खबर अनिल शुक्ला के बिलासपुर से :-
बिलासपुर। सकरी डिवीजन क्षेत्र में करीब एक वर्ष पूर्व उद्योग स्थापित करने के नाम पर किए गए 11 केवी लाइन विस्तार और 63 किलोवाट ट्रांसफार्मर की स्थापना का मामला लगातार सवालों के घेरे में है। करीब 11 खंभों के जरिए विद्युत लाइन बिछाने और ट्रांसफार्मर लगाने में लगभग 10 लाख रुपये के भीतर खर्च होने की बात सामने आई है, जबकि जिस उद्योग के लिए यह व्यवस्था की गई थी, वह अब तक स्थापित नहीं हुआ है।
मामले को लेकर लगातार खबरें सामने आने के बाद आखिरकार सकरी डिवीजन के कार्यपालन अभियंता मिलिंद पांडे ने आज चर्चा के लिए समय दिया। बातचीत के दौरान जब उनसे जांच, जिम्मेदारी और संभावित आर्थिक अनियमितता से जुड़े सीधे सवाल किए गए तो कई बिंदुओं पर उनका जवाब स्पष्ट होने के बजाय घुमावदार रहा।
ईई बोले- मेरे कार्यकाल का नहीं, इसलिए रिकॉर्ड मंगाया
कार्यपालन अभियंता मिलिंद पांडे ने बताया कि उक्त विद्युत विस्तार उनके कार्यकाल का नहीं है। इसलिए उन्होंने सब-डिवीजन कार्यालय के सहायक अभियंता एवं कनिष्ठ अभियंता से पूरे मामले की जानकारी मंगाई है।
उनके अनुसार, एक आवेदक ने उद्योग स्थापित करने के उद्देश्य से 11 केवी लाइन विस्तार एवं 63 किलोवाट ट्रांसफार्मर की मांग की थी और उसी आधार पर कार्य कराया गया था। अब उद्योग स्थापित नहीं होने की स्थिति में आवेदक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज एवं भूमि संबंधी विलेखों की जांच की जाएगी तथा उसे नोटिस देकर स्पष्टीकरण लिया जाएगा।
ईई का कहना है कि उद्योग नहीं लगना अपने आप में विभागीय नुकसान नहीं है। जरूरत पड़ने पर लाइन विस्तार को दूसरी जगह उपयोग में लाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल वहां LT लाइन या अतिरिक्त खंभों का विस्तार नहीं किया जाएगा।
जांच होगी तो फिर जिम्मेदारी किसकी?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि विभाग अब दस्तावेजों की जांच करेगा, तो पहले सर्वे किसने किया, एस्टीमेट किसने बनाया, तकनीकी स्वीकृति किसने दी और वर्क ऑर्डर किस आधार पर जारी हुआ?
लगातार खबरों के बाद जांच की बात सामने आने के बावजूद जब जिम्मेदारी तय करने और संभावित आर्थिक नुकसान से जुड़े सवाल किए गए तो बातचीत में स्पष्ट जवाब के बजाय प्रक्रिया और पुराने कार्यकाल का हवाला दिया जाता रहा।
अब फाइल खोलेगी पूरे मामले की परतें
जांच में सर्वे रिपोर्ट, एस्टीमेट, तकनीकी स्वीकृति, वर्क ऑर्डर, ठेकेदार का विवरण, MB, भुगतान रिकॉर्ड, कनेक्शन आवेदन, स्वीकृत लोड तथा आवेदक के भूमि एवं उद्योग संबंधी दस्तावेज सामने आने जरूरी हैं।
इन दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगा कि करीब 10 लाख रुपये के भीतर किया गया यह विद्युत विस्तार पूरी तरह नियमों के अनुरूप था या इसमें किसी स्तर पर आर्थिक अथवा प्रक्रियागत अनियमितता हुई।
फिलहाल खबरों के दबाव के बाद विभागीय स्तर पर जांच की बात सामने आना अपने आप में इस मामले को महत्वपूर्ण बना रहा है। अब नजर इस बात पर है कि जांच केवल कागजों तक सीमित रहती है या जिम्मेदारी भी तय होती है।
