भाखा के परंपरागत आधार ले डिजिटल भविष्य तक
– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
छत्तीसगढ़ के माटी मं जऊन मिठास हे, ओही मिठास हमर बोली-भाखा मं घलो बसे हे। छत्तीसगढ़ी सिरिफ हमर बोलचाल के माध्यम नइ, ये हमर संस्कृति, संस्कार, परंपरा, लोकजीवन अऊ सामूहिक पहचान के जीवंत स्वर आय। हमर लोकगीत, लोककथा, गाथा, कहिनी, कहावत, मुहावरा, तीज-तिहार अऊ लोकाचार के आत्मा छत्तीसगढ़ी मं बसे हे। हमर पुरखा मन अपन अनुभव, ज्ञान, जीवन-दर्शन अऊ सामाजिक सरोकार ला पीढ़ी-दर-पीढ़ी एही भाखा के माध्यम ले आगे बढ़ावत आइन। एखर सेती छत्तीसगढ़ी ला केवल संचार के साधन मानना हमर लोकविरासत के व्यापक स्वरूप ला छोट करना होही।
प्रिंट मीडिया मं छत्तीसगढ़ी के गौरवपूर्ण उपस्थिति
एक समय रहिस, जब छत्तीसगढ़ के अनेक अखबार अऊ पत्र-पत्रिका मन अपन पन्ना मं छत्तीसगढ़ी भाखा अऊ साहित्य ला सम्मान के संग जगह देय रहिन। हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत सहित अनेक पत्र-पत्रिका मन मं छत्तीसगढ़ी कविता, कहानी, व्यंग्य, आलेख अऊ लोकसाहित्य के प्रकाशन से स्थानीय रचनाकार मन ला अपन भाखा मं लिखे अऊ पाठक मन तक पहुँचाय के मंच मिलत रहिस।
प्रिंट मीडिया के ये भूमिका केवल साहित्य छापे तक सीमित नइ रहिस। ए माध्यम ले छत्तीसगढ़ी के लिखित स्वरूप ला सामाजिक स्वीकार्यता मिलिस, नवा रचनाकार मन ला प्रोत्साहन मिलिस अऊ भाखा के साहित्यिक संसार के विस्तार होइस। फेर समय के संग मीडिया के स्वरूप, आर्थिक प्राथमिकता, बाजारवाद, विज्ञापन अऊ पाठकीय रुचि मं बदलाव आय हे। अखबार के पन्ना सीमित होवत गिन, डिजिटल माध्यम तेजी ले बढ़िस अऊ छत्तीसगढ़ी सामग्री के नियमित प्रकाशन कई जगह पहिली के तुलना मं कम दिखे लगिस। ये स्थिति ला सिरिफ मीडिया के समस्या मानना उचित नइ होही। ये हमर बर आत्ममंथन के घड़ी घलो आय।
सोशल मीडिया बनिस नवा जनमंच
आज फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब, इंस्टाग्राम अऊ अन्य डिजिटल मंच मन छत्तीसगढ़ी बर एक विशाल जनमंच बनके उभरे हें। अब रचनाकार ला अपन कविता, गीत, कहानी, लोककथा, व्यंग्य या विचार प्रकाशित करे बर हमेशा संपादक के स्वीकृति के इंतजार नइ करना पड़त।
गांव के एक नवा कवि के रचना कुछ मिनट मं हजारों मनखे तक पहुँच सकथे। लोकगायक अपन गीत ला दुनिया के कोनो कोना तक पहुँचा सकथे। लोककला, लोकनृत्य अऊ लोकपरंपरा के वीडियो नई पीढ़ी तक पहुँच सकथे। ये डिजिटल माध्यम के सबसे बड़े लाभ मन मं एक आय। फेर सोशल मीडिया के अपन सीमा घलो हे। इहाँ सामग्री तेजी ले वायरल होथे, फेर ओतके तेजी ले पीछे घलो छूट जाथे। आज के लोकप्रिय पोस्ट आने वाला समय मं खोजे मं मुश्किल हो सकथे। सामग्री के प्रामाणिकता, भाषा की शुद्धता अऊ साहित्यिक गुणवत्ता के सवाल घलो बने रहिथे। एखर सेती सोशल मीडिया प्रिंट मीडिया के विकल्प नइ, बल्कि दुनो एक-दूसर के पूरक बन सकथें।
अब एआई के चुनौती अऊ अवसर
