राजभाषा के अधिकार से आठवीं अनुसूची तक की अधूरी यात्रा
– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं, खनिज संपदा, जंगल, नदियों और लोकसंस्कृति से नहीं है। इस प्रदेश की आत्मा उसकी लोकभाषा छत्तीसगढ़ी में बसती है। गांव की चौपाल से लेकर खेत-खलिहान तक, लोकगीतों से लेकर लोकगाथाओं तक, पारंपरिक संस्कारों से लेकर रोजमर्रा के व्यवहार तक छत्तीसगढ़ी ने सदियों से यहां के समाज को जोड़ने का काम किया है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस भाषा को राज्य गठन के बाद स्वयं छत्तीसगढ़ विधानसभा ने राजकीय प्रयोजनों के लिए मान्यता दी, वही भाषा आज भी शासन-प्रशासन के वास्तविक कामकाज में अपने अधिकार के अनुरूप स्थान पाने के लिए संघर्ष कर रही है।
यहां एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिलने में अब कोई कानूनी विलंब नहीं है। 28 नवंबर 2007 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने छत्तीसगढ़ राजभाषा (संशोधन) विधेयक सर्वसम्मति से पारित किया था और 11 जुलाई 2008 को इसके अधिनियम के रूप में राजपत्र में प्रकाशन के साथ हिन्दी के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी को राज्य के राजकीय प्रयोजनों में प्रयुक्त भाषा के रूप में शामिल किया गया। अर्थात समस्या मान्यता की शुरुआत की नहीं, बल्कि मान्यता के प्रभावी क्रियान्वयन की है।
कानून बना, आयोग बना, लेकिन व्यवहार में कितना उतरा? छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा देने के बाद 2010 में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के लिए कानून भी बनाया गया। आयोग का उद्देश्य केवल भाषा का संरक्षण नहीं, बल्कि भाषायी अध्ययन, शोध, दस्तावेजीकरण, सृजन, अनुवाद, प्रकाशन तथा शासन में छत्तीसगढ़ी के प्रयोग को बढ़ावा देना भी था।
28 नवंबर को प्रतिवर्ष छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस मनाया जाता है। सरकारी स्तर पर कार्यक्रम होते हैं, भाषण होते हैं, साहित्यकारों और भाषाविदों की चर्चाएं होती हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था उसी अनुपात में छत्तीसगढ़ी को अपने दैनिक कामकाज में स्थान दे रही है?यदि किसी नागरिक को अपने ही प्रदेश के सरकारी कार्यालय में अपनी लोकभाषा में संवाद करने में संकोच महसूस हो, यदि कार्यालयीन पत्राचार, सूचना, जनजागरूकता सामग्री और प्रशासनिक संवाद मुख्यतः दूसरी भाषाई संरचना में ही चलते रहें, तो राजभाषा का दर्जा केवल राजपत्र की पंक्तियों में सीमित होकर रह जाने का खतरा पैदा करता है।
आठवीं अनुसूची – अब असली संवैधानिक लड़ाई है!छत्तीसगढ़ी आज भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में नहीं है। भारत सरकार के राजभाषा विभाग की वर्तमान सूची में असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं; छत्तीसगढ़ी इस सूची में नहीं है।
यहीं से छत्तीसगढ़ी के संघर्ष का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण चरण शुरू होता है। छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग नई नहीं है। संसद में समय-समय पर इस मुद्दे को उठाया गया है। 2017 में राज्यसभा में भी छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठी थी। 2021 में लोकसभा में भी छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग दर्ज हुई। और महत्वपूर्ण बात यह है कि 8 दिसंबर 2023 को राज्यसभा में संविधान संशोधन विधेयक भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें आठवीं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी को जोड़ने का प्रस्ताव था। इससे स्पष्ट है कि मांग केवल साहित्यिक मंचों की आवाज नहीं है; यह संसदीय विमर्श का हिस्सा भी बन चुकी है।
