सकरी डिविजन में 63 किलोवाट ट्रांसफार्मर और 11 केवी लाइन विस्तार पर गंभीर सवाल; करीब एक साल बाद भी विभाग के पास स्पष्ट जवाब नहीं
बिलासपुर। सीएसपीडीसीएल के सकरी डिविजन में बिजली अधोसंरचना के विस्तार को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें उद्योग स्थापित करने के प्रस्ताव, ट्रांसफार्मर स्थापना और 11 केवी लाइन विस्तार की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि जिस स्थान पर उद्योग लगाने के नाम पर विद्युत सुविधा विकसित की गई, वहां आज तक प्रस्तावित उद्योग स्थापित होने की जानकारी सामने नहीं आई है।
जानकारी के अनुसार नगर निगम क्षेत्र में एक हितग्राही द्वारा फ्लाई ऐश ब्रिक्स उद्योग स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। इसी आधार पर संबंधित क्षेत्र में करीब 63 किलोवाट क्षमता का ट्रांसफार्मर तथा 11 केवी लाइन का विस्तार किया गया। आरोप है कि उद्योग के नाम पर विद्युत अधोसंरचना तो खड़ी कर दी गई, लेकिन मौके पर प्रस्तावित उद्योग स्थापित नहीं हुआ।
उद्योग नहीं, फिर किसके लिए बिछी बिजली लाइन?
मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि उद्योग स्थापित करने के लिए विद्युत सुविधा की स्वीकृति दी गई थी तो उद्योग की वास्तविक स्थापना, मशीनरी, उत्पादन इकाई और औद्योगिक गतिविधि का सत्यापन किस स्तर पर किया गया?
बताया जा रहा है कि जिस क्षेत्र में ट्रांसफार्मर लगाया गया, वहां प्लॉटिंग की गई और भूखंड खरीदारों को बिजली सुविधा उपलब्ध कराने का वादा भी किया गया था। ऐसे में यह जांच का विषय है कि कहीं उद्योग के नाम पर स्वीकृत विद्युत अधोसंरचना का वास्तविक उपयोग बाद में प्लॉटिंग क्षेत्र को बिजली उपलब्ध कराने के लिए तो नहीं किया गया।
स्थानीय अधिकारियों को जानकारी नहीं तो स्वीकृति किसने दी?
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सकरी सब डिविजन के सहायक अभियंता, कनिष्ठ अभियंता और संबंधित कार्यालयीन अधिकारियों से इस ट्रांसफार्मर और 11 केवी लाइन विस्तार की जानकारी मांगे जाने पर कथित तौर पर उन्होंने इसकी जानकारी होने से इनकार किया।
यदि यह स्थिति सही है तो सवाल सीधा है—ट्रांसफार्मर की स्वीकृति किसने दी, कार्यादेश किस आधार पर जारी हुआ, स्थल निरीक्षण किसने किया और भुगतान किस सत्यापन के बाद किया गया?
ईई मिलिंद पांडे से जवाब मांगने पर भी स्पष्टता नहीं
इस पूरे मामले में सकरी डिविजन के प्रमुख कार्यपालन अभियंता मिलिंद पांडे से कई बार जानकारी और उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया। लेकिन अब तक इस मामले में उनकी ओर से कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। कई बार फोन किए जाने के बावजूद संपर्क नहीं हो सका और मुलाकात का प्रयास भी सफल नहीं हुआ।
ऐसे संवेदनशील मामले में डिविजन के शीर्ष अधिकारी की ओर से स्पष्ट जवाब सामने नहीं आना अपने आप में सवाल खड़े करता है। क्या उन्हें इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी है? यदि है तो उनकी निगरानी में किस आधार पर ट्रांसफार्मर और लाइन विस्तार को मंजूरी मिली? और यदि जानकारी नहीं है तो उनके ही डिविजन में हुए इस कार्य की निगरानी व्यवस्था पर सवाल क्यों न उठें?
हालांकि, मिलिंद पांडे की ओर से कोई आरोप स्वीकार किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है और उनका आधिकारिक पक्ष प्राप्त होना बाकी है। उनका पक्ष मिलने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
करीब एक साल से ट्रांसफार्मर चालू, जांच अब तक क्यों?
बताया जा रहा है कि ट्रांसफार्मर को लगे करीब एक वर्ष होने जा रहा है और लाइन भी चालू है। संबंधित ठेकेदार को भुगतान हो चुका है। ऐसे में अब सवाल केवल ट्रांसफार्मर लगाने का नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की वैधता, तकनीकी जांच और विभागीय जवाबदेही का है।
क्या उद्योग विभाग से उद्योग स्थापना का वास्तविक प्रमाण-पत्र लिया गया था?
क्या मौके पर उद्योग का भौतिक निरीक्षण हुआ था?
क्या विद्युत विभाग ने स्थल का सत्यापन किया?
क्या प्रस्तावित उद्योग की क्षमता और वास्तविक विद्युत भार का मिलान किया गया?
सीएसपीडीसीएल कराएगी स्वतंत्र जांच?
यदि जांच में उद्योग के नाम पर विद्युत अधोसंरचना स्वीकृत कराने और उसका उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए किए जाने की पुष्टि होती है, तो कंपनी को हुए संभावित वित्तीय नुकसान के साथ जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
अब सवाल है कि क्या सीएसपीडीसीएल इस मामले में स्वीकृति फाइल, उद्योग प्रमाणन, स्थल निरीक्षण रिपोर्ट, कार्यादेश, माप पुस्तिका, भुगतान रिकॉर्ड और वास्तविक उपयोग की स्वतंत्र जांच कराएगी?
उद्योग के नाम पर बना प्रस्ताव जमीन पर कितना वास्तविक था और सरकारी बिजली अधोसंरचना का वास्तविक लाभ किसे मिला—इसका जवाब अब सीएसपीडीसीएल के उच्चाधिकारियों को देना होगा।
