अस्थायी लाइसेंस के लिए करीब 300 आवेदन, लेकिन दशकों पुराने स्थायी लाइसेंसों की जमीनी जांच पर बड़ा सवाल
शहर बढ़ गया, आबादी बढ़ गई, बदली भौगोलिक परिस्थितियां… फिर भी 40-50 साल पुराने लाइसेंसों पर उसी जगह कारोबार?
बिलासपुर। दीपावली का पर्व नजदीक आते ही बिलासपुर में पटाखों का कारोबार जोर पकड़ने लगा है। प्रशासन ने अस्थायी पटाखा दुकानों के लाइसेंस के लिए आवेदन बुलाए हैं। बताया जा रहा है कि अब तक करीब 300 आवेदन प्राप्त हो चुके हैं। आवेदनों की जांच के लिए आम बैठक आयोजित की जाएगी। आवेदन के साथ नगर निगम से संबंधित शपथ पत्र, पुलिस सत्यापन और 600 रुपये का चालान शुल्क जमा कराया जा रहा है।
शहर के भीतर लगने वाली अस्थायी पटाखा दुकानों के लाइसेंस का नवीनीकरण एडीएम कार्यालय बिलासपुर से किया जाना है, जबकि शहर के आसपास के क्षेत्रों में लगने वाली दुकानों के लिए संबंधित अनुविभागीय अधिकारी के स्तर पर प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
लेकिन अस्थायी दुकानों के लाइसेंस की इस पूरी प्रक्रिया के बीच एक बड़ा सवाल उन स्थायी विस्फोटक लाइसेंसधारकों को लेकर खड़ा हो रहा है, जिनके लाइसेंस कई दशक पुराने बताए जा रहे हैं।
50 साल पहले का लाइसेंस, आज का बिलासपुर कितना बदल गया?
फोल्डर कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार बिलासपुर में कुछ स्थायी पटाखा/विस्फोटक लाइसेंस करीब 50 वर्ष पुराने बताए जाते हैं। जिस समय इन लाइसेंसों को जारी किया गया था, उस समय संबंधित स्थानों की आबादी, निर्माण और आसपास का भू-उपयोग आज की तुलना में बिल्कुल अलग था।
वर्षों के दौरान बिलासपुर शहर का तेजी से विस्तार हुआ। खाली जमीनों पर मकान और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े हो गए। कई इलाकों में घनी आबादी बस गई। सड़कें, बाजार और अन्य संवेदनशील संस्थान भी विकसित हुए।
इसके बावजूद यदि पुराने लाइसेंस आज भी उन्हीं स्थानों पर प्रभावी हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में उन स्थानों की सुरक्षा का दोबारा मूल्यांकन किया गया है?
स्थायी लाइसेंसधारकों के प्रतिष्ठानों का मौका निरीक्षण हुआ या नहीं?
जानकारी के अनुसार शहर में स्थायी लाइसेंसधारी बड़े पटाखा कारोबारियों द्वारा बड़े पैमाने पर थोक कारोबार किया जाता है। सवाल यह है कि इन प्रतिष्ठानों में रखे जाने वाले विस्फोटक स्टॉक, भंडारण की क्षमता, आसपास की वर्तमान आबादी और सुरक्षा व्यवस्था का नियमित अथवा समय-समय पर भौतिक निरीक्षण आखिर किस स्तर पर किया जाता है?
यदि निरीक्षण होता है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं है?
और यदि निरीक्षण नहीं होता, तो इतने संवेदनशील कारोबार को केवल पुराने लाइसेंस के आधार पर संचालित करने की अनुमति किस सुरक्षा मूल्यांकन के आधार पर दी जा रही है?
अस्थायी दुकानदारों पर नियम, स्थायी कारोबार पर निगरानी कितनी?
