विजय की ✒ कलम
संपादकीय
कुछ समय पूर्व मैंने “विजय की ✒ कलम” में एक बात लिखी थी—“भक्त बनो, अंधभक्त नहीं।” साथ ही वृंदावन को लेकर भी चिंता व्यक्त की थी कि जिस स्थान पर देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन और संतों का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं, वहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए।
आज वृंदावन से जुड़ी कुछ घटनाओं और सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं ने एक बार फिर उन सवालों को सामने ला दिया है।
स्वामी प्रेमानंद महाराज जी के आश्रम/दरबार से जुड़े एक सेवादार की ऊंचाई से गिरकर हुई मौत की खबर ने श्रद्धालुओं को झकझोर दिया है। लेकिन इस घटना के पीछे वास्तविक कारण क्या था—यह अभी जांच का विषय है। क्या यह दुर्घटना थी, आत्महत्या थी अथवा किसी अन्य कारण से यह घटना हुई? इन सवालों का जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आना चाहिए। जब तक आधिकारिक जांच किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती, तब तक किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या हमारे धार्मिक स्थलों और संतों के आसपास बढ़ती भीड़, लोकप्रियता, संपत्ति और व्यवस्थाओं की जटिलता अब नई चुनौतियां पैदा कर रही है?
स्वामी प्रेमानंद महाराज जी का नाम आज देशभर में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कम समय में सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी लोकप्रियता जिस तेजी से बढ़ी, वह अपने आप में असाधारण है। बड़े-बड़े नेता, अभिनेता और समाज की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियां उनके दर्शन के लिए पहुंचती रही हैं। उनके प्रवचन, भक्ति संदेश और श्री राधा-कृष्ण के नाम का स्मरण करने की प्रेरणा ने लाखों लोगों को प्रभावित किया।
रात्रि के समय उनके दर्शन के लिए उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़, घंटों कतार में खड़े भक्त और दूर-दूर से वृंदावन पहुंचने वाले लोग इस लोकप्रियता की गवाही देते हैं।
लेकिन यहीं से एक दूसरा प्रश्न भी जन्म लेता है—
जब किसी संत की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ती है, जब हजारों-लाखों लोग उनके आसपास आने लगते हैं, जब धार्मिक गतिविधियों के साथ बड़ी व्यवस्थाएं और संपत्तियां जुड़ने लगती हैं, तब क्या उस संत की सुरक्षा, आश्रम की पारदर्शिता और वहां काम करने वाले लोगों की जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़नी नहीं चाहिए?
सोशल मीडिया पर इस घटना के बाद तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं। कहीं सेवादारों को लेकर चर्चाएं हैं, कहीं आश्रम की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल हैं तो कहीं संपत्ति और अधिकार को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इनमें से कई बातें अभी अपुष्ट हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए अफवाहों को सच मान लेना न संत के हित में है और न ही श्रद्धालुओं के।
यदि वास्तव में किसी स्तर पर कोई विवाद, षड्यंत्र, दबाव, संपत्ति संबंधी विवाद या किसी व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यदि ऐसा कुछ नहीं है, तो जांच के माध्यम से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों की वास्तविकता क्या है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वामी प्रेमानंद महाराज जी की सुरक्षा और उनके आसपास की व्यवस्थाओं को लेकर शासन-प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि श्रद्धालुओं अथवा भक्तों द्वारा उनकी सुरक्षा की मांग को लेकर शासन को पत्र दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं, तो इसकी वास्तविक स्थिति भी प्रशासन को स्पष्ट करनी चाहिए।
धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार की अफवाह, विवाद या आपराधिक गतिविधि को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
पुराने संत-महात्माओं का जीवन हमें एक अलग ही संदेश देता है। वे साधारण जीवन जीते थे। छोटी-सी कुटिया में रहते थे। न संपत्ति का मोह, न वैभव की इच्छा और न भीड़ की लालसा। उनका संसार उनकी साधना और प्रभु की भक्ति तक सीमित था।
मुझे ऐसे ही एक संत की कही हुई बात आज फिर याद आती है। मैंने उनसे कभी पूछा था कि वे भी चाहें तो बड़े आश्रम, गाड़ियां और संपत्ति खड़ी कर सकते हैं, फिर ऐसा क्यों नहीं करते?
