पितृपक्ष में बिहार की पारंपरिक पूजा से जीवंत हुई संस्कृति, अरपा नदी किनारे महिलाओं ने की आराधना
बिलासपुर। भारत विविध धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं का देश है। सनातन धर्म में पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व माना गया है। सुख हो या दुख, खुशी हो या गम—हर परिस्थिति में ईश्वर की आराधना और अपनी परंपराओं से जुड़े रहना भारतीय संस्कृति की विशेष पहचान रही है।
इन दिनों पितृपक्ष का समय चल रहा है। इसी दौरान बिहार की महिलाओं द्वारा अपनी पारंपरिक संस्कृति और आस्था के अनुरूप संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। बिहार से आकर बिलासपुर में निवास कर रहे परिवारों ने भी अपनी संस्कृति और परंपरा को जीवंत रखा है।
इसी क्रम में अरपा नदी के
पचरीघाट के समीप एक महिला को श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते हुए देखा गया। जानकारी लेने पर बताया गया कि यह पूजा माताएं अपने पुत्र की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना के लिए करती हैं। इस अवसर पर महिलाएं व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा करती हैं और अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं।
मान्यता है कि जिन महिलाओं को संतान की प्राप्ति नहीं हुई है, वे भी श्रद्धा और आस्था के साथ इस पूजा को करती हैं तथा संतान प्राप्ति की कामना करती हैं। वहीं जिन माताओं की संतान है, वे उनकी दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत एवं पूजा-अर्चना करती हैं।
हमर संगवारी के संपादक विजय दुसेजा ने जब अरपा नदी किनारे इस धार्मिक आयोजन को देखा और इसकी जानकारी ली, तो बिहार की इस पारंपरिक पूजा और उससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में जानकारी मिली। आधुनिकता के इस दौर में भी माताओं द्वारा अपनी पुरानी परंपराओं, संस्कृति और आस्था को संजोकर रखना समाज के लिए प्रेरणादायी है।
भारतीय संस्कृति में मां का स्थान सर्वोच्च माना गया है। मां अपने बच्चों के सुख, स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए स्वयं कष्ट सहकर भी व्रत रखती है और भगवान से प्रार्थना करती है। ऐसी माताओं की श्रद्धा और समर्पण को नमन है, जो अपनी संस्कृति और सभ्यता को न केवल संजोए हुए हैं, बल्कि उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य भी कर रही हैं।