अब हमन एक अइसन समय मं हवन, जिहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस – एआई हमर जीवन के लगभग हर क्षेत्र ला प्रभावित करत हे। भाषा के क्षेत्र मं एआई एक नई संभावना के दरवाजा खोलत हे। एआई कविता लिख सकथे, गीत के बोल तैयार कर सकथे, संगीत के प्रारूप बनाय मं मदद कर सकथे, अनुवाद कर सकथे, आवाज ला टेक्स्ट मं बदल सकथे अऊ टेक्स्ट ला आवाज मं बदल सकथे। लेकिन एआई के क्षमता ओतके मजबूत होही, जेतका मजबूत डिजिटल सामग्री ओकर पास उपलब्ध होही। एही जगह मं छत्तीसगढ़ी बर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होथे।
डिजिटल कॉर्पस – भाखा के भविष्य के आधार
एआई ला छत्तीसगढ़ी सिखाय बर हमर भाखा के विशाल डिजिटल कॉर्पस जरूरी हे। डिजिटल कॉर्पस मतलब छत्तीसगढ़ी के कविता, कहानी, लोकगीत, लोककथा, कहावत, मुहावरा, शब्दकोश, समाचार, पुस्तक, बातचीत, पुराना साहित्य अऊ मौखिक परंपरा के व्यवस्थित डिजिटल संग्रह।
आज जरूरत हे कि हमर पुराना छत्तीसगढ़ी साहित्य ला डिजिटाइज करके सुरक्षित करे जाय। पुराना अखबार, दुर्लभ पुस्तक, लोकगीत, लोककथा अऊ लोकगाथा मन के डिजिटल अभिलेख बने। अलग-अलग क्षेत्र मं बोले जावत छत्तीसगढ़ी के शब्द, उच्चारण अऊ स्थानीय रूप मन के दस्तावेजीकरण होय। काबर कि जऊन भाखा डिजिटल दुनिया मं उपलब्ध नइ रहिही, ओकर प्रतिनिधित्व भविष्य के तकनीक मं कमजोर हो सकथे।
एआई मं छत्तीसगढ़ी के रचनात्मक प्रयोग
एआई के क्षेत्र मं छत्तीसगढ़ी के रचनात्मक प्रयोग के कुछ उल्लेखनीय प्रयास अब सामने आवत हें। बिलासपुर के वरिष्ठ गीतकार, साहित्यकार अऊ संगीतकार सनत तिवारी जी द्वारा एआई के माध्यम ले गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के कालजयी प्रसंगों पर आधारित काव्यात्मक गीत-संगीत तैयार करे के प्रयोग विशेष रूप ले उल्लेखनीय मान सकथे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनके ये प्रयोग श्रोताओं के बीच प्रशंसा प्राप्त कर रहे हें और ए बात के उदाहरण प्रस्तुत करत हें कि आधुनिक तकनीक ला अपन लोकभाषा, साहित्य अऊ आध्यात्मिक-सांस्कृतिक रचनाशीलता के संग जोड़े जा सकथे। ये प्रयोग केवल तकनीकी कौतूहल नइ, बल्कि एक बड़े संभावना के संकेत आय। अगर एआई के सहायता ले तुलसी, कबीर, सूर, मीरा, दादू या हमर छत्तीसगढ़ी लोककवि मन के रचनात्मक संसार ला नवा पीढ़ी के श्रव्य-दृश्य माध्यम तक पहुँचाय जा सकथे, त साहित्य के पहुंच कई गुना बढ़ सकथे।
बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार शत्रुघ्न जयश्वानी अऊ मैं, सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’, घलो एआई के माध्यम ले नवा-नवा काव्यात्मक अऊ संगीतात्मक प्रयोग मन के दिशा मं काम शुरू करे हवन। इन प्रयोगों के प्रति मिलत सकारात्मक प्रतिक्रिया ये संकेत देथे कि तकनीक अऊ साहित्य के मेल ले छत्तीसगढ़ी रचनाशीलता के एक नवा अध्याय के शुरुआत हो सकथे। हालांकि, इहाँ एक सावधानी जरूरी हे—एआई रचनाकार के स्थान लेवे वाला माध्यम नइ, बल्कि रचनाकार के सृजनात्मक सहयोगी बने। भाषा के आत्मा, लोकजीवन के अनुभव, संवेदना अऊ सांस्कृतिक संदर्भ मनुष्य के पासे रहिही। तकनीक साधन हो सकथे, सृजन के अंतिम आत्मा नइ।
एआई छत्तीसगढ़ी ला कमजोर करही या मजबूत?
