CIMS, जिला अस्पताल और GeM खरीदी पर पत्रकारों ने मांगा जवाब—सवाल बढ़े तो कहा, ‘आज के विषय तक ही सवाल रखें’; अंत में ‘खाना खाइए, सवाल मत करिए’ की टिप्पणी से बढ़ी नाराजगी
बिलासपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन और गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाने के लिए आयोजित प्रेस वार्ता उस समय सवालों के घेरे में आ गई, जब पत्रकारों ने सरकार की उपलब्धियों से आगे बढ़कर स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही पर सवाल करना शुरू कर दिया।
सोमवार को बिलासपुर के होटल ग्रैंड अंबा के द्वितीय तल पर प्रदेश के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, चिकित्सा शिक्षा तथा पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की प्रेस वार्ता आयोजित की गई। मंच पर बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला, बिल्हा विधायक धरमलाल कौशिक, क्रेडा अध्यक्ष भूपेंद्र सावन्नी, भाजपा शहर जिला अध्यक्ष दीपक सिंह और ग्रामीण जिला अध्यक्ष मोहित जायसवाल सहित अन्य नेता मौजूद रहे।
प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के सेवा कार्य और विकास उपलब्धियों का उल्लेख प्रमुखता से किया गया। लेकिन पत्रकारों ने जब इसी विकास मॉडल को स्वास्थ्य विभाग की स्थानीय व्यवस्था और पारदर्शिता की कसौटी पर कसना शुरू किया तो सवालों की दिशा बदल गई।
हाल में स्वास्थ्य मंत्री ने स्वयं CIMS का औचक निरीक्षण किया था और वहां व्यवस्थाओं का जायजा लिया था। वहीं CIMS की व्यवस्थाओं और उपकरण खरीदी को लेकर हाईकोर्ट में चल रहे मामले में स्वास्थ्य सचिव की ओर से शपथ पत्र भी प्रस्तुत किया गया है।
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बॉक्स 1 | उपलब्धियों की बात, लेकिन विभाग की जवाबदेही पर खामोशी?
पत्रकारों ने सवाल उठाया कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास और सुशासन को आदर्श मानकर आगे बढ़ने की बात कही जा रही है, तो स्वास्थ्य विभाग में सामने आने वाली कथित अनियमितताओं पर भी उसी पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?
विशेष रूप से CIMS, जिला अस्पताल और सरकारी खरीदी से जुड़े सवालों पर मंत्री से स्पष्ट जवाब और कार्रवाई की स्थिति जानने की कोशिश की गई।
सवाल यह भी था कि यदि खरीदी प्रक्रिया में किसी स्तर पर गड़बड़ी है तो उसकी जांच कौन करेगा और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की समयसीमा क्या होगी?
लेकिन पत्रकारों को इन सवालों पर स्पष्ट जवाब मिलने के बजाय प्रेस वार्ता के निर्धारित विषय तक सवाल सीमित रखने की बात कही गई।
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बॉक्स 2 | GeM पोर्टल की खरीदी बनी सबसे बड़ा सवाल
CIMS और स्वास्थ्य विभाग में GeM पोर्टल के माध्यम से होने वाली खरीदी पर पत्रकारों ने सवाल उठाए।
सवाल था कि क्या प्रत्येक खरीदी प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा, तकनीकी पात्रता, दर और आपूर्ति की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच होती है? क्या किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने की शिकायतों की जांच कराई गई है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2026 में CIMS के लिए चिकित्सा उपकरणों की GeM निविदाएं सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर एक निविदा में विभिन्न चिकित्सा उपकरणों के लिए CIMS को consignee बनाया गया था।
हालांकि किसी कंपनी या अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप केवल निविदा अथवा खरीदी प्रक्रिया के आधार पर सिद्ध नहीं माना जा सकता। असली सवाल यह है कि पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही और शिकायत आने पर उसकी स्वतंत्र जांच हुई या नहीं?
पत्रकारों की मांग इसी बिंदु पर थी—सरकार कागज पर नहीं, जांच और कार्रवाई के रूप में जवाब दे।
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बॉक्स 3 | अपोलो-आयुष्मान सवाल पर विधायक ने बदली तस्वीर
प्रेस वार्ता में बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला से अपोलो अस्पताल में आयुष्मान कार्ड से उपचार के मुद्दे को लेकर किए गए उनके आंदोलन पर सवाल किया गया।
इस पर विधायक ने स्पष्ट किया कि उन्होंने धरना नहीं दिया था, बल्कि अपनी मांग रखी थी और उनकी कुछ मांगों को स्वीकार किया गया।
लेकिन पत्रकारों का मूल सवाल था—
आखिर उन मांगों में से कितनी पूरी हुईं? मरीजों को क्या वास्तविक लाभ मिला? और आयुष्मान कार्डधारियों के उपचार से संबंधित शेष समस्याओं का समाधान कब तक होगा?
