुक्ला की बिलासपुर से )
पांचशाला गायब, ऑनलाइन रिकॉर्ड में गड़बड़ी के आरोप; पटवारी हल्का क्र. 61 में भू-स्वामी परेशान
1984-90 का रिकॉर्ड मौजूद, 1990-95 का पता नहीं! आखिर कहां गए महत्वपूर्ण राजस्व अभिलेख? तहसील से जिला रिकॉर्ड रूम तक उठ रहे सवाल
बिलासपुर/सकरी। सकरी तहसील के पटवारी हल्का क्रमांक 61, ग्राम घुरू में राजस्व रिकॉर्ड को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि पुराने राजस्व अभिलेखों की अनुपलब्धता और वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड में कथित विसंगतियों के बीच जमीन मालिकों को रिकॉर्ड दुरुस्ती के नाम पर परेशान होना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि जिन लोगों के पास जमीन की रजिस्ट्री, पुराने दस्तावेज और नामांतरण संबंधी कागजात मौजूद हैं, उन्हें भी अपने ही भूमि रिकॉर्ड को दुरुस्त कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
पांचशाला जैसे महत्वपूर्ण रिकॉर्ड का अता-पता नहीं
राजस्व मामलों में खसरा पांचशाला, बी-1, पी-2 और नक्शा जैसे अभिलेख भूमि की स्थिति और स्वामित्व संबंधी जानकारी के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। लेकिन ग्राम घुरू के पांचशाला रिकॉर्ड को लेकर ही सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिला रिकॉर्ड रूम में ग्राम घुरू का पांचशाला रिकॉर्ड 1984 से 1990 तक उपलब्ध बताया जा रहा है। इसके पहले और बाद के रिकॉर्ड की स्थिति स्पष्ट नहीं है। वहीं सकरी तहसील कार्यालय में 1990 से 1995 के बीच के रिकॉर्ड के संबंध में भी जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आ रही है।
सवाल सीधा है—रिकॉर्ड गया कहां? और अगर रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
रिकॉर्ड नहीं तो दुरुस्ती किस आधार पर?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब पुराने रिकॉर्ड ही अधूरे या अनुपलब्ध बताए जा रहे हैं, तब वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड में दुरुस्ती का आधार क्या बनाया जा रहा है?
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कई मामलों में रिकॉर्ड दुरुस्ती की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और भू-स्वामियों को स्पष्ट जानकारी दिए बिना रिकॉर्ड में बदलाव किए जाने की आशंका है। यदि यह आरोप सही है तो यह केवल एक पटवारी हल्के की समस्या नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर मामला है।
राजस्व अभिलेख में नाम, रकबा, खसरा या नक्शे से संबंधित परिवर्तन निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया और सक्षम राजस्व अधिकारी के आदेश के अधीन होने चाहिए। ऐसे में यह जांच का विषय है कि घुरू हल्का में रिकॉर्ड दुरुस्ती किन आदेशों और किन मूल दस्तावेजों के आधार पर की गई।
हाईकोर्ट के अधिवक्ता की जमीन भी विवाद के घेरे में
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक प्रकरण हाईकोर्ट के एक अधिवक्ता से भी जुड़ा बताया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2016 में खसरा नंबर 603 में से 945 वर्गफुट जमीन पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से खरीदी गई थी। इसके बाद नामांतरण तथा बी-1, पी-2 और डायवर्सन संबंधी रिकॉर्ड में भी प्रविष्टियां होने की बात कही गई है।
तत्कालीन पटवारी आभा तंबोली द्वारा नामांतरण की कार्यवाही किए जाने और हस्ताक्षरित ऑफलाइन बी-1, पी-2 जारी किए जाने का दावा है। लेकिन ऑनलाइन रिकॉर्ड व्यवस्था लागू होने के बाद पुराने कागजी रिकॉर्ड को डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज/दुरुस्त करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जब पुराने दस्तावेज मौजूद हैं तो ऑनलाइन रिकॉर्ड उनसे मेल क्यों नहीं खा रहा? और यदि अंतर है तो उसे किसके आदेश पर ठीक किया गया या बदला गया?