ए सवाल के जवाब हमर अपन तैयारी मं छिपे हे। अगर हमन छत्तीसगढ़ी के पर्याप्त डिजिटल सामग्री तैयार करबो, शब्द-संग्रह बनाबो, लोकसाहित्य ला संरक्षित करबो, पुराना साहित्य ला डिजिटल रूप देबो, सही उच्चारण अऊ व्याकरण के सामग्री उपलब्ध कराबो, त एआई हमर भाखा ला समझे मं लगातार बेहतर हो सकही। एआई के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी-हिंदी, छत्तीसगढ़ी-अंग्रेजी अऊ आने वाला समय मं अउ भाखा मन के बीच अनुवाद के नवा रास्ता खुल सकथे। आवाज आधारित तकनीक मं छत्तीसगढ़ी संवाद संभव हो सकथे। बच्चों बर छत्तीसगढ़ी मं डिजिटल शैक्षणिक सामग्री तैयार हो सकथे। लोकसाहित्य के संरक्षण अऊ प्रसार के नवा साधन बन सकथें। लेकिन अगर डिजिटल दुनिया मं हमर सामग्री बहुत कम रहिस, त एआई मं छत्तीसगढ़ी के प्रतिनिधित्व घलो सीमित रह जाही।
अब सवाल अखबार से आगे बढ़के डिजिटल भविष्य के हे
आज सवाल सिरिफ ये नइ हे कि अखबार के पन्ना मं छत्तीसगढ़ी केतका छपथे। सवाल ये घलो हे कि डिजिटल दुनिया मं छत्तीसगढ़ी केतका उपलब्ध हे, केतका व्यवस्थित हे अऊ केतका विश्वसनीय हे।एखर बर साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार, शिक्षाविद, तकनीकी विशेषज्ञ, प्रकाशक, सामाजिक संगठन अऊ शासन सबके सामूहिक भूमिका जरूरी हे।
अखबार मन ला छत्तीसगढ़ी साहित्य बर नियमित अऊ सम्मानजनक जगह बनाए रखना चाही। साहित्यकार मन ला अपन रचना के डिजिटल संग्रह बनाना चाही। सोशल मीडिया के रचनाकार मन ला गुणवत्तापूर्ण सामग्री के साथ भाषा के शुद्धता अऊ मौलिकता के ध्यान रखना चाही। शिक्षण संस्थान मन ला छत्तीसगढ़ी के डिजिटल अध्ययन-सामग्री तैयार करना चाही। सरकारी अऊ गैर-सरकारी संस्थान मन मिलके छत्तीसगढ़ी के डिजिटल आर्काइव, ई-शब्दकोश, लोकसाहित्य संग्रह अऊ भाषायी कॉर्पस तैयार कर सकथें। विश्वविद्यालय, शोध संस्थान अऊ भाषा-साहित्य से जुड़े संगठन ए काम ला वैज्ञानिक ढंग ले आगे बढ़ा सकथें।
सबले जरूरी…घर मं भाखा बांचे
लेकिन इन सब प्रयास के बीच एक बात ला हमन कभू नइ भूलन चाही, भाखा सिरिफ किताब, अखबार या कंप्यूटर मं नइ बचय।
भाखा घर मं बांचे।
भाखा व्यवहार मं बांचे।
भाखा अपनपन मं बांचे।
अगर घर के दादा-दादी अपन नाती-पोता संग छत्तीसगढ़ी मं गोठियाहीं, माता-पिता अपन बच्चा मन संग छत्तीसगढ़ी मं बात करहीं, साहित्यकार छत्तीसगढ़ी मं लिखहीं, पत्रकार छत्तीसगढ़ी ला अखबार मं जगह देहीं अऊ तकनीकी विशेषज्ञ ओकर डिजिटल स्वरूप तैयार करहीं..त छत्तीसगढ़ी के भविष्य निश्चित रूप ले मजबूत होही।
आज जरूरत शिकायत के कम, सृजन अऊ संरक्षण के जियादा हे।
आवव, हमन छत्तीसगढ़ी ला सिरिफ घर अऊ तीज-तिहार तक सीमित नइ रखन। ओला किताब के पन्ना मं, अखबार के पन्ना मं, सोशल मीडिया के मंच मं, डिजिटल अभिलेखागार मं अऊ एआई जइसन आधुनिक तकनीक के संसार मं सम्मान के संग स्थापित करन। एकर सेतिर आज के डिजिटल युग के एक सच्चाई साफ हे – जऊन भाखा के डिजिटल सामग्री समृद्ध होही, ओही भाखा के तकनीकी भविष्य मं आवाज मजबूत होही। अऊ हमर छत्तीसगढ़ी के आवाज केवल मजबूत नइ, बल्कि दुनिया तक पहुँचय,ये हमर सबके सामूहिक जिम्मेदारी आय।
भाखा कोनो आदेश ले नइ बचय,
भाखा समाज के व्यवहार ले जिंदा रहिथे।
अंत मं चार लाइन….
हमर भाखा बांचही, त संस्कृति बांचही,
संस्कृति बांचही, त हमर पहचान बांचही।
डिजिटल दुनिया मं गूंजही जब छत्तीसगढ़ी के आवाज,
त दुनिया के नक्शा मं अउ
चमकी हमर छत्तीसगढ़ी के लाज।।
जय छत्तीसगढ़!
जय जोहार!!
– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार/ लेखक/अधिवक्ता
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