जवाब में विधायक ने अपने पक्ष के साथ कांग्रेस सरकार पर भी आरोप लगाए। इससे सवाल का सीधा प्रशासनिक और वर्तमान व्यवस्था से जुड़ा हिस्सा फिर पीछे चला गया।
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प्रेस वार्ता के 5 सबसे बड़े सवाल
1. स्वास्थ्य विभाग में कथित भ्रष्टाचार पर कार्रवाई कब?
यदि स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार अथवा अनियमितता की शिकायतें मिलती हैं तो मंत्री के स्तर से जांच और कार्रवाई की स्पष्ट व्यवस्था क्या है?
2. CIMS की खरीदी में पारदर्शिता की गारंटी कौन देगा?
CIMS के लिए करोड़ों रुपये के उपकरण और अन्य सामग्री खरीदी जा रही है। क्या प्रत्येक खरीदी की प्रक्रिया, तकनीकी मूल्यांकन और अंतिम चयन की स्वतंत्र समीक्षा होगी?
3. GeM पर किसी कंपनी को फायदा पहुंचाने की शिकायत आए तो जांच कौन करेगा?
यदि पत्रकार या आम नागरिक किसी विशेष कंपनी को अनुचित लाभ दिए जाने की शिकायत करता है तो क्या विभाग स्वतंत्र जांच कराएगा या उसी विभागीय तंत्र से जांच होगी जिस पर सवाल उठे हैं?
4. जिला अस्पतालों की व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी?
यदि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बुनियादी सुविधाओं, दवाइयों, जांच या उपचार को लेकर परेशानी है तो मंत्री किस अधिकारी की जवाबदेही तय करेंगे और कार्रवाई की समयसीमा क्या होगी?
5. प्रधानमंत्री के ‘सुशासन’ का मॉडल स्वास्थ्य विभाग में कब दिखेगा?
जब प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री के सुशासन और विकास मॉडल की बात हो रही है, तो क्या मंत्री अपने विभाग की शिकायतों पर समयबद्ध जांच, दोषियों पर कार्रवाई और सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करने का संकल्प लेंगे?
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सवालों से असहज हुआ माहौल, जवाब के बजाय विषय सीमित करने की सलाह
पत्रकारों के लगातार सवालों के बीच प्रेस वार्ता का माहौल उस समय बदल गया जब मंत्री की ओर से पत्रकारों को कहा गया कि जिस विषय को लेकर प्रेस वार्ता आयोजित की गई है, सवाल उसी विषय तक सीमित रखे जाएं।
यही बात पत्रकारों के बीच चर्चा का विषय बन गई।
पत्रकारों का तर्क था कि यदि प्रेस वार्ता में सरकार की उपलब्धियों का दावा किया जा रहा है तो उसी सरकार के कामकाज से जुड़े सवालों का जवाब देना भी प्रेस वार्ता का स्वाभाविक हिस्सा है।
खासकर तब, जब सवाल किसी निजी मामले के नहीं बल्कि सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, मरीजों और सरकारी धन से होने वाली खरीदी से जुड़े हों।
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‘खाना खाइए, सवाल मत करिए’—एक टिप्पणी और बढ़ी नाराजगी
प्रेस वार्ता के अंतिम दौर में सवाल-जवाब को लेकर माहौल और गरमा गया। इसी दौरान मंत्री की ओर से पत्रकारों को “खाना खाइए, सवाल मत करिए” कहे जाने की टिप्पणी चर्चा में आ गई।
पत्रकारों के बीच इसे लेकर नाराजगी देखी गई।
सवाल यह है कि प्रेस वार्ता में पत्रकारों की भूमिका केवल सरकार की उपलब्धियां सुनने तक सीमित है या फिर जनता के पैसे, जनता के अस्पताल और जनता की स्वास्थ्य सुविधाओं पर सरकार से सवाल पूछना भी पत्रकारिता का अधिकार है?
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निष्कर्ष | प्रेस वार्ता का एजेंडा कुछ और था, चर्चा कुछ और बन गई
श्याम बिहारी जायसवाल की प्रेस वार्ता का मूल उद्देश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के सेवा कार्य और विकास उपलब्धियों को सामने रखना था। लेकिन बिलासपुर में पत्रकारों ने स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था, CIMS, जिला अस्पताल और सरकारी खरीदी से जुड़े सवाल उठाकर प्रेस वार्ता को सीधे जवाबदेही के मंच में बदल दिया।
दिलचस्प बात यह है कि स्वास्थ्य मंत्री स्वयं कुछ दिन पहले CIMS का औचक निरीक्षण कर चुके हैं और मरीजों से सुविधाओं का फीडबैक भी लिया था।
ऐसे में पत्रकारों का सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है—
अगर मंत्री खुद अस्पताल की व्यवस्था देखने पहुंच सकते हैं, तो उसी अस्पताल की व्यवस्था और खरीदी पर पत्रकार सवाल क्यों नहीं पूछ सकते?
बिलासपुर की इस प्रेस वार्ता के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रह गया है कि विकास के दावों के साथ क्या स्वास्थ्य विभाग की कमियों पर भी उतनी ही खुलकर जवाबदेही स्वीकार की जाएगी?
