
**बाज़ार सजा था सिक्कों का,हर मोड़ पर एक ख़रीदार खड़ा था।झुक जाते तो दुनिया क़दमों में होती,पर हमारा सर अपनी ज़िद पर अड़ा था।हाँ, मौके मिले थे हर मोड़ पर,मखमली रास्तों के इशारे भी थे।जो बिक गए, वो महलों में सोए,जो भूखे रहे, वो बस सितारे ही थे।हमें भी दिखाई गई थीं वो जन्नतें,जहाँ ज़मीर गिरवी रखना पड़ता है।पर हम उस मिट्टी के बने हैं यार,जहाँ स्वाभिमान का सूरज कभी नहीं ढलता है।*तराशते रहे खुद को, पर बिके नहीं…*तिजोरियाँ छोटी पड़ गईं उनकी,जब उन्होंने हमारा मोल लगाना चाहा।वो नोटों की गड्डियाँ गिनते रहे,हमने अपनी खुद्दारी का परचम लहराया।हम फकीरी में भी शाहंशाह रहे,क्योंकि हमारे दामन पर कोई दाग नहीं।जो अपनी ही नज़रों में गिर जाए,उस बुझे हुए दीये में कोई आग नहीं।*अंतिम हुंकार*ज़माने से कह दो, अपनी औकात में रहे,हम वो फसल नहीं जो आंधियों में टूट जाए।सारे जहां की दौलत एक तरफ,और एक तरफ हमारी आँखों की चमक आ जाए।वक्त की गर्दिशों ने घेरा बहुत,पर हमने अपनी पहचान नहीं बेची।भूखे सो गए पगडंडियों पर,पर महलों की खातिर शान नहीं बेची…सुनो ओ दुनिया के ठेकेदारों!मौके तो हमें भी तमाम मिले,पर हमने कभी अपना ईमान नहीं बेचा!मुकेश कुमार (स्वतंत्र पत्रकार)…*
