
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ भारत का संविधान समानता, सामाजिक न्याय और अवसरों की समता का आदर्श प्रस्तुत करता है। इसी उद्देश्य से स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा बाद में अन्य पिछड़ा वर्ग सहित विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू की गई। उस समय इसका उद्देश्य उन समुदायों को शिक्षा, रोजगार और शासन-प्रशासन में अवसर प्रदान करना था जो सदियों से सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित रहे थे। समय के साथ देश बदला, समाज बदला और अनेक आरक्षित वर्गों के परिवार शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, राजनीति और व्यापार जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर चुके हैं। ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है – क्या वर्तमान स्वरूप में आरक्षण व्यवस्था का समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए? यह प्रश्न किसी वर्ग का विरोध नहीं है, बल्कि सार्वजनिक नीति की समीक्षा का प्रश्न है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियाँ स्थायी नहीं होतीं; बदलती परिस्थितियों के अनुरूप उनका परीक्षण और आवश्यक संशोधन लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। आज समाज के एक वर्ग का यह मत सामने आता है कि कई ऐसे परिवार, जो वर्षों से आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक और सामाजिक रूप से अत्यंत सक्षम हो चुके हैं, उनकी अगली पीढ़ियाँ भी उसी लाभ को प्राप्त कर रही हैं। दूसरी ओर अनेक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार, जो आरक्षण के दायरे में नहीं आते, सीमित संसाधनों के बावजूद प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाते हैं। इस स्थिति ने अवसरों की समानता पर नई बहस को जन्म दिया है। यह भी सत्य है कि डॉक्टर, इंजीनियर, न्यायिक अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य जिम्मेदार पदों पर नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति से समाज उच्चतम स्तर की दक्षता और उत्तरदायित्व की अपेक्षा करता है। इसलिए चयन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो सामाजिक न्याय और उत्कृष्टता,दोनों के बीच संतुलन बनाए रखे। आज के वह वैविध्य और व्यापक आधुनिक परिवेश यह भी पूरी शिद्दत से देखने में आ रहा है कि दक्ष और योग्य व्यक्ति जिम्मेदार और अहम पद पर नहीं होने से गहरे नकारात्मक स्थिति उत्पन्न हो रहें है। यह ऐसा संकेत है जो हमें सावधान करने के लिए पर्याप्त है। मेरे विचार से अब आवश्यकता आरक्षण को केवल समाप्त करने या बनाए रखने की बहस तक सीमित रहने की नहीं है, बल्कि उसकी व्यापक समीक्षा की है। यह विचार किया जा सकता है कि जिन परिवारों ने लंबे समय से आरक्षण का लाभ लेकर पर्याप्त सामाजिक और आर्थिक प्रगति कर ली है, क्या उन्हें उसी रूप में निरंतर लाभ मिलना चाहिए, या फिर नीति का लाभ उन परिवारों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचना चाहिए जो आज भी वास्तविक रूप से वंचित हैं। साथ ही, आर्थिक रूप से कमजोर नागरिक, महिलाएँ, दिव्यांगजन, भूतपूर्व सैनिक, अनाथ, अत्यंत पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले परिवार तथा अन्य वास्तविक जरूरतमंद वर्गों को प्राथमिकता देने जैसे विकल्पों पर भी गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए। इससे सामाजिक न्याय का उद्देश्य और अधिक व्यापक रूप में साकार हो सकता है। यह भी उतना ही आवश्यक है कि इस विषय पर किसी भी प्रकार की चर्चा संवैधानिक मर्यादा, सामाजिक सौहार्द और परस्पर सम्मान के साथ हो। किसी भी वर्ग की गरिमा को आहत किए बिना नीति की समीक्षा करना ही लोकतंत्र की शक्ति है। भारत का भविष्य ऐसी व्यवस्था में निहित है जहाँ सामाजिक न्याय और योग्यता दोनों एक-दूसरे के पूरक बनें, प्रतिस्पर्धी नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि नीति का लाभ वास्तव में उन तक पहुँचे जिन्हें उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, साथ ही सभी नागरिकों को अपनी प्रतिभा और परिश्रम के आधार पर आगे बढ़ने का समान अवसर मिले। “संविधान की आत्मा सामाजिक न्याय है और लोकतंत्र की आत्मा समान अवसर। यदि समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं तो नीतियों की समीक्षा भी लोकतांत्रिक परंपरा का ही हिस्सा होती है। प्रश्न आरक्षण के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था के निर्माण का है जिसमें सामाजिक न्याय, योग्यता और अवसर ,इन तीनों का संतुलन बना रहे।”पाठकों से एक प्रश्नयह लेख मेरे व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है। मेरा उद्देश्य किसी वर्ग का विरोध करना नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय विषय पर सकारात्मक संवाद को आगे बढ़ाना है। अब यह प्रश्न में अपने सभी पाठक साथियों विचारों पर पर भी छोड़ता हूं कि ..क्या आपको लगता है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कर उसे बदलती सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित किया जाना चाहिए? या आप मानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था ही सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक है? अपने विचार अवश्य साझा करें। स्वस्थ संवाद ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।न्याय वही जो सबको अवसर, सबका हो सम्मान,मेहनत का भी ऊँचा हो फिर, भारत में स्थान।विमर्शों से ही राह निकले, मतभेदों से नहीं,समरसता की ज्योति जले, यही हो देश की शान।। – सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’- बिलासपुर, छत्तीसगढ़
