– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
विद्यालयीन जीवन की स्मृतियां भी बड़ी अजीब होती हैं। समय बीत जाता है, हम स्कूल की चौखट से निकलकर कॉलेज, नौकरी और जीवन की दूसरी व्यस्तताओं में चले जाते हैं, लेकिन बचपन और किशोरावस्था की कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो स्मृतियों की किताब में हमेशा ताजा बनी रहती हैं। वर्षों बाद भी जब उन पन्नों को पलटता हूं तो लगता है जैसे कल की ही बात हो।
मेरे स्कूल जीवन की ऐसी ही एक अविस्मरणीय स्मृति है -‘मास्टर जी’ बनने की। उस समय हम कक्षा ग्यारहवीं के विद्यार्थी थे। हमारे लिए यह वर्ष इसलिए भी विशेष था क्योंकि इसके बाद हम स्कूल की सीमा से निकलकर कॉलेज की दुनिया में प्रवेश करने वाले थे। स्वाभाविक रूप से मन में उत्साह भी था और आने वाले जीवन को लेकर एक अनजानी-सी उत्सुकता भी।
इन्हीं दिनों स्कूल के वार्षिकोत्सव की घोषणा हुई। जैसे ही कक्षा में हमारे क्लास टीचर सचदेव सर ने बताया कि लगभग एक महीने बाद वार्षिक समारोह होने वाला है और सभी विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना है, पूरी कक्षा में जैसे उत्साह की लहर दौड़ गई।
कोई कविता में भाग लेना चाहता था, कोई गीत में, कोई नृत्य में तो कोई नाटक में। हमारी कक्षा के छात्र पढ़ाई के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भी खूब रुचि लेते थे। मैं भी अपने मित्रों किशोर राय, जनक यादव, संतोष तंबोली और अन्य साथियों के साथ इस आयोजन की तैयारियों में जुट गया।
हम सभी लाल बहादुर शास्त्री स्कूल, बिलासपुर के विद्यार्थी थे। स्कूल शहर के मध्य गोल बाजार से लगे प्रमुख विद्यालयों में गिना जाता था। उन दिनों शहर में नया-नया बना पंडित देवकीनंदन दीक्षित सभा भवन भी सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों का प्रमुख केंद्र बन चुका था। इतने बड़े और प्रतिष्ठित सभागार में हमें प्रस्तुति देने का अवसर मिलेगा, यह कल्पना ही हमारे लिए रोमांच से भर देने वाली थी। एक दिन सचदेव सर ने कक्षा में कहा “अब वार्षिकोत्सव में ज्यादा समय नहीं रह गया है। जो विद्यार्थी किसी भी विधा में भाग लेना चाहते हैं, वे अपना नाम और अपनी विधा लिखकर दे दें।”
मैंने सबसे पहले जाकर अपना नाम लिखवाया और कहा “सर, मैं नाटक में भाग लेना चाहता हूं।” मेरे साथ संतोष तंबोली और कुछ अन्य मित्रों ने भी नाटक के लिए अपना नाम दिया। तभी सचदेव सर ने हमें एक और ऐसी सूचना दी, जिसने हमारी खुशी को कई गुना बढ़ा दिया। उन्होंने बताया कि इस बार वार्षिकोत्सव में हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता ए. के. हंगल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने वाले हैं।
हम सब खुशी से उछल पड़े। ए. के. हंगल साहब को हमने फिल्मों में देखा था और विशेषकर शोले में उनका वह चर्चित संवाद “इतना सन्नाटा क्यों है भाई ?” हम दोस्तों के बीच अक्सर मजाक में दोहराया करते थे। अब उन्हीं हंगल साहब के सामने हमें अपनी प्रस्तुति देनी थी। हमारे लिए इससे बड़ा आकर्षण और क्या हो सकता था!
