(श्रीप्रकाश सिंह निमराजे)
अध्यक्ष
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था
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गोपाल किरण समाज सेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर द्वारा आयोजित
23 सितम्बर 2026 को “संकल्प दिवस” के रूप में मनाना केवल एक ऐतिहासिक घटना को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि सामाजिक समानता, शिक्षा, आत्मसम्मान, मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और भेदभाव-मुक्त समाज के निर्माण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को पुनः समझने का अवसर है। इस दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि गुजरात के तत्कालीन बड़ौदा राज्य और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के 1917 के अनुभवों से जुड़ी है। बड़ौदा की संकल्प भूमि को डॉ. आंबेडकर के अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध संकल्प से संबद्ध ऐतिहासिक स्थल के रूप में माना जाता है।
इस ऐतिहासिक प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि व्यक्तिगत रूप से झेला गया सामाजिक अपमान केवल व्यक्तिगत पीड़ा बनकर न रह जाए, बल्कि उसे व्यापक सामाजिक परिवर्तन, समानता और मानव गरिमा के संघर्ष में परिवर्तित किया जाए।
बड़ौदा की धरती और बाबासाहेब का ऐतिहासिक अनुभव
डॉ. भीमराव आंबेडकर की उच्च शिक्षा में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ का महत्वपूर्ण योगदान था। विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद डॉ. आंबेडकर बड़ौदा राज्य की सेवा के लिए भारत लौटे। उच्च शिक्षा, विद्वता और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बावजूद उन्हें अपनी जातिगत पहचान के कारण सामाजिक भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ा।
बड़ौदा में उन्हें रहने के लिए उपयुक्त स्थान प्राप्त करने में कठिनाई हुई। जिन परिस्थितियों का सामना उन्होंने किया, उन्होंने यह कठोर वास्तविकता सामने रखी कि शिक्षा और योग्यता प्राप्त करने के बाद भी जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था व्यक्ति की गरिमा और समान अवसरों को प्रभावित कर सकती है।
डॉ. आंबेडकर के बड़ौदा अनुभवों का उल्लेख उनके संस्मरण “Waiting for a Visa” में भी मिलता है। यह अनुभव उनके जीवन के आगे के सामाजिक संघर्ष को समझने के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करता है।
23 सितम्बर 1917 : पीड़ा से संकल्प तक
बड़ौदा के इसी ऐतिहासिक अनुभव से 23 सितम्बर 1917 को जुड़ा संकल्प दिवस सामाजिक समानता के संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। संकल्प भूमि का महत्व इस बात में है कि इसे बाबासाहेब के अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध संकल्प से जोड़ा जाता है।
यह प्रसंग केवल व्यक्तिगत अपमान की कहानी नहीं है। यह उस समय की सामाजिक व्यवस्था का भी प्रतिबिंब था, जिसमें किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान उसके साथ होने वाले व्यवहार को प्रभावित कर सकती थी।
बाबासाहेब ने अपने अनुभव को व्यक्तिगत प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रखा। आगे चलकर उनका पूरा सार्वजनिक जीवन शिक्षा, सामाजिक संगठन, नागरिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और अस्पृश्यता उन्मूलन जैसे व्यापक प्रश्नों से जुड़ता गया।
इसीलिए 23 सितम्बर को व्यक्तिगत पीड़ा को सामाजिक परिवर्तन के संकल्प में बदलने की ऐतिहासिक प्रेरणा के रूप में समझा जा सकता है।
शिक्षा : सामाजिक समानता की आधारभूत शर्त
बाबासाहेब के जीवन में शिक्षा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी। शिक्षा उनके लिए सामाजिक मुक्ति और आत्मसम्मान का महत्वपूर्ण माध्यम थी।
बड़ौदा की घटना यह महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखती है कि यदि किसी व्यक्ति को उच्च शिक्षा प्राप्त होने के बावजूद जन्मगत पहचान के कारण भेदभाव का सामना करना पड़े, तो केवल शिक्षा प्राप्त कर लेना सामाजिक समानता के लिए पर्याप्त कैसे हो सकता है?
