दस वर्ष का बालक वैभव, उसके दादा-दादी और माता-पिता सभी आज सड़क किनारे बस का इंतज़ार कर रहे हैं। वैभव के चेहरे पर उत्साह छलक रहा है, क्योंकि छुट्टियों में वह अपने पूरे परिवार के साथ गाँव जा रहा है।
कुछ दिन पहले की बात है। वैभव दादी के कमरे में सोने जा रहा था। कमरे के बाहर से ही उसे दादा-दादी की धीमी बातचीत सुनाई दी। दादी कह रहीं थीं, “कितने दिन हो गए… मुझे अपने गाँव जाने की बहुत इच्छा हो रही है। वहाँ की मिट्टी की खुशबू, अपना पुराना आँगन… सब याद आता है।” दादा ने आह भरते हुए कहा, “मुझे भी, पर इस बार तो छुट्टियों में दिल्ली जाने का तय हुआ है। वैभव को दिल्ली देखने की बड़ी इच्छा है।”
यह सुनते ही वैभव दौड़कर भीतर गया और दादी से लिपट गया। उसने देखा—दादी की आँखें भीगी हुई थीं, पर उसे देखकर वे मुस्कुरा दीं। उस रात वैभव को देर तक नींद नहीं आई। दादी की इच्छा उसके मन में गूँजती रही।
अगली सुबह तक वैभव कुछ निश्चय कर चुका था। वह पिता और माँ के पास गया और बोला, “पिताजी, इस बार मैं दिल्ली घूमने नहीं जाना चाहता। हम गाँव चलें।”
पिता आश्चर्य से पूछने लगे, “क्यों? दिल्ली क्यों नहीं? और गाँव क्यों?”
वैभव ने धीमे मगर दृढ़ स्वर में कहा— “पिताजी, हम हर साल कहीं न कहीं बाहर जाते हैं, पर कभी गाँव नहीं जाते। दादा-दादी हमेशा हमारी खुशी में खुश हो जाते हैं, लेकिन उनकी असली खुशी तो उनके अपने गाँव में है। मैं चाहता हूँ कि इस बार हम उन्हें गाँव ले चलें… ताकि उनके मन की इच्छा पूरी हो सके।”
पिता हल्के से मुस्कुराए। “ठीक है बेटा, गाँव चलेंगे। लेकिन वहाँ तुम्हें बहुत-सी सुविधाएँ नहीं मिलेंगी। फिर भी चलोगे?”
वैभव बोला, “हाँ पिताजी। जब दादा-दादी हमारी खुशियों में खुश रह सकते हैं… तो मैं उनके लिए थोड़ी-सी असुविधा क्यों नहीं सह सकता?”
आँगन में काम करती दादी यह सब सुन रही थीं। वैभव के बाहर आते ही वे उसे बाँहों में भरकर रोने लगीं। वैभव ने उनके गालों से आँसू पोंछे और बोला, “रोइए मत दादी… हम कल ही गाँव चलेंगे। वादा है मेरा।”
दादी ने वैभव को सीने से लगाकर आँखें बंद कर लीं—जैसे वर्षों की कोई अधूरी चाह आज पूरी होने वाली हो।
लेखिका – शिवानी भगत