एक ओर अस्थायी पटाखा दुकान लगाने वाले आवेदकों से शपथ पत्र, पुलिस सत्यापन और शुल्क जैसी औपचारिकताएं पूरी कराई जा रही हैं। दूसरी ओर दशकों पुराने स्थायी लाइसेंसों के मामले में वर्तमान स्थल की वास्तविक स्थिति, आसपास की आबादी और भंडारण व्यवस्था की जांच कितनी प्रभावी ढंग से हो रही है, यह स्पष्ट नहीं है।
सवाल यह भी है कि क्या स्थायी लाइसेंस का मतलब यह मान लिया गया है कि लाइसेंस जारी होने के बाद स्थल की परिस्थितियां बदलने पर भी उसकी सुरक्षा समीक्षा जरूरी नहीं?
पुलिस सत्यापन भी बन रहा सवाल
अस्थायी लाइसेंस के लिए पुलिस सत्यापन की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार कई मामलों में थानों से भेजे जाने वाले सत्यापन में मुख्य रूप से यही उल्लेख किया जाता है कि आवेदक के विरुद्ध कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं है।
लेकिन क्या केवल आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होना ही पटाखा व्यवसाय के लिए पर्याप्त पुलिस सत्यापन है?
क्या पुलिस यह भी जांच करती है कि—
– आवेदक पटाखों का कारोबार किस स्थान से करेगा?
– वहां सुरक्षा की स्थिति क्या है?
– प्रस्तावित दुकान या भंडारण स्थल के आसपास कितनी आबादी है?
– पटाखों का भंडारण कहां और कितनी मात्रा में होगा?
– आवेदक द्वारा घोषित परिसर का वास्तविक उपयोग क्या है?
यदि इन बिंदुओं की जांच नहीं होती, तो पुलिस सत्यापन केवल अपराध रिकॉर्ड की जांच तक सीमित औपचारिकता बनकर रह जाने का सवाल पैदा करता है।
नगर निगम की भूमिका भी महत्वपूर्ण
पटाखा दुकानों के लिए स्थान, बाजार व्यवस्था और स्थानीय स्तर की व्यवस्थाओं में नगर निगम की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में यह भी देखना होगा कि नगर निगम द्वारा पटाखा बाजारों के लिए चयनित स्थानों की सुरक्षा, आवागमन, अग्निशमन व्यवस्था और आसपास की आबादी का कितना ध्यान रखा जाता है।
हर वर्ष पटाखा बाजार लगते हैं, लेकिन इन बाजारों में रखे जाने वाले पटाखों के कुल स्टॉक का वास्तविक सत्यापन कौन करता है?
क्या दुकानदार द्वारा घोषित स्टॉक और वास्तविक स्टॉक का मिलान किया जाता है?
प्रतिबंधित पटाखों की जांच कौन करता है?
एक और गंभीर प्रश्न पर्यावरणीय मानकों से जुड़ा है। बाजार में बिकने वाले पटाखों में प्रतिबंधित अथवा निर्धारित मानकों के विपरीत पटाखों की जांच की जिम्मेदारी संबंधित विभागों पर आती है।
लेकिन सवाल यह है कि बिलासपुर में पटाखा बाजार शुरू होने से लेकर बिक्री समाप्त होने तक कितनी बार स्टॉक की जांच की जाती है?
कितने नमूने लिए जाते हैं?
कितने पटाखों की गुणवत्ता अथवा मानकों की जांच की जाती है?
और यदि प्रतिबंधित पटाखे पाए जाते हैं तो कितनी कार्रवाई होती है?
इन सवालों के स्पष्ट आंकड़े सामने आना जरूरी है।
बिक्री के बाद बचे पटाखे कहां जाते हैं?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल बिक्री समाप्त होने के बाद बचे हुए पटाखों के भंडारण को लेकर है।
यदि किसी व्यापारी के पास बड़ी मात्रा में पटाखे बिक्री के बाद बच जाते हैं, तो वे पटाखे कहां रखे जाते हैं?
क्या संबंधित व्यापारी को अपने घर, दुकान अथवा किसी अन्य स्थान पर पटाखे रखने की अनुमति है?
क्या उसके घोषित गोदाम का निरीक्षण किया जाता है?
क्या बचे हुए स्टॉक की मात्रा का रिकॉर्ड तैयार होता है?