आज भी सामाजिक समानता के प्रश्न को शिक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, ग्रामीण क्षेत्रों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य वंचित समुदायों के बच्चों और युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, छात्रवृत्ति, डिजिटल संसाधनों तक पहुँच, उच्च शिक्षा के अवसर और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण आवश्यक हैं।
शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान देती है, लेकिन समान सामाजिक वातावरण उसकी प्रतिभा को वास्तविक अवसर प्रदान करता है।
समानता : संवैधानिक अधिकार से सामाजिक व्यवहार तक
भारतीय संविधान समानता को केवल नैतिक आदर्श के रूप में नहीं देखता। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग और जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध प्रावधान करता है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की बात करता है। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त घोषित करता है।
इस दृष्टि से समानता का अर्थ केवल यह कहना नहीं है कि सभी नागरिक समान हैं। इसका वास्तविक अर्थ ऐसी सामाजिक परिस्थितियाँ बनाना है, जिनमें किसी व्यक्ति को जाति, लिंग, जन्म, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पहचान के कारण अवसरों और सम्मान से वंचित न होना पड़े।
संवैधानिक समानता तभी सामाजिक वास्तविकता बनेगी जब वह परिवार, विद्यालय, कार्यस्थल, प्रशासन, सार्वजनिक संस्थाओं और सामाजिक संबंधों में दिखाई दे।
डॉ. आंबेडकर का सामाजिक परिवर्तन का दृष्टिकोण
डॉ. आंबेडकर के चिंतन में सामाजिक सुधार और सामाजिक समानता का प्रश्न केंद्रीय था। उनके प्रसिद्ध ग्रंथ “Annihilation of Caste” में जाति-व्यवस्था और सामाजिक विभाजन की गहन आलोचना दिखाई देती है।
उनके विचारों का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि केवल कानूनी परिवर्तन पर्याप्त नहीं है। यदि कानून समानता देता है, लेकिन सामाजिक व्यवहार में व्यक्ति की गरिमा, अवसर और भागीदारी असमान बनी रहती है, तो संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक वास्तविकता के बीच अंतर बना रहता है।
इसी संदर्भ में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को सामाजिक जीवन के मूल्यों के रूप में समझना आवश्यक है।
आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा का प्रश्न
सामाजिक न्याय केवल आर्थिक संसाधनों के वितरण का प्रश्न नहीं है। इसका संबंध व्यक्ति के आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा से भी है।
किसी व्यक्ति को उसकी जाति, जन्म, पेशे, आर्थिक स्थिति, भाषा, लिंग या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण कमतर समझना सामाजिक समानता की भावना के विरुद्ध है।
इसलिए संकल्प दिवस का एक महत्वपूर्ण संदेश यह होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा को स्वीकार किया जाए और सामाजिक संबंधों में सम्मान को प्राथमिकता दी जाए।
समानता का वास्तविक अर्थ है—किसी व्यक्ति को केवल इसलिए छोटा न समझना क्योंकि उसका जन्म किसी विशेष सामाजिक समूह में हुआ है।
सामाजिक परिवर्तन की वास्तविक कसौटी
सामाजिक परिवर्तन केवल भाषणों, सम्मेलनों और घोषणाओं से पूरा नहीं होता। उसकी वास्तविक स्थिति समाज के व्यवहार, अवसरों और संस्थागत व्यवस्था में दिखाई देती है।
शोध और सामाजिक नीति के दृष्टिकोण से सामाजिक परिवर्तन के लिए निम्नलिखित संकेतकों पर ध्यान देना आवश्यक है—
1. शिक्षा में समान अवसर — आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच।
2. उच्च शिक्षा में भागीदारी — वंचित समुदायों के विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा और शोध में भागीदारी बढ़ाना।
3. रोजगार और आजीविका — सामाजिक पृष्ठभूमि से स्वतंत्र होकर समान अवसर और सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करना।
4. महिलाओं की भागीदारी — शिक्षा, रोजगार, नेतृत्व और निर्णय-निर्माण में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी बढ़ाना।
5. सामाजिक भेदभाव में कमी — जाति, लिंग, धर्म और सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव एवं बहिष्कार को रोकना।
6. डिजिटल समानता — इंटरनेट, डिजिटल शिक्षा और तकनीकी संसाधनों तक वंचित समुदायों की पहुँच बढ़ाना।
7. संवैधानिक जागरूकता — नागरिकों को अपने अधिकारों, कर्तव्यों और संवैधानिक मूल्यों की जानकारी देना।
8. संस्थागत जवाबदेही — विद्यालयों, प्रशासन, कार्यस्थलों और सामाजिक संस्थाओं में समान व्यवहार और शिकायत-निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करना।
संकल्प दिवस का आज के समाज के लिए संदेश
23 सितम्बर का ऐतिहासिक प्रसंग हमें यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है कि क्या केवल कानून बना देना सामाजिक समानता के लिए पर्याप्त है?
