विजय की ✒कलम

देश :- पिछले एक माह से देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने छात्र आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल लगातार जारी रही। शुरुआत में किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। सरकार ने भी इसे सामान्य विरोध मानकर अनदेखा किया और विपक्ष भी पूरी तरह सक्रिय नहीं दिखा। लेकिन जब लाखों छात्र-छात्राओं और एक वैज्ञानिक ने भूख हड़ताल शुरू की, तब धीरे-धीरे आंदोलन ने गति पकड़नी शुरू की और देश का ध्यान इस ओर गया।देखते ही देखते यह आंदोलन पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। सोशल मीडिया ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। बड़ी संख्या में युवा, यूट्यूबर और स्वतंत्र पत्रकार लगातार आंदोलन की खबरें लोगों तक पहुंचाते रहे। इसके बाद राजनीतिक दलों के नेताओं की भी आंदोलन स्थल तक पहुंच शुरू हुई। कहा गया कि इस आंदोलन में आम आदमी पार्टी सबसे पहले सक्रिय हुई, लेकिन जैसे ही राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे विपक्षी नेताओं ने भाग लेना शुरू किया, आम आदमी पार्टी को लगा कि कहीं इस पूरे मुद्दे का राजनीतिक लाभ कांग्रेस न ले जाए। पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आगामी चुनावों को देखते हुए सभी दल अपने-अपने राजनीतिक समीकरण साधने में जुट गए।आंदोलन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ। इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। सरकार की आलोचना हुई और राष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे प्रमुखता से उठाया। इसके बाद सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। उसी बीच सरकार ने भूख हड़ताल पर बैठे वैज्ञानिक को अस्पताल में भर्ती कराया और फिर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया। इससे आंदोलन की तीव्रता कुछ समय के लिए कम होती दिखाई दी।लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल किसी मंत्री के इस्तीफे से समाधान हो गया? यदि वास्तव में छात्रों और युवाओं के भविष्य की चिंता है, तो सभी राजनीतिक दलों को उन परिवारों तक भी जाना चाहिए जो इस पूरे घटनाक्रम से गंभीर रूप से प्रभावित हुए। उनके दुख में शामिल होना चाहिए और सरकार से उनके लिए आर्थिक सहायता एवं न्याय की मांग करनी चाहिए। केवल राजनीतिक मंचों पर भाषण देने से युवाओं का विश्वास नहीं जीता जा सकता।सरकार को भी इस पूरे घटनाक्रम से सीख लेनी चाहिए। यदि शुरुआत में ही संवाद स्थापित किया जाता और आंदोलनकारियों से बातचीत होती, तो शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती। लोकतंत्र में संवाद हमेशा टकराव से बेहतर रास्ता होता है। विपक्षी दलों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि हर आंदोलन अवसर मात्र नहीं हो सकता। जब सरकार को अपने निर्णय पर पीछे हटना पड़ा, तो यह केवल किसी आंदोलन की जीत नहीं थी।दरअसल, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल सत्ता या विपक्ष की जीत-हार का प्रश्न नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए एक संदेश है कि जनता की आवाज को समय रहते सुनना आवश्यक है। आने वाले समय में सरकार को बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और दीर्घकालिक समाधान पर भी गंभीरता से काम करना चाहिए। यदि इथेनॉल मिश्रित ईंधन जैसे मुद्दों पर भी जनता के बीच असंतोष बढ़ता है, तो समय रहते संवाद स्थापित करना जरूरी होगा।राजनीति में अवसर हमेशा आते रहेंगे, लेकिन देश सबसे ऊपर होना चाहिए। सत्ता पक्ष, विपक्ष और नए उभरते सामाजिक समूहों का उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए।अंत में भगवान से यही प्रार्थना है कि सत्ता पक्ष, विपक्ष और सभी सामाजिक-राजनीतिक संगठन स्वार्थ से ऊपर उठें, संवाद का मार्ग अपनाएं और राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाएं।– संपादकीय