यहां भावनाओं के साथ-साथ तथ्य समझना आवश्यक है। संविधान में आठवीं अनुसूची में किसी भाषा को शामिल करने के लिए कोई स्पष्ट, निश्चित और बाध्यकारी संवैधानिक समय-सीमा निर्धारित नहीं है। केंद्र सरकार ने पहले भी संसद में कहा है कि आठवीं अनुसूची में नई भाषाओं को शामिल करने के लिए संविधान में कोई निर्धारित मानदंड या समय-सीमा नहीं है और अनेक भाषाएं इस मांग की सूची में हैं। छत्तीसगढ़ी भी लंबे समय से उस सूची में रही है। इसलिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि “दिल्ली छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा कर रही है।” वास्तविक स्थिति अधिक जटिल है। राज्य सरकार, जनप्रतिनिधियों, साहित्यकारों, भाषाविदों, शिक्षाविदोंश्र और समाज – सभी को मिलकर एक ठोस, प्रमाण-आधारित और निरंतर संवैधानिक अभियान चलाना होगा।
भाषा का सम्मान केवल सरकारी अधिसूचना से नहीं मिलता।वह समाज की निरंतर चेतना से मजबूत होता है। जिन प्रदेशों की भाषाओं ने शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता, सिनेमा, प्रशासन, डिजिटल माध्यम और सार्वजनिक जीवन में मजबूत उपस्थिति बनाई है, वहां सरकार के साथ समाज, साहित्यकार, शिक्षाविद, मीडिया और नागरिक संगठनों की भी सक्रिय भूमिका रही है। छत्तीसगढ़ में भी आवश्यकता इस बात की है कि भाषा का प्रश्न केवल राजभाषा दिवस के एक दिन के आयोजन तक सीमित न रहे। वर्ष भर भाषा के लिए संस्थागत और सामाजिक अभियान चले।
आज स्थिति यह होनी चाहिए कि- सरकारी कार्यालयों में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग बढ़े। स्कूलों में व्यवस्थित भाषा-शिक्षण की मजबूत व्यवस्था बने। विश्वविद्यालयों में छत्तीसगढ़ी पर शोध को प्रोत्साहन मिले। प्रतियोगी परीक्षाओं में इसके उपयोग की संभावनाओं पर गंभीर नीति बने। न्याय और प्रशासनिक जनसंवाद में स्थानीय भाषा का उपयोग बढ़े।डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप, एआई और तकनीकी शब्दावली में छत्तीसगढ़ी विकसित हो। और सबसे बढ़कर ; छत्तीसगढ़ी को बोलने में किसी नागरिक को हीनभावना न हो।
यह आरोप लगाना कि बाहर से आने वाला प्रत्येक प्रशासनिक अधिकारी छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा करता है, तथ्यपरक दृष्टि से उचित नहीं होगा। प्रशासनिक अधिकारी देश के विभिन्न हिस्सों से आते हैं और उन्हें सरकारी कामकाज के निर्धारित नियमों के अनुसार कार्य करना पड़ता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि स्थानीय भाषा से अपरिचित प्रशासन और जनता के बीच दूरी बढ़ सकती है। इसलिए आवश्यकता अधिकारियों को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था बनाने की है जिसमें अधिकारी छत्तीसगढ़ी सीखने और उसके प्रयोग के लिए प्रोत्साहित हों। प्रशासन यदि जनता की भाषा में जनता से संवाद करेगा तो शासन अधिक सहभागी और जनसुलभ बनेगा। राजभाषा का अर्थ किसी दूसरी भाषा का विरोध करना नहीं है। हिन्दी का अपना राष्ट्रीय महत्व है और अंग्रेजी का अपना वैश्विक उपयोग। इसी तरह छत्तीसगढ़ी का अपना स्थानीय सांस्कृतिक, सामाजिक और प्रशासनिक महत्व है। भाषाओं के बीच संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व की नीति ही लोकतांत्रिक भारत की वास्तविक शक्ति है।