सर ने यह भी बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता शहर के तत्कालीन महापौर बलराम सिंह ठाकुर करेंगे। अब तो हमारी तैयारी में एक अलग ही जोश आ गया। कुछ दिनों बाद सचदेव सर हमें लगभग पच्चीस विद्यार्थियों के साथ प्राचार्य कक्ष में ले गए। इनमें करीब पंद्रह विद्यार्थी नाटक के लिए तैयार थे। हम सभी उत्सुकता से इधर-उधर देख रहे थे।प्राचार्य कक्ष में एक भद्र पुरुष बैठे थे। थोड़ी देर बाद पता चला कि वे शहर के जाने-माने रंगकर्मी स्वर्गीय सुनील मुखर्जी हैं। वही हमारे नाटक के कलाकारों का चयन करने वाले थे और अगले पंद्रह दिनों तक हमें अभिनय का प्रशिक्षण भी देने वाले थे।
हमारे लिए यह किसी सौभाग्य से कम नहीं था। प्राचार्य महोदय ने हम सभी विद्यार्थियों को एक कतार में खड़ा कर दिया और मुखर्जी जी से कहा “आप इन्हीं विद्यार्थियों में से नाटक के पात्रों का चयन कर लीजिए।” हम सभी चुपचाप एक कतार में खड़े हो गए। मुखर्जी जी एक-एक विद्यार्थी को बड़े ध्यान से देख रहे थे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी और आंखें जैसे प्रत्येक विद्यार्थी के भीतर छिपे कलाकार को तलाश रही थीं।
कुछ मिनट तक सभी को देखने के बाद अचानक उनकी नजर मुझ पर ठहर गई।उन्होंने उंगली के इशारे से मुझे कतार से अलग होकर एक तरफ खड़े होने को कहा। मैं थोड़ा घबरा गया। मन में कई तरह के सवाल उठने लगे “मुझे अलग क्यों किया गया? क्या मैं नाटक के योग्य नहीं हूं? क्या मेरे व्यक्तित्व में कोई कमी दिखाई दे रही है?” मैं चुपचाप एक किनारे खड़ा हो गया।
इसके बाद उन्होंने कुछ और विद्यार्थियों को भी अलग किया और उन्हें मेरे पास खड़े होने का संकेत दिया। बाकी विद्यार्थियों से उन्होंने कहा कि वे अपनी-अपनी कक्षाओं में लौट जाएं। फिर उन्होंने प्राचार्य महोदय से कहा “मैंने नाटक के पात्रों का चयन कर लिया है। अब इन्हीं विद्यार्थियों को पंद्रह दिनों तक रिहर्सल कराऊंगा।” मेरी उत्सुकता अब चरम पर थी। आखिर मुझे अलग क्यों किया गया था? तभी प्राचार्य महोदय ने मुझे बुलाकर बताया “सुनील मुखर्जी जी ने तुम्हें अपने नाटक ‘मास्टर जी’ के मुख्य पात्र ‘मास्टर जी’ के लिए चुना है।”
मैं कुछ क्षण के लिए जैसे स्तब्ध रह गया। अभी तक जो डर और उधेड़बुन मन में चल रही थी, वह एक ही क्षण में खुशी और आत्मविश्वास में बदल गई। मैंने मन ही मन सोचा- “मैं तो साधारण-सा, दुबला-पतला और लंबा विद्यार्थी हूं। आखिर मुखर्जी जी ने मुझमें ऐसा क्या देख लिया कि मुझे मुख्य भूमिका के लिए चुन लिया?” उस प्रश्न का उत्तर मुझे कभी पूरी तरह नहीं मिला, लेकिन शायद एक कलाकार को पहचानने वाली नजर वही होती है, जो व्यक्ति के बाहरी व्यक्तित्व से आगे उसके भीतर छिपे पात्र को देख लेती है।
अगले दिन से हमारी अभिनय प्रशिक्षण की शुरुआत हो गई।लगातार पंद्रह दिनों तक सुनील मुखर्जी जी हमें अभिनय की बारीकियां सिखाते रहे। संवाद कैसे बोलना है, आवाज में उतार-चढ़ाव कैसे लाना है, मंच पर किस तरह खड़ा होना है, चेहरे के भाव कैसे बदलने हैं, संवाद के साथ शरीर की भाषा कैसी होनी चाहिए, इन सबका हमें गहन अभ्यास कराया गया।
उन पंद्रह दिनों में हमने अभिनय के साथ-साथ अनुशासन भी सीखा। मुखर्जी जी केवल संवाद रटवाने वाले निर्देशक नहीं थे। वे हमें यह समझाते थे कि मंच पर केवल शब्द नहीं बोले जाते, बल्कि पात्र को जिया जाता है। धीरे-धीरे नाटक के संवाद हमारी जुबान पर ऐसे चढ़ गए कि हमें उन्हें याद करने के लिए किसी किताब की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।
मेरे पात्र का एक संवाद अंग्रेजी में था – “God helps those who help themselves.” अर्थात – जो अपनी मदद स्वयं करते हैं, भगवान भी उनकी मदद करता है। नाटक के मंचन के बाद यह संवाद इतना चर्चित हुआ कि लंबे समय तक मित्रों के बीच मैं इसे मजाक-मजाक में दोहराता रहा। आज भी वह संवाद स्मृति में उसी तरह सुरक्षित है। देखते ही देखते पंद्रह दिन बीत गए और वार्षिकोत्सव का दिन आ गया।
