हरियाली अमावस्या पर विशेष
बिलासपुर। हरेली केवल खेती-किसानी, प्रकृति और लोकआस्था का पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खेल संस्कृति का भी जीवंत उत्सव रहा है। इसी लोकपरंपरा में नारियल फेंक प्रतियोगिता के एक ऐसे अद्भुत खिलाड़ी का नाम आज भी बुजुर्गों की स्मृतियों और जूना बिलासपुर में सम्मान से लिया जाता है – स्वर्गीय ठाकुर अमर सिंह बैस।
नारियल फेंकते तो मैदान में छा जाता था सन्नाटा
जूना बिलासपुर उदई चौक में एक समय हरेली अमावस्या के दिन काफी भीड़भाड़ और मेले सा वातावरण रहता था। यहां बरसों से हरेली अमावस्या के दिन विभिन्न प्रकार के खेल स्पर्धाओं का आयोजन किया जाता था जिसमें नारियल फेंक स्पर्धा, गेड़ी दौड़ स्पर्धा सहित कई स्पर्धाएं इस अवसर पर आयोजित की जाती थी यही कारण था कि इस खेल स्पर्धा में भाग लेने के लिए स्थानीय के साथ-साथ दूर-दूर के शौकीन लोग यहां जमा होते थे और एक उत्सव और मेले का वातावरण तैयार हो जाता था। यह दौर 90 दशक आते आते तक फीका पड़ने लग गया हालांकि आज भी यह स्पर्धाएं होती है लेकिन जो पहले का माहौल और उत्साह उमंग जो देखने को मिलता था वह अब कम ही देखने को मिलता है। स्पर्धा में स्वर्गीय अमर सिंह बैस नारियल फेंक स्पर्धा के अजेय खिलाड़ी के रूप में अपनी ख्याति दर्ज कर चुके थे। उसे समय ऐसा माहौल था कि विरोधी उनके विरोध में शर्त लगाने से कतराने लग गए थे ।कहा जाता है कि नारियल फेंकने की शर्त में उन्हें हराना लगभग असंभव माना जाता था। जब किसी गांव या शहर के अन्य स्थानों में हरेली के अवसर पर नारियल फेंक प्रतियोगिता होती और यह खबर पहुंचती कि ठाकुर अमर सिंह बैस मैदान में उतर रहे हैं, तो लोगों की निगाहें उनके प्रदर्शन पर टिक जाती थीं। उनके नाम के साथ ही प्रतियोगिता का रोमांच कई गुना बढ़ जाता था। उनकी ताकत केवल बाजुओं में नहीं थी। पकड़, संतुलन, शरीर की गति, फेंकने का कोण और सही समय पर नारियल छोड़ने की कला ,इन सबका अद्भुत तालमेल उनके प्रदर्शन में दिखाई देता था। कहते हैं जो दूसरे प्रतियोगी कई हाथ में अपने हाथ की ताकत या बेवा से नारियल की दूरी नाप नहीं पाते थे उसे वे कम हाथ में ही फेंक दिया करते थे। उनके हाथ से छूटा नारियल जब असाधारण दूरी तय करता, तो देखने वाले दंग रह जाते। लोकमानस में उनकी पहचान ऐसे खिलाड़ी की बन गई थी, जिसके सामने शर्त लगाना भी लोग कठिन समझते थे। लेकिन स्व. अमर सिंह बैस की सबसे बड़ी विशेषता केवल उनकी जीत नहीं थी। वे प्रतियोगिता को प्रतिष्ठा या अहंकार का विषय नहीं, बल्कि हरेली के सामूहिक उल्लास और लोकपरंपरा का हिस्सा मानते थे। यही सहजता और विनम्रता उन्हें एक साधारण विजेता से उठाकर लोकनायक के रूप में स्थापित करती है। आज समय बदल गया है। गांवों की चौपालें बदलीं, मनोरंजन के साधन बदले और पारंपरिक खेल भी धीरे-धीरे पीछे छूटते गए।नारियल फेंक जैसी प्रतियोगिताएं अब विरल होती जा रही हैं। मगर स्व. ठाकुर अमर सिंह बैस जैसे लोकप्रतिभाओं की स्मृति बताती है कि लोक खेल केवल खेल नहीं, हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं।
*कतियापारा निवासी 78 वर्षीय जोधन प्रसाद श्रीवास ने उन दिनों को याद करते हुए बताया कि अमर भैया जब नारियल फेंकने के लिए आते थे तो जो दूरी दूसरे प्रतिस्पर्धी सात हाथ यानी बेंवा में भी नहीं फेक पाते थे उतनी दूरी को वे पांच हाथ में ही फेंक दिया करते थे। इसीलिए एक समय ऐसा आया कि उनके विरुद्ध कोई खिलाड़ी दांव नहीं लगाता था।*
*उदई चौक निवासी 58 वर्षीय संतोष साहू ने हरेली त्यौहार की उन दिनों की याद करते हुए बताया की ठाकुर चाचा जब नारियल फेंकने स्पर्धा में आते थे तो चौक में बहुत भीड़ उमड़ पड़ती थी। लोग केवल यह देखने के लिए इकट्ठे हो जाते थे कि ठाकुर चाचा कितने कम हाथ में नारियल को लगी शर्त के अनुसार फेंक देंगे। उन्होंने आगे बताया कि हालांकि सबको मालूम रहता था कि लगी शर्त में वही जीतेंगे, लेकिन कितने कम हाथ ( बेंवा) में वे नारियल फेक करके जीतते हैं इसी जिज्ञासा में लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हो जाती थी।*
हरेली के अवसर पर उन्हें याद करना केवल एक अद्भुत खिलाड़ी को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस लोकसंस्कृति को नमन करना है, जिसमें प्रतिभा को मंच सरकारी पुरस्कारों से नहीं, जनता की तालियों और पीढ़ियों की स्मृतियों से मिलता था। उनकी भुजाओं की ताकत ने नारियल को दूर तक पहुंचाया था, लेकिन उनकी प्रतिभा ने हरेली की इस लोकपरंपरा को लोकस्मृति में और भी दूर तक पहुंचा दिया।
