– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
बिलासपुर। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज मानव सभ्यता की सबसे प्रभावशाली तकनीकी उपलब्धियों में शामिल हो चुकी है। चिकित्सा से लेकर शिक्षा, पत्रकारिता, अंतरिक्ष विज्ञान, उद्योग और मनोरंजन तक इसका विस्तार तेजी से हो रहा है। लेकिन एआई को अधिक सक्षम, सटीक और ‘मानवीय’ बनाने की वैश्विक प्रतिस्पर्धा अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है, जहां सवाल केवल तकनीक का नहीं, बल्कि मानव ज्ञान की विरासत के संरक्षण का भी है।
हाल की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों ने एक गंभीर चिंता को जन्म दिया है….क्या दुनिया की दुर्लभ, पुरानी और इंटरनेट पर उपलब्ध न होने वाली किताबें एआई के लिए कच्चा माल बनकर नष्ट की जा रही हैं? अमेरिकी खोजी मीडिया संस्थान 404 Media की अगस्त 2026 की जांच ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी मात्रा में पुरानी और दुर्लभ किताबें खरीदी जा रही हैं, उन्हें एक विशेष प्रक्रिया के तहत उनकी जिल्द से अलग कर तेज गति से स्कैन किया जाता है और उसके बाद भौतिक प्रतियों को नष्ट कर दिया जाता है। जांच में एक दुर्लभ किताब में ट्रैकिंग डिवाइस लगाकर उसकी यात्रा का पता लगाया गया, जो अंततः लास वेगास स्थित Amazon के VGT3 नामक केंद्र तक पहुंची। वहां कर्मचारियों के अनुसार किताबों की बाइंडिंग काटकर पन्नों को स्कैन किया जाता है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है। Amazon ने यह स्वीकार नहीं किया है कि VGT3 में स्कैन की जा रही किताबें विशेष रूप से AI मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए ही इस्तेमाल होती हैं। कंपनी ने केवल इतना कहा कि वह वाणिज्यिक माध्यमों से किताबें खरीदती है ताकि अपने उत्पादों और सेवाओं के विकास एवं सुधार में उनका उपयोग कर सके। इसलिए इस मामले में ‘Amazon किताबें नष्ट करके AI को प्रशिक्षित कर रहा है’ को पूर्णतः स्थापित तथ्य के बजाय जांच से सामने आई गंभीर संभावना के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
लेकिन मामला केवल Amazon तक सीमित नहीं।इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किताबों की ‘डिस्ट्रक्टिव स्कैनिंग’ का विचार कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। वर्ष 2026 में Anthropic से जुड़े एक मुकदमे के दौरान सामने आए दस्तावेजों ने दिखाया कि कंपनी ने बड़ी संख्या में किताबें खरीदकर उनकी जिल्द काटने, पन्नों को स्कैन करने और मूल प्रतियों को नष्ट करने की योजना बनाई थी। इस परियोजना को आंतरिक रूप से ‘Project Panama’ कहा गया था। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, दस्तावेजों में लाखों किताबों को इस तरीके से स्कैन करने की योजना का उल्लेख सामने आया। यानी यह अब केवल किसी एक कंपनी या एक गोदाम की कहानी नहीं रह गई है। यह उस व्यापक संकट का संकेत है जिसमें दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियां एआई मॉडल के लिए अधिकाधिक उच्च गुणवत्ता वाले मानव-लिखित डेटा की तलाश कर रही हैं।
आखिर पुरानी किताबों में ऐसा क्या है? इसका उत्तर बेहद महत्वपूर्ण है। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री का एक बड़ा हिस्सा पहले ही विभिन्न एआई प्रणालियों के प्रशिक्षण में इस्तेमाल हो चुका है। इसके अलावा इंटरनेट पर अब तेजी से एआई द्वारा तैयार की गई सामग्री भी बढ़ रही है। यही कारण है कि तकनीकी जगत में ‘मॉडल कोलैप्स’ को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है ,अर्थात यदि एआई मॉडल लगातार ऐसे डेटा पर प्रशिक्षित होते रहें, जो पहले से एआई द्वारा बनाया गया है, तो समय के साथ आउटपुट की गुणवत्ता और विविधता प्रभावित हो सकती है।
इसके विपरीत पुरानी किताबें एक अलग तरह का स्रोत हैं। उनमें संपादित, व्यवस्थित, विषय-विशेष और लंबे समय तक मानव द्वारा तैयार किया गया ज्ञान मौजूद होता है। 404 मिडिया की रिपोर्ट में पुस्तक-सप्लाई से जुड़ी कंपनी ISBNdb द्वारा पुरानी पुस्तकों को एआई प्रशिक्षण के लिए मूल्यवान स्रोत के रूप में प्रस्तुत किए जाने का भी उल्लेख है। यही कारण है कि दशकों या सदियों पुरानी किताबें अचानक तकनीकी कंपनियों के लिए बहुमूल्य ‘डेटा संसाधन’ बन गई हैं।