उस दिन स्कूल और सभा भवन का वातावरण ही अलग था। हम सभी अपने-अपने परिधानों और मेकअप में प्रस्तुति की तैयारी कर रहे थे। बाहर कार्यक्रम शुरू हो चुका था। कहीं गीत हो रहा था, कहीं भजन, कहीं नृत्य और कहीं अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियां। सभागार धीरे-धीरे दर्शकों से भर चुका था। मेरे परिवार और मोहल्ले के अनेक लोग भी विशेष रूप से मेरा अभिनय देखने और मेरा उत्साह बढ़ाने पहुंचे थे। मेरे लिए यह भावुक कर देने वाला क्षण था। और फिर मेरी नजर मंच के सामने बैठे एक विशिष्ट अतिथि पर पड़ी।
ए. के. हंगल साहब! जिन्हें हम फिल्मों में देखते थे, जिनके संवाद हम दोस्तों के बीच दोहराते थे, वे आज हमारे सामने बैठे थे। मेयर बलराम सिंह ठाकुर, प्राचार्य महोदय, शिक्षकगण और शहर के अनेक गणमान्य लोग भी उपस्थित थे। अब उत्साह के साथ-साथ जिम्मेदारी का अहसास भी होने लगा। हमारे नाटक की बारी आ गई।एक-एक करके सभी पात्र मंच पर आने लगे। पर्दे के पीछे हम अपनी-अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब मेरी बारी आई और मुझे ‘मास्टर जी’ बनकर मंच पर जाना था, तो स्वाभाविक रूप से मन में हल्की घबराहट थी।
मैं मंच पर पहुंचा। पहला संवाद बोलते समय मेरी आवाज थोड़ी धीमी निकल गई। शायद पहली बार इतने बड़े मंच और इतने सारे दर्शकों के सामने अभिनय करने का दबाव था। तभी पर्दे के पीछे से आवाज आई – “तेज बोलो… तेज!” मैं तुरंत सजग हुआ। मन में आया- “यह मौका फिर नहीं मिलेगा। मुझे अपना पूरा सामर्थ्य दिखाना है।” और फिर मैंने अपनी आवाज को मजबूत किया, चेहरे के भाव बदले और पूरी तरह अपने पात्र में उतर गया। उसके बाद मुझे ऐसा लगा जैसे मैं सुरेश नहीं रहा। मैं सचमुच ‘मास्टर जी’ बन गया था। संवाद पर संवाद आगे बढ़ता गया। अभिनय में आत्मविश्वास आता गया।
कुछ ही देर में वह घबराहट पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी।नाटक समाप्त हुआ। पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। उस क्षण की खुशी आज भी मेरे भीतर वैसी ही है। मंच से उतरते समय ऐसा लग रहा था जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो।कार्यक्रम के बाद हमें सम्मानित किया गया। प्राचार्य महोदय ने हमारी प्रशंसा की और सुनील मुखर्जी जी ने भी हमारे अभिनय की सराहना की। मेरे लिए वह केवल पुरस्कार या प्रशंसा का क्षण नहीं था। वह मेरे भीतर छिपे आत्मविश्वास को पहचानने का क्षण था। और शायद उसी दिन पहली बार मुझे यह महसूस हुआ कि किसी व्यक्ति को अवसर मिल जाए तो उसके भीतर छिपी प्रतिभा भी अपना रास्ता खोज लेती है।
स्कूल के बाद हम कॉलेज में पहुंच गए, लेकिन रंगमंच से मेरा रिश्ता वहीं समाप्त नहीं हुआ। सुनील मुखर्जी जी की रंगकर्म संस्था ‘नाट्य चक्र’ से भी मेरा जुड़ाव बना रहा। उन्होंने मुझे और मेरे मित्र संतोष तंबोली को वहां भी अभिनय के अवसर दिए। हम कई कार्यक्रमों में उनके साथ गए और अलग-अलग स्थानों पर नाटकों में अभिनय किया। इस तरह स्कूल में ‘मास्टर जी’ की भूमिका से शुरू हुई मेरी रंगमंचीय यात्रा आगे भी चलती रही। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो उस घटना में मुझे केवल एक नाटक नहीं दिखाई देता।मुझे दिखाई देता है ,एक स्कूल, दोस्तों की वह टोली, सचदेव सर का प्रोत्साहन, प्राचार्य कक्ष में लगी वह कतार, सुनील मुखर्जी जी की पारखी नजर, पंद्रह दिनों की कठिन रिहर्सल, मंच के पीछे की घबराहट, पर्दे के पीछे से आती आवाज -“तेज बोलो… तेज!”, सामने बैठे ए. के. हंगल साहब और तालियों से गूंजता हुआ वह सभागार।
और सबसे ज्यादा याद आता है वह क्षण, जब एक दुबला-पतला-सा स्कूली लड़का पहली बार मंच पर खड़ा होकर अपने भीतर के आत्मविश्वास से परिचित हुआ था। शायद इसलिए जीवन में कुछ मंच कभी खत्म नहीं होते।उनके पर्दे गिर जाते हैं, दर्शक चले जाते हैं, तालियां थम जाती हैं, पात्र अपने-अपने घर लौट जाते हैं..लेकिन कुछ भूमिकाएं जीवन भर हमारे भीतर जीवित रहती हैं। मेरे जीवन में ‘मास्टर जी’ भी ऐसी ही एक भूमिका है। वह सिर्फ एक नाटक का पात्र नहीं था। वह मेरे जीवन के मंच पर आत्मविश्वास का पहला संवाद था।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
– वरिष्ठ पत्रकार/ लेखक/ अधिवक्ता बिलासपुर, छत्तीसगढ़
