
– सुरेश सिंह बैस
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जीएसटी और आयकर की कथित चोरी की जांच की मांग को लेकर दायर याचिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी निजी विवाद को जनहित का नाम देने मात्र से वह जनहित याचिका (PIL) नहीं बन जाती। जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय का हस्तक्षेप मांगने के लिए याचिकाकर्ता को ठोस और विश्वसनीय आधार प्रस्तुत करना आवश्यक है।
जीएसटी और आयकर चोरी की कथित शिकायत पर दायर याचिका खारिज, अदालत ने कहा – न्यायिक हस्तक्षेप के लिए ठोस आधार जरूरी
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिका वास्तव में जनहित से जुड़ा मामला नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन विषयों पर संबंधित वैधानिक प्राधिकरणों को जांच और कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है, उनमें न्यायालय सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि कुछ निजी कंपनियों और उनके संचालकों द्वारा करोड़ों रुपये की कथित जीएसटी और आयकर चोरी की गई है। याचिका में जीएसटी, जीएसटी विभाग तथा आयकर विभाग को निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कर राशि की वसूली तथा आवश्यक कार्रवाई के निर्देश देने की मांग की गई थी।
वैधानिक जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप का प्रयास
अदालत ने कहा कि याचिका को जनहित का नाम देने से वह स्वतः जनहित याचिका नहीं बन जाती। यदि किसी मामले में पहले से ही वैधानिक जांच की प्रक्रिया उपलब्ध है, तो न्यायालय उस प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे जांच का आदेश नहीं दे सकता। खंडपीठ ने यह भी कहा कि कर चोरी जैसे मामलों की जांच संबंधित वैधानिक एवं सक्षम प्राधिकारियों का कार्य है। न्यायालय किसी विशेष तरीके से जांच कराने का आदेश नहीं दे सकता, विशेषकर तब जब विभागीय स्तर पर जांच की प्रक्रिया पहले से उपलब्ध हो।अदालत ने याचिका को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करने से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का निर्देश
“जनहित का लेबल लगाने भर से कोई याचिका PIL नहीं बन जाती; न्यायिक हस्तक्षेप के लिए वास्तविक जनहित और ठोस आधार जरूरी है।”