कानून आवश्यक है, लेकिन सामाजिक परिवर्तन के लिए सामाजिक चेतना, शिक्षा, संस्थागत सुधार और व्यक्तिगत व्यवहार में परिवर्तन भी आवश्यक हैं।
इसलिए आज का संकल्प केवल अस्पृश्यता के विरोध तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे व्यापक भेदभाव-विरोधी सामाजिक संस्कृति के निर्माण से जोड़ना आवश्यक है।
परिवार में समान व्यवहार, विद्यालय में समान अवसर, कार्यस्थल पर सम्मान, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी और संस्थाओं में जवाबदेही—ये सभी सामाजिक समानता के व्यावहारिक आधार हैं।
GKSSS की ओर से संकल्प
गोपाल किरण समाज सेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर द्वारा 23 सितम्बर 2026 को संकल्प दिवस के आयोजन का उद्देश्य बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के बड़ौदा अनुभव और उनके सामाजिक न्याय संबंधी संघर्ष को वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ना है।
इस अवसर पर समानता, शिक्षा, आत्मसम्मान, सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और संवैधानिक मूल्यों को केवल विचार या भाषण तक सीमित न रखकर व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा बनाने पर विचार किया जाना चाहिए।
संकल्प का अर्थ दूसरों से परिवर्तन की अपेक्षा करना मात्र नहीं, बल्कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करना भी है।
पाँच प्रमुख संकल्प
पहला — समानता का संकल्प: किसी व्यक्ति के साथ जाति, जन्म, लिंग, धर्म, भाषा या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे।
दूसरा — शिक्षा का संकल्प: वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों तथा युवाओं की शिक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी मानेंगे।
तीसरा — आत्मसम्मान का संकल्प: प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और सम्मान को सामाजिक संबंधों का आधार बनाएंगे।
चौथा — संवैधानिक मूल्यों का संकल्प: न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को केवल संविधान के शब्द न मानकर जीवन के व्यवहारिक मूल्य बनाएंगे।
पाँचवाँ — सामाजिक परिवर्तन का संकल्प: परिवर्तन की शुरुआत अपने परिवार, संस्था, कार्यस्थल और स्वयं के व्यवहार से करेंगे।
निष्कर्ष : संकल्प इतिहास से वर्तमान और भविष्य तक
23 सितम्बर 1917 का बड़ौदा प्रसंग भारतीय सामाजिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जाता है। संकल्प भूमि को डॉ. आंबेडकर के अस्पृश्यता उन्मूलन और सामाजिक समानता के संघर्ष से जोड़ा जाता है। यह प्रसंग हमें बताता है कि सामाजिक भेदभाव का अनुभव किसी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करने के साथ-साथ व्यापक सामाजिक परिवर्तन की चेतना को भी जन्म दे सकता है।
बाबासाहेब की शिक्षा, संघर्ष और सामाजिक चिंतन का व्यापक संदेश यह है कि शिक्षा व्यक्ति को सक्षम बनाती है, संविधान अधिकारों की सुरक्षा का आधार प्रदान करता है, लेकिन सामाजिक समानता को व्यवहार में स्थापित करने के लिए सामाजिक चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी आवश्यक है।
इसलिए 23 सितम्बर 2026 का संकल्प दिवस केवल अतीत को याद करने का दिन न होकर वर्तमान समाज की समीक्षा और भविष्य के भारत के लिए संकल्प का दिन बने—
“ऐसा समाज बनाने का संकल्प, जहाँ किसी व्यक्ति की गरिमा उसकी जाति, जन्म या सामाजिक पहचान से निर्धारित न हो; जहाँ शिक्षा और अवसरों तक समान पहुँच हो; जहाँ भेदभाव के स्थान पर समानता, अपमान के स्थान पर आत्मसम्मान और सामाजिक दूरी के स्थान पर बंधुत्व स्थापित हो।”
संकल्प केवल शब्द न रहे—वह व्यक्तिगत आचरण, सामाजिक जिम्मेदारी और संस्थागत परिवर्तन का आधार बने।
आयोजक : गोपाल किरण समाज सेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
23 सितम्बर 2026 — संकल्प दिवस
प्रमुख संदर्भ: भारत सरकार/प्रेस सूचना ब्यूरो एवं राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण से संबंधित संकल्प भूमि, वडोदरा के ऐतिहासिक विवरण; कोलंबिया विश्वविद्यालय के डॉ. बी.आर. आंबेडकर संबंधी ऐतिहासिक दस्तावेज; Annihilation of Caste तथा Waiting for a Visa।