उन्होंने जवाब दिया था—
“बेटा, मैं चाहूं तो बहुत कुछ खड़ा कर सकता हूं, लेकिन जिस सुख की तलाश में मैं प्रभु की भक्ति कर रहा हूं, वह सुख इन चीजों में नहीं मिलेगा। आज जो लोग सेवा कर रहे हैं, कल वही संपत्ति और व्यवस्था के लिए लड़ेंगे। मैं उस विवाद का हिस्सा नहीं बनना चाहता। इसलिए अपनी छोटी-सी कुटिया में प्रभु की भक्ति में खुश हूं।”
आज उस संत की बात का अर्थ और गहरा समझ में आता है।
शायद इसी कारण हमारे संतों ने हमेशा कहा कि माया से दूरी रखो, प्रभु के नाम से जुड़ो और अहंकार से बचो।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर लोकप्रिय संत या हर बड़े धार्मिक संस्थान को संदेह की नजर से देखा जाए। संतों के प्रति श्रद्धा अपनी जगह है और किसी घटना की निष्पक्ष जांच अपनी जगह।
श्रद्धा का अर्थ आंखें बंद कर लेना नहीं है। श्रद्धा के साथ विवेक भी जरूरी है।
आज देशभर के हजारों-लाखों श्रद्धालु स्वामी प्रेमानंद महाराज जी से जुड़े हुए हैं। उनके लिए यह समय भावनात्मक रूप से बेहद कठिन है। जिन लोगों ने उनके दर्शन किए, वे उन क्षणों को अपना सौभाग्य मानते हैं और जिन्होंने दर्शन नहीं किए, उनके मन में भी मिलने की इच्छा अधूरी है।
सोशल मीडिया पर उनके पुराने वीडियो भी सामने आ रहे हैं, जिनमें वे भक्तों को प्रभु का नाम जपते रहने और राधा-कृष्ण की भक्ति से जुड़े रहने का संदेश देते दिखाई देते हैं। ऐसे संदेश ही उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण बने हैं।
लेकिन आज आवश्यकता है कि भावनाओं से ऊपर उठकर सत्य की तलाश की जाए।
यदि कोई घटना हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो।
यदि किसी की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है तो सच्चाई सामने आए।
यदि किसी पर अपराध सिद्ध होता है तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई हो।
और यदि सोशल मीडिया पर झूठी बातें फैलाई जा रही हैं तो उनके विरुद्ध भी कार्रवाई हो।
क्योंकि धर्म के नाम पर अधर्म को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
आज हम केवल यही प्रार्थना करते हैं कि स्वामी प्रेमानंद महाराज जी स्वस्थ, सुरक्षित और दीर्घायु रहें तथा भक्तों को पहले की तरह प्रभु भक्ति, श्री राधा-कृष्ण के नाम और सदाचार का संदेश देते रहें।
और साथ ही हमारी यह भी प्रार्थना है कि वृंदावन जैसे पवित्र तीर्थ की गरिमा, सुरक्षा और धार्मिक वातावरण किसी भी विवाद, लालच या स्वार्थ की भेंट न चढ़े।
क्योंकि संत किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं होते—उनका संदेश समाज की धरोहर होता है।
और अंत में फिर वही बात—
**भक्त बनिए… लेकिन अंधभक्त नहीं।
श्रद्धा रखिए… लेकिन विवेक के साथ।
संतों का सम्मान कीजिए… लेकिन सत्य और धर्म का सम्मान उससे भी पहले कीजिए।**
— विजय दुसेजा
“विजय की ✒ कलम”