यदि यह पूरी प्रक्रिया निर्धारित और निगरानी में है तो इसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं होती?
‘जब जो होगा, तब देखा जाएगा’ वाला रवैया तो नहीं?
पटाखों का कारोबार सीधे तौर पर आग और विस्फोट के जोखिम से जुड़ा हुआ है। ऐसे में प्रशासन का दायित्व केवल लाइसेंस आवेदन लेना, कागजात पूरा करना और अनुमति जारी करना भर नहीं हो सकता।
असल सवाल यह है कि लाइसेंस देने के बाद निगरानी कौन करेगा?
यदि किसी लाइसेंसधारी के परिसर के आसपास वर्षों में घनी आबादी बस गई है तो उसकी सुरक्षा समीक्षा कौन करेगा?
यदि वास्तविक स्टॉक घोषित क्षमता से अधिक है तो कार्रवाई कौन करेगा?
यदि प्रतिबंधित पटाखे बिक रहे हैं तो जांच कौन करेगा?
और यदि किसी दुर्घटना के बाद यह सामने आता है कि संबंधित परिसर वर्षों से सुरक्षा की दृष्टि से अनुपयुक्त था, तो इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की होगी?
प्रशासन से सीधे सवाल
1. बिलासपुर में वर्तमान में कितने स्थायी पटाखा/विस्फोटक लाइसेंस सक्रिय हैं?
2. इनमें कितने लाइसेंस 20, 30, 40 या 50 वर्ष पुराने हैं?
3. पुराने लाइसेंसधारकों के वर्तमान परिसर का अंतिम भौतिक निरीक्षण कब हुआ?
4. क्या पुराने लाइसेंस जारी होने के समय की भौगोलिक स्थिति और वर्तमान आबादी की स्थिति का तुलनात्मक सुरक्षा मूल्यांकन किया गया?
5. स्थायी लाइसेंसधारकों के पास निर्धारित सीमा से अधिक पटाखा स्टॉक तो नहीं है, इसकी जांच कौन करता है?
6. अस्थायी लाइसेंस के लिए पुलिस सत्यापन में केवल आपराधिक रिकॉर्ड देखा जाता है या व्यवसाय और भंडारण स्थल की भी जांच होती है?
7. पटाखा बाजार में प्रतिबंधित पटाखों की जांच के लिए कितनी टीमों का गठन किया गया है?
8. बिक्री समाप्त होने के बाद बचे पटाखों के स्टॉक और उनके भंडारण स्थल का सत्यापन कौन करता है?
9. क्या नगर निगम, पुलिस, प्रशासन, अग्निशमन और पर्यावरण विभाग द्वारा संयुक्त निरीक्षण की कोई व्यवस्था है?
10. यदि किसी पुराने लाइसेंस वाले परिसर के आसपास अब घनी आबादी बस चुकी है, तो क्या प्रशासन उस लाइसेंस की वर्तमान सुरक्षा स्थिति की समीक्षा करेगा?
सबसे बड़ा सवाल—दुर्घटना का इंतजार क्यों?
बिलासपुर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में पटाखों के कारोबार को केवल व्यापारिक गतिविधि मानकर नहीं देखा जा सकता। जहां एक तरफ करीब 300 आवेदनों की अस्थायी लाइसेंस प्रक्रिया में दस्तावेज, शपथपत्र और पुलिस सत्यापन की औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ दशकों पुराने स्थायी लाइसेंसों के वर्तमान स्वरूप और उनकी जमीनी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शहर बढ़ गया, आबादी बढ़ गई, इमारतें बढ़ गईं और बाजार बदल गए—तो क्या पटाखा कारोबार की सुरक्षा व्यवस्था भी उसी अनुपात में बदली है?
या फिर व्यवस्था का मूल मंत्र यही है कि लाइसेंस है तो कारोबार चलता रहेगा और हादसा होने के बाद जिम्मेदारी तय की जाएगी?
बिलासपुर की जनता को इस सवाल का जवाब हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले चाहिए।