यह भी समझना जरूरी है कि आठवीं अनुसूची में शामिल होना अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक पहचान है, लेकिन किसी भाषा के जीवित और शक्तिशाली बने रहने की एकमात्र शर्त नहीं। भाषा तब मजबूत होती है जब बच्चे उसे पढ़ते हैं, युवा उसमें लिखते हैं, पत्रकारिता उसमें होती है, साहित्य प्रकाशित होता है, फिल्में बनती हैं, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली विकसित होती है, डिजिटल सामग्री तैयार होती है और शासन उससे जनता से संवाद करता है।आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई भाषाओं के भविष्य को बदल रही है, तब छत्तीसगढ़ी के लिए यह चुनौती भी है और अवसर भी। यदि छत्तीसगढ़ी का बड़ा डिजिटल कॉर्पस, मानकीकृत शब्दकोश, व्याकरण, ऑडियो संग्रह, लोककथाओं का डिजिटलीकरण, भाषाई डेटाबेस और उच्च गुणवत्ता की डिजिटल सामग्री तैयार नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ी के तकनीकी संसार में इसकी उपस्थिति कमजोर हो सकती है।
आज छत्तीसगढ़ की सरकार और जनप्रतिनिधियों से पांच प्रश्न पूछे जाने चाहिए – पहला- 2007 के राजभाषा कानून के बाद अब तक शासन के कितने विभागों में छत्तीसगढ़ी का वास्तविक कार्यालयीन उपयोग हुआ? दूसरा – क्या प्रत्येक विभाग के लिए छत्तीसगढ़ी के उपयोग का कोई स्पष्ट वार्षिक लक्ष्य और मूल्यांकन व्यवस्था है? तीसरा – क्या स्कूल और उच्च शिक्षा में छत्तीसगढ़ी के अध्ययन-अध्यापन और शोध के लिए पर्याप्त संस्थागत व्यवस्था है? चौथा – क्या छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए राज्य सरकार ने अद्यतन भाषावैज्ञानिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक और जनसांख्यिकीय दस्तावेजों के साथ केंद्र के समक्ष एक व्यापक प्रस्ताव तैयार किया है? पांचवां – क्या प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों को छत्तीसगढ़ी के व्यावहारिक ज्ञान के लिए नियमित प्रशिक्षण दिया जा रहा है? इन प्रश्नों के उत्तर नारों से नहीं, आंकड़ों और सरकारी कार्यवाही से मिलने चाहिए।
सितंबर 2026 में छत्तीसगढ़ी के भाषाविदों ने राज्यपाल रमेन डेका से मुलाकात कर आठवीं अनुसूची में भाषा को शामिल कराने तथा उसके संरक्षण और विकास पर चर्चा की। इस पहल में भाषा के इतिहास, साहित्य, व्याकरण, शब्दकोश और मानकीकरण जैसे विषयों पर व्यवस्थित कार्य की आवश्यकता सामने आई। यह संकेत महत्वपूर्ण है। अब आंदोलन को केवल भावनात्मक आग्रह से आगे बढ़ाकर दस्तावेज, शोध, भाषा-विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन और जनभागीदारी के व्यापक अभियान में बदलने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ी को सम्मान देने का अर्थ किसी दूसरी भाषा को छोटा करना नहीं है। यह अपनी मिट्टी की आवाज को उसका उचित स्थान देना है।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं, बल्कि भाषा के पक्ष में खड़े होने की है। सरकारें आती- जाती रहेंगी। अधिकारी बदलते रहेंगे। राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रहेंगी। लेकिन भाषा पीढ़ियों को जोड़ती है। यदि आज हमने अपनी भाषा के संरक्षण, संवर्धन और संस्थागत विस्तार के लिए ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि जब उनकी मातृभाषा अपने अधिकार के लिए आवाज उठा रही थी, तब उसके अपने लोगों ने क्या किया? छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का कानूनी दर्जा मिल चुका है..अब उसे राजकाज की वास्तविक भाषा बनाने की इच्छाशक्ति चाहिए। और आठवीं अनुसूची में उसका स्थान केवल सम्मान का प्रश्न नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालीन संवैधानिक संरक्षण और राष्ट्रीय पहचान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। अब समय केवल छत्तीसगढ़ी बोलने का नहीं, छत्तीसगढ़ी के अधिकार के लिए संगठित होकर काम करने का है।क्योंकि….!
भाखा सिरिफ बोलई के साधन नइ,
ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलत पहचान आय।
जेन माटी अपन बोली ल बचा लेथे,
ओही माटी अपन संस्कृति ल बचा पाथे।।
– सुरेश सिंह बैस शाश्वत
– वरिष्ठ पत्रकार/ लेखक /अधिवक्ता
– बिलासपुर,छत्तीसगढ़