ISBN से लेकर दुर्लभ पुस्तकों तक क्या बन रही है कोई वैश्विक सूची? 404 मिडिया की जांच में एक और रोचक तथ्य सामने आया। स्कैनिंग प्रक्रिया में पुस्तकों के ISBN यानी International Standard Book Number को भी ट्रैक किया जा रहा था। इससे कुछ पुस्तक विक्रेताओं ने यह आशंका व्यक्त की कि कंपनियां व्यवस्थित ढंग से अधिक से अधिक प्रकाशित पुस्तकों को डिजिटल स्वरूप में लाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन इस बिंदु पर भी सावधानी जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोई कंपनी निश्चित रूप से दुनिया की हर ISBN वाली किताब को स्कैन करने की वैश्विक योजना चला रही है। यह फिलहाल जांचकर्ताओं और पुस्तक विक्रेताओं द्वारा व्यक्त की गई एक गंभीर आशंका है, न कि पूरी तरह प्रमाणित वैश्विक योजना।
सबसे बड़ा संकट किताब की कीमत नहीं, उसका अस्तित्व है।एक दुर्लभ पुस्तक की कीमत उसके कागज, जिल्द या बाजार मूल्य से कहीं अधिक होती है। वह किसी दौर की सामाजिक स्मृति हो सकती है। किसी छोटे शहर का इतिहास, किसी भूली हुई भाषा का दस्तावेज, किसी लोक परंपरा का एकमात्र लिखित प्रमाण, किसी वैज्ञानिक प्रयोग का पुराना विवरण या किसी लेखक की ऐसी कृति, जिसकी अब नई छपाई संभव ही नहीं। किसी पुस्तक की अंतिम उपलब्ध प्रति यदि केवल इसलिए नष्ट कर दी जाती है कि उसके शब्दों को मशीन के प्रशिक्षण डेटा में बदलना है, तो नुकसान केवल एक पुस्तक का नहीं होगा ,मानव सभ्यता की स्मृति का एक भौतिक प्रमाण हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है। यह भी समझना होगा कि प्रश्न एआई के विरोध का नहीं है। एआई मानव जीवन में अत्यंत उपयोगी भूमिका निभा सकता है और निभा भी रहा है। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीकी प्रगति की दौड़ में ज्ञान के स्रोतों के संरक्षण, लेखकों के अधिकार और सांस्कृतिक विरासत को गौण समझ लिया जाए।
एक मशीन को अधिक से बुद्धिमान बनाने के लिए यदि हजारों वर्ष की मानवीय स्मृति को डिजिटल डेटा में बदलकर उसके मूल स्रोतों को नष्ट करना पड़े, तो हमें यह तय करना होगा कि विकास की यह कीमत उचित है या नहीं। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी किताब को खरीद लेने से उसके ऐतिहासिक अस्तित्व को मिटा देने का नैतिक अधिकार भी मिल जाता है? कानूनी बहस अलग विषय है। अमेरिका में कुछ मामलों में खरीदी गई भौतिक पुस्तकों को स्कैन करने और मूल प्रति नष्ट करने को लेकर ‘फेयर यूज’ और प्रथम-विक्रय सिद्धांत जैसे कानूनी प्रश्न उठे हैं। लेकिन कानून किसी कार्य को अनुमति देता है या नहीं, यह प्रश्न अलग है; क्या वह कार्य सांस्कृतिक और नैतिक रूप से उचित है, यह प्रश्न उससे कहीं बड़ा है।
कल्पना कीजिए किसी पुस्तकालय की अलमारी में रखी कोई 80 वर्ष पुरानी पुस्तक, किसी स्थानीय इतिहासकार की लिखी किताब, किसी आदिवासी समुदाय की संस्कृति पर प्रकाशित सीमित प्रतियों वाली सामग्री या किसी विलुप्त होती बोली का दस्तावेज अचानक दुनिया की अंतिम उपलब्ध प्रतियों में से एक हो। यदि वह किताब एआई प्रशिक्षण के लिए खरीदी गई, जिल्द से काटी गई, स्कैन हुई और फिर कचरे में चली गई, तो मशीन ने उसका ज्ञान तो बचा लिया, लेकिन मानवता ने उसका मूल दस्तावेज खो दिया। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भयावह विरोधाभास है हम भविष्य की मशीनों को अतीत का ज्ञान सिखाने के लिए अतीत के भौतिक प्रमाण मिटा रहे हैं।
एआई का भविष्य तभी वास्तव में मानवीय कहा जाएगा, जब वह मानव ज्ञान का सम्मान करना सीखे। तकनीकी कंपनियों को दुर्लभ पुस्तकों के संरक्षण के लिए पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों, अभिलेखागारों और लेखकों के साथ साझेदारी करनी चाहिए। ऐसी स्कैनिंग तकनीक विकसित होनी चाहिए जिसमें पुस्तक को नष्ट किए बिना उसका उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल संरक्षण किया जा सके। दुनिया की दुर्लभ किताबों को ‘डेटा’ नहीं, ‘धरोहर’ मानने की जरूरत है। क्योंकि किताब केवल शब्दों का ढेर नहीं होती। वह समय की आवाज होती है। वह समाज की स्मृति होती है। वह सभ्यता की गवाही होती है।
एआई को अधिक बुद्धिमान बनाने के लिए यदि हम पुस्तकों की हत्या करने लगें, तो एक दिन इतिहास हमसे यही पूछेगा – “तुमने मशीन को तो ज्ञान दे दिया, लेकिन उस ज्ञान की किताबें क्यों मिटा दीं?” और शायद यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर आज की तकनीकी दुनिया को कल नहीं, आज ही देना होगा।
– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
बिलासपुर,छत्तीसगढ़