एक नहीं, कई भू-स्वामी परेशान होने का दावा
स्थानीय स्तर पर यह भी शिकायत सामने आ रही है कि घुरू में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने बाकायदा जमीन खरीदी, रजिस्ट्री कराई और नामांतरण की प्रक्रिया पूरी की, लेकिन आज उन्हें अपने रिकॉर्ड की दुरुस्ती के लिए पटवारी कार्यालय और तहसील कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
कुछ भूमि स्वामियों द्वारा जमीन पर दूसरे लोगों के कब्जे की शिकायत किए जाने की बात भी सामने आई है।
यदि भूमि रिकॉर्ड ही अस्पष्ट हो जाए, पुराने दस्तावेज गायब हों और वर्तमान रिकॉर्ड में भी विसंगतियां हों, तो इसका फायदा कौन उठा रहा है और नुकसान किसका हो रहा है—यह जांच का विषय है।
कागजों की जगह ऑनलाइन रिकॉर्ड आया, लेकिन गड़बड़ी कौन कर गया?
भू-अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण और ई-नामांतरण की व्यवस्था का उद्देश्य रिकॉर्ड को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और व्यवस्थित बनाना था। लेकिन घुरू में सामने आ रही शिकायतें इसके उलट तस्वीर पेश कर रही हैं।
पुराने कागजी रिकॉर्ड और वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड का लाइन-बाय-लाइन मिलान कराया जाए तो संभव है कि कई सवालों के जवाब सामने आ जाएं।
लेकिन सवाल यह है कि यह जांच करेगा कौन?
जिस व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, उसी व्यवस्था के जिम्मेदार अधिकारी यदि जांच करेंगे तो निष्पक्षता कितनी रहेगी?
तहसील से रिकॉर्ड रूम तक जवाबदेही तय हो
मामले में केवल वर्तमान पटवारी की भूमिका की जांच पर्याप्त नहीं होगी। वर्ष 1984 से अब तक के ग्राम घुरू के राजस्व अभिलेखों की पूरी चेन की जांच आवश्यक है।
– पांचशाला रिकॉर्ड किस-किस वर्ष उपलब्ध है?
– 1990 से 1995 के रिकॉर्ड कहां हैं?
– रिकॉर्ड रूम से अभिलेख कब और किसके द्वारा लिए गए?
– रिकॉर्ड गायब है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
– पुराने बी-1, पी-2 और वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड में कितना अंतर है?
– रिकॉर्ड दुरुस्ती किन आदेशों के आधार पर की गई?
– कितने मामलों में रिकॉर्ड में परिवर्तन किया गया?
– क्या प्रभावित भूमि स्वामियों को नोटिस या सुनवाई का अवसर दिया गया?
– वर्तमान रिकॉर्ड का पुराने मूल अभिलेखों से सत्यापन कराया गया या नहीं?
अब जांच नहीं हुई तो बढ़ेंगे जमीन विवाद
घुरू पटवारी हल्का क्रमांक 61 का मामला अब केवल रिकॉर्ड दुरुस्ती की शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है। यह भूमि रिकॉर्ड की विश्वसनीयता, सरकारी दस्तावेजों के संरक्षण और भू-स्वामियों के अधिकारों से जुड़ा सवाल बन चुका है।
जरूरत है कि जिला प्रशासन पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराए। जिला रिकॉर्ड रूम, सकरी तहसील और पटवारी हल्का 61 के रिकॉर्ड का आपस में मिलान कराया जाए। पुराने कागजी दस्तावेजों, रजिस्ट्री, नामांतरण आदेश, बी-1, पी-2, पांचशाला, नक्शा और वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड की जांच हो।
क्योंकि जमीन के कागजों में एक छोटी सी गलती भी किसी के वर्षों के अधिकार को विवाद में डाल सकती है।
और घुरू में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि रिकॉर्ड में गलती हुई या नहीं—सवाल यह है कि अगर हुई है तो गलती किसने की, किस आधार पर की और उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
