पर्यावरण / प्रकृति
किरीट ठक्कर। विशेष आलेख
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद साल के वृक्ष को राजकीय वृक्ष का दर्जा दिया गया है,किन्तु साल वनों का क्षेत्रफल लगातार घटता जा रहा है,जो पर्यावरण प्रेमियों साथ ही छत्तीसगढ़ के स्थानीय वनवासी ग्रामीणों के लिये चिंता का विषय है।
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के जंगलों में सरई/साल वृक्षों की बहुलता रही है, इसी वजह से इसे कभी साल का दीप कहा जाता था। किन्तु अब धीरे-धीरे यहां साल वनों का दायरा घटता जा रहा है।
ये वृक्ष भारत के सबसे महत्वपूर्ण वनों में पाये जाने वाला बहुमूल्य वृक्ष है। मध्य भारत में इसे सरई भी कहा जाता है। जिस क्षेत्र में साल के वृक्षों की बाहुल्यता होती है वहां का तापमान नियंत्रित रहता है। यह घने जंगलों का निर्माण करता है और पर्यावरण, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति – तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
साल के वृक्षों की ऊंचाई लगभग 30 से 35 मीटर तक हो सकती है,जबकि इनकी उम्र 100 से 150 वर्ष या उससे भी अधिक हो सकती है। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत, भारी व दीमक रोधी होती है।
साल वृक्षों का पर्यावरणीय महत्व-
साल के वृक्ष वायु शुद्ध करने और कार्बन अवशोषण में सहायक होते हैं। इनमें मिट्टी कटाव रोकने की क्षमता होती है। साल के जंगलों में अनेक वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास होता है। ये वर्षा चक्र संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आर्थिक महत्व –
साल वृक्षों की आर्थिक महत्ता अपने आप में परिपूर्ण है। इनकी मजबूत लकड़ीयों से मकान, दरवाजे, खिड़कियां, फर्नीचर, रेलवे स्लीपर, आदि बनाये जाते हैं। पत्तों से दोना-पत्तल और जैविक प्लेटें बनती है। ईन वृक्षों के तने से निकलने वाली गोंद/रेजिन औषधि व उद्योग में उपयोगी होती है। बीजों का भी उपयोग व बाजार मूल्य है। जून-जुलाई माह में साल वृक्षों के नीचे जमीन से निकलने वाली उखमज (बोड़ा /मशरूम) का छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों में बहुतायत खाद्य उपयोग है।
कुल मिलाकर साल के वृक्ष ग्रामीण आजीविका का प्रमुख साधन है, ग्राम्य जीवन में इनका सांस्कृतिक व सामाजिक महत्व है। कई आदिवासी समुदायों में साल/सरई के पत्ते पूजा-पाठ में उपयोगी होते हैं साथ ही पारंपरिक त्योहारों और वैवाहिक अवसरों पर इसका उपयोग होता है। साल /सरई एक पेड़ नही.. बल्कि पूरे वन-परितंत्र की रीढ़ है।
इस सबके बावजूद साल के जंगलों का निरंतर कम होता दायरा,जिले के तापमान में लगातार वृद्धि कर रहा है। पिछले वर्ष मई माह में 44 डिग्री से ऊपर जा चुका तापमान,ये बताने के लिये काफी है,कि क्षेत्र में तेज गति से साल के वृक्षों की कटाई हो रही है।
विडंबना है कि कूप कटाई, वनों में अतिक्रमण व अवैध कटाई की वजह से साल के जंगल लगातार खत्म हो रहे हैं। साल नैसर्गिक रूप से उगने वाला पेड़ है, बीते दो दशक में साल के लाखों पेड़ काटे जा चुके है। इसके बदले में रोपण के प्रयास किये जा रहे है, किन्तु रोपण की सफलता दर कम है।
इधर अवैध कटाई, वोट की राजनीति और वन अधिकार पट्टे के लालच में साल के जंगलों/वृक्षों का सर्वनाश सर्वविदित है